इस सभा में आये हुए सभी सम्माननीय नागरिक बंधु आज के सत्र के अध्यक्ष महोदय और मेरे भाई सरी के श्री रवि कुमार रामा जी आज के इस कार्यक्रम में मेरे ही तरह उपस्थित एक और प्रमुख वक्ता श्री चंद्रन बा जी और आज के सत्र में आने वाले एक और प्रमुख वक्ता श्री हु चंद साला जी मैं बहुत आभारी ह आयोजन समिति का जिन्होने मुझे य आमंत्रित किया और ग पटेंट का विषय हमारे शेतकरी समाज को कितना धोकादायक है उसके बारे में करने का मका दिया मैं सबसे पहले भाई श्री रवि राणा का बहुत आभारी हूं जिनके विशेष आग्रह पर मैं आपके बीच में हरिद्वार से आ सका और उन्ही के साथ डॉक्टर चौधरी का बहुत आभारी है उन्होने बार बार फोन करके मुझे य आने के लिए प्रेरित किया डॉक्टर चौधरी और श्री रवि कुमार राणा जी दोनों के विशेष आग और प्रेम भरे निमंत्रण पर के बीच आ सका अपने भारत देश की सरकार ने सन 1995 में एक गट करार नाम की अंतरराष्ट्रीय संधि की 1995 में भारत सरकार ने जो गट कर नाम की संधि की वो एक जनवरी को हुई और एक जनवरी 1995 से यह संधि संपूर्ण भारत देश में लागू हुई इस संधि को भारत सरकार ने जब किया था उस समय हमारे देश के प्रधानमंत्री थे श्री पवी और हमारे देश के वित्त मंत्री थे डॉक्टर मनमोहन सिंह इस समय संधि को लगे हुए स्थापित हुए चालू हुए करीब करीब 13 वर्ष हो गया और 13 वर्ष के बाद य संधि आज जहां तक पहुंची है तो भारत में प्रधानमंत्री है डॉक्टर मनमोहन सिंह और पीवी नरसिमा राव स्वर्गवासी हो चुके जब य स हमारी सरकार ने की थी गट कर की तो हम की संसद में हमारी सरकार ने कुछ माहिती द और उसम से एक माहिती य य जो संधि हो रही है गट करार की इससे हमारे शेतकरी समाज को बहुत फायदा होगा हमारे देश के वर्तमान में जो वित्त मंत्री है और संधि के समय में जो वाणिज्य मंत्री थे उनका नाम है श्री प्रण मुखर्जी ने संसद में एक जनवरी को एक बयान दिया था और य कहा था इस संधि के लागू होने से भारत के शेतकरी समाज को बहुत लाभ होगा इतना लाभ होगा कि हमारे शेतकरी समाज सभी श्रीमंत हो जाएगा हमारे शेती के विषय में संधि के बारे में य कहा गया था इस संधि को लागू करने से भारत की शेती का जो विकास दर है वह कम से कम आ से 10 टका हो जाएगा और एक माहिती दी गई थी व यह कि यह संधि लागू होने से गेट करार लागू होने से भारत के शेतकरी समाज को डॉलर बहुत ज्यादा मिलेगा विदेशी मुद्रा में उनकी आमदनी बहुत बढ़ जाएगी और विदेशी मुद्रा हमारे भारतवासियों को शेतकरी समाज को जास्ती मिलेगी तो शेतकरी समाज की गरीबी सब खत्म हो जाएगी ऐसे करके इस संधि के बारे में और भी बहुत माहिती दी गई थी भारत का विदेशी व्यापार बढ़ेगा और भारत का विदेशी व्यापार बढ़कर कम से कम 200 अवज डॉलर को क्रॉस कर जाएगा विदेशी मुद्रा भंडार बहुत बढ़ जाएगा भारत एक श्री और औद्योगिक देश हो जाएगा संपूर्ण दुनिया में भारत की जय जयकार हो जाएगी ऐसी बहुत सारी माहिती देकर यह संधि हमारी सरकार ने की थी अब यह संधि किए हुए लगभग 13 वर्ष हो गए और संसद के बाहर भारत के लोगों को यह कहा गया था कि गेट करार लागू होने से शेती को और शेतकरी समाज को बहुत फायदा होगा शेती का जो विकास दर है वह ठ से 10 टका हो जाएगा और शेतकरी समाज श्रीमंत हो जाएगा और हमारे देश के शेतकरी समाज द्वारा जो उत्पन्न शेती की वस्तुएं हैं उनको बाजार में बहुत अच्छा भाव मिलेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार पेट हमारे लिए खुल जाएगा हमारा जो भी शेती का उत्पन्न खराब हो जाता है हर वर्ष वह पूरे दुनिया के बाजार में बिकने लगेगा ऐसी सारी अच्छी-अच्छी बातें करके गेट करार को हमारी सरकार ने सही किया था अब गेट करार सही हुए लगभग 13 वर्ष हो गए हैं 13 वर्ष के बाद की स्थिति के बारे में मैं आपसे बात करना चाहता हूं कि जो सरकार ने कहा था अब वह 13 वर्ष के बाद कहां तक पहुंचा है तो पहली माहिती जो मैं आपको देना चाहता हूं वह यह कि भारत सरकार ने जो शेती की विकास दर की बात की थी कि आ से 10 ट हो जाएगी गेट करार लागू होने के 13 साल के बाद हमारी शेती की विकास दर अब सिर्फ 4 टका के आसपास है और आपको जानकर यह दुख होगा कि जिस दिन गेट करार को सही किया गया था 1 जनवरी 1995 को उस दिन हमारी शेती की विकास दर 4.8 ट थी अब शेती की विकास दर 4 टका रह गई है माने गेट करार लागू होने के 13 साल में शेती की विकास दर कम हुई है बढ़ी नहीं दूसरी एक माहिती दूं कि जब गेट करार सही हुआ था 1995 में तो हमारे देश में ऐसी एक भी खबर नहीं थी कि शेतकरी समाज को आत्महत्या करनी पड़ती है गेट कर लागू होने के अब 13 साल में हमारे देश के शेतकरी समाज के हजारों हजारों शेतकरी आत्महत्या कर रहे हैं हम जहां विदर्भ में रहते हैं विदर्भ में तो शायद ही कोई जिला बचा होगा अमरावती है फिर वर्धा है फिर बुलढाना है फिर गढ़चिरौली है विदर्भ के तो सारे जिले एक भी जिला ऐसा बाकी नहीं है जहां शेतकरी समाज की आत्महत्या ना हुई हो और इस विदर्भ का एक बड़ा प्रतिनिधि समाचार पत्र है देशोन्नति देशोन्नति ने तो बाकायदा एक मुहिम चला रखी है कि जब भी कोई शेतकरी आत्महत्या करता है देशोन्नति वोह अखबार है जिसके प्रथम पृष्ठ पर उसकी खबर छपती है और वह काट काट कर मैं रखता रहता हूं अभी तक हजारों शेतकरी आत्महत्या की खबर देशोन्नति के माध्यम से मेरे जैसे पाठकों को मिली है और यह आत्महत्या हमारे शेतकरी समाज की विदर्भ में हो रही है यह सिर्फ विदर्भ में नहीं है आंध्र प्रदेश में भी शेतकरी समाज की आत्महत्या कर्नाटक में भी शेतकरी समाज आत्महत्या के रास्ते पर है केरल में तमिलनाडु में भी शेतकरी समाज आत्महत्या के रास्ते पर भारत के 12 से ज्यादा राज्यों से शेतकरी समाज के आत्महत्या करने की खबर मिलती है 12 से ज्यादा राज्यों में शेतकरी आत्महत्या कर रहे हैं बड़ा दुख है और अफसोस है और यह शर्मनाक है कि गेट करार जब सा साइन किया गया गेट करार जब इस देश में लाया गया 1 जनवरी 1995 से उस समय तक हमारे देश में शेतकरी आत्महत्या की खबरें ना के बराबर थी अब गेट करार लागू होने के 13 साल में शेतकरी समाज की आत्महत्या हजारों की संख्या में हो रही है और आपको शायद याद होगा एक बार तो शेतकरी समाज की आत्महत्या के प्रश्न पर परेशान होकर हमारे देश के प्रधानमंत्री को विदर्भ की यात्रा करनी पड़ी थी और सेवा ग्राम में आकर दो दिन रुकना पड़ा था शेतकरी समाज के प्रश्नों को समझने के लिए संसद में इतनी बार हंगामा हो चुका है शेतकरी आत्म सवाल तो गेट करार लागू होने से शेतकरी समाज की आत्महत्या बढ़ी गेट करार लागू होने से हमारे शेतकरी समाज का जो विकास दर है शेती का विकास दर है वह कम हुआ 4.8 से अब चट पर आ गया है और अगले एक साल का हमारे लोगों का अनुमान है अर्थशास्त्र काे कीस के आसपास 2009 के समा उसके बाद हमारे देश की सरकार ने एक सर्वे कराया है जिसकी मैं माहिती आपके बीच में रखना चाहता हूं गेट करार लागू होने के बाद भारत के शेतकरी समाज और साधारण लोगों पर उसका क्या फर्क पड़ा है क्या अंतर आया है उसके लिए एक सर्वे हुआ हमारे देश में एक बहुत बड़े अर्थ तज्ञ हैं बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं उनका नाम है प्रोफेसर अर्जुन सेन गुप्ता वह हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के बहुत खास मित्र हैं और भारत देश में बहुत समय तक ऊंचे पदों पर रहे हैं जब श्रीमती इंदिरा गांधी इस देश में प्रधानमंत्री हुआ करती थी तो प्रोफेसर अर्जुन सेन गुप्ता लोकसभा के सॉरी हमारे देश के योजना आयोग के उपाध्यक्ष हुआ करते थे योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है उसके ठीक नीचे उपाध्यक्ष तो प्रोफेसर अर्जुन सेन गुप्ता योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं बहुत बड़े अर्थ ज्ञ हैं बंगाल के बहुत समय तक वित्त मंत्री रहे हैं ऐसे एक विद्वान व्यक्ति ने भारत सरकार का एक सर्वेक्षण पूरा किया है 2006 जून में वह सर्वेक्षण छपा है और उससे यह उन्होंने एक माहिती निकाली है कि गेट करार लागू होने के बाद भारत के साधारण लोगों की स्थिति और विशेष रूप से शेतकरी समाज की स्थिति बहुत खराब हुई है उन्होंने कुछ आंकड़े दिए हैं उन्होंने बताया है कि गेट करार लागू होने के लगभग 12 साल में भारत के साधारण लोगों की गरीबी बहुत बड़ी है साधारण शेतकरी की गरीबी बहुत बड़ी है और उन्होंने गरीबी के आंकड़े दिए हैं मेरे जैसे आदमी को हैरानी होती है सारे देश को हैरानी है 84 कोट लोग इस समय गरीबी की रेखा के इतने नीचे हैं कि जिनके पास एक दिन में खर्च करने के लिए 20 रुपया नहीं है गेट करार लागू होने के बाद की यह स्थिति है 84 कोटि भारतवासी एक दिन में 20 रप खर्च नहीं कर सकते आप जरा सोचिए 115 कोटि का हमारा देश है 115 कोटि में 84 को लोगों के पास एक दिन में खर्च करने के लिए 20 रप नहीं है इसका सीधा मतलब है 84 कोट लोगों की एक दिन की आमदनी 20 रुप से कम है और प्रोफेसर अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को ही आगे में बता रहा हूं कि 50 कोट लोगों की तो एक दिन की आमदनी 10 रुप से कम 50 कोटी लोग और 25 कोटी लोगों की एक दिन की आमदनी पा रुप से कम और यह पिछले 12 1 साल में बहुत तेजी से हुआ है गरीबी बहुत तेजी से बढ़ी है फिर हमारे देश के प्रोफेसर अर्जुन सेन गुप्ता की ही कमेटी की रिपोर्ट है वह यह कहते हैं कि गेट करार लागू होने के बाद छोटे-छोटे जो उद्योग धंधे हैं छोटे-छोटे जो रोजगार करने के काम होते थे वह बहुत तेजी से कम हुए हैं छोटे उद्योग धंधे रोजगार देने वाले सारे तंत्र धीरे-धीरे खत्म हुए और एक दो माहिती देता हूं गेट करार लागू होने के 12 साल में हमारे देश का शेती का जो निर्यात है वह बहुत तेजी से गिरा है हम जो शेती का निर्यात करते थे 1995 में उस निर्यात से हमारी जो कुल आमनी होती थी आज वह आमनी हमारी 20 से 25 टका कम हो चुकी शेती से होने वाली आमनी और यह आमनी कैसे कम हुई है 1995 में जब यह गेट करार लागू हुआ था तब एक डॉलर 6 का था अब गेट करार लागू हुए लगभग 12 1 साल हो गया अब एक डॉलर लगभग 50 के बराबर है तो हमारा मतलब क्या हुआ कि पहले हम शेती का कोई भी वस्तु ₹ का बेचे तो हमें एक डलर की इनकम होती थी अब 2009 में शेती की 50 की वस्तु बेचते हैं तब एक डॉलर की इनकम होती है माने वस्तु हमारी जास्ती जाती है डॉलर हमारे पास उतना ही आता है जो 1995 में आता था अगर आप इसको टक्केवारी में निकालेंगे तो ₹ डॉलर से अब 50 डॉलर हो गया लगभग डॉलर की पोजीशन में 25 से 30 प्र की गिरावट आई है और यही गिरावट हमारे शेती से होने वाली आमदनी में भी आई है और इसी गिरावट के कारण हमारे शेतकरी समाज को गरीबी और ज्यादा आई है अब आपके मन में एक प्रश्न आएगा कि गेट करार लागू होने से यह शेतकरी समाज और शेती को नुकसान हुआ कैसे मैं आपको एक छोटी सी माहिती देता हूं गेट करार की बहुत सारी शर्तें हैं गेट करार का ने बहुत अभ्यास किया लगभग 10 से 12 साल और उस अभ्यास के बाद सारे देश में मैंने 10000 से ज्यादा व्याख्यान दिए गेट करार पर गेट करार एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसमें 155 देशों ने सही किया है इसमें से 20 से 25 देश हैं जो बहुत श्रीमंत हैं जैसे अमेरिका है जैसे कनाडा है जैसे ब्रिटेन है जैसे फ्रांस है जैसे जर्मनी है जैसे स्विटजरलैंड है जैसे स्वीडन है ऐसे 20 से 25 देश बहुत श्री श्रीमंत है जो गेट करार में सही किए हैं और बाकी के 125 देश बहुत गरीब है बहुत गरीब देशों में जैसे बोत्सवाना एक देश है बहुत ही गरीब देश है अफ्रीका का देश है बहुत ही गरीब है वहां तो पूरे देश की सकल आमनी की जब बात की जाती है तो एक आदमी की आमनी रुपए में जब गिनी जाती है तो डेढ़ से दो रुपए से कम पड़ती है उनके यहां तो बोत्सवाना है अफ्रीका के छोटे-छोटे देश है नाइजीरिया है सोमालिया है इथियोपिया है फिर उसके बाद लैटिन अमेरिका के देश हैं ब्राजील है मेक्सिको है चिली है कोस्टारिका है कोलंबिया है फिर और साउथ ईस्ट एशिया के देश हैं तो 125 देश तो बहुत गरीब है और 25 देश हैं जो बहुत श्रीमंत है उनकी श्रीमंता का अंदाजा आप लगा सकते हैं अमेरिका जैसा श्रीमंत देश अपने शेतकरी समाज को दर वर्षी 400 अज डॉलर की सबसिडी देता है 400 अज डॉलर 400 बिलियन डॉलर 400 अरब डॉलर अमेरिका की सरकार अपने शेतकरी समाज को सब्सिडी देती है इस सब्सिडी का मतलब मैं आपको समझाना चाहता हूं वह क्या है अगर अमेरिका का कोई शेतकरी शेती करे और शेती में वह यह कहे कि मेरे पास एक अरब एक डॉलर का उत्पन्न है अमेरिका का कोई शेतकरी एक डॉलर का उत्पन्न अगर अपने क्षेत्र में करता है तो अमेरिका की सरकार उस एक डॉलर के उत्पन्न को अमेरिका से शेतकरी से 400 देकर खरीद लेती है 400 डॉलर देकर खरीद लेते एक डॉलर का उत्पन्न वह 400 डॉलर देकर खरीद लेते हैं माने शेतकरी को उत्पन्न से 400 पट जास्ती मुनाफा वह दे देते हैं अब वह उत्पन्न को फिर व अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री करते हैं और उस बिक्री के कारण वह सस्ता हो जाता है क्योंकि सरकार के पैसे बहुत लग गए हैं उसमें तो अमेरिका के शेतकरी का जो शेत उत्पन्न है वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत सस्ता आकर बिकने लगता है भारत में इसका उल्टा हो है भारत की सरकार शेतकरी को सब्सिडी तो देती नहीं है माननीय शरद जोशी के हिसाब से अगर कहूं तो नेगेटिव सब्सिडी देती है शेतकरी संगठन वाले यहां बैठे हैं उनके हिसाब से कह उन्होंने का बड़ा अच्छा कैलकुलेशन है कि सब्सिडी तो दे दी नहीं नेगेटिव सब्सिडी है हमारे यहां माने शेतकरी से उल्टा खींच लेती है हमारी सरकार शेतकरी को तो देती नहीं है तो यहां के शेतकरी को तो कोई खास सब्सिडी है नहीं और अमेरिका के शेतकरी को 400 वस डॉलर साल की सब्सिडी है आप सोचेंगे कि ने असंतुलित जमाने में कैसे शेतकरी खड़ा रहे हमारा शेतकरी शेती करता है कर्ज लेता है बैंक से कर्ज लेता है बैंक के बाद उनकी सहकारी पत संस्थाओं से कर्ज लेता है सहकारी पत संस्थाओं का कर्ज 141 टका के ब्याज पर पड़ता है बैंक का कर्ज भी सात से 8 टक्का के ब्याज पर पड़ता है और अमेरिका का शेतकरी जब कर्ज लेता है बैंक से तो उसको ब्याज ही नहीं देना पड़ता और उनके यहां तो नेगेटिव ब्याज होता माने सरकार अपनी तरफ से शेतकरी को मदद करती है तो अमेरिका का शेतकरी बिना ब्याज के कर्ज लेकर शेती करता है भारत के शेतकरी को ब्याज भर के शेती करनी पड़ती है ब्याज देनी पड़ती है अपने कर्जे पर और भारत का शेतकरी सबसे जस्ती ब्याज देता है कर्जे पर जो कोई नहीं देता इस देश में अभी तीन चार साल पहले तक तो भारत के शेतकरी को 14 टक्का का ब्याज था हमारे देश में और सहकारी पद संस्थाओं में तो 18 से 20 ट का ब्याज था और अगर प्राइवेट मनी र से वो कर्ज लेता है तो ब्याज का दर 100 टका भी हो सकता है 150 से 200 टका भी हो सकता है तो भारत का शेतकरी बहुत ज्यादा ब्याज लेकर बहुत ज्यादा ब्याज देकर कर्ज लेता है अमेरिका के शेतकरी को ब्याज ही नहीं भरना पड़ता भारत का शेतकरी अपनी वस्तुएं सरकार को बेचता है तो सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव से भी कई बार सस्ती कीमत पर खरीदी कर लेती है वहां भी शेतकरी मार खा जाता है फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिका की सरकार अपनी शेतकरी को एक्सपोर्ट सब्सिडी देती है और भारत की सरकार ऐसी कोई सब्सिडी नहीं देती है तो अंत में निर्णय क्या आता है अंत में फैसला जहां जाता है या बात जहां जाकर रुकती है वह यह कि भारत के शेतकरी का माल अंतरराष्ट्रीय बाजार में जाते-जाते महंगा हो जाता है क्योंकि यहां ब्याज ज्यादा देनी है सरकार की तरफ से एक्सपोर्ट सब्सिडी भी नहीं है और सरकार को शेतकरी समाज की अगर टोटल सब्सिडी है तो वह नेगेटिव है इन तीनों बातों से मिलकर भारत के शेतकरी का कोई भी उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा होता है और अमेरिका और कनाडा और यूरोप के शेतकरी का उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव बाजार पेट में सस्ता होता है अब सस्ता उत्पन्न है तो जास्ती बिकेगा महंगा उत्पन्न है तो कम बिकेगा यही चक्कर में भ भारत के शेतकरी समाज की वस्तुएं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम बिकती हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब शेतकरी समाज की वस्तुएं कम बिकती हैं तो उसका दोनों तरफ ऋणात्मक प्रभाव आता है पहला तो माल कम जाता है दूसरा शेतकरी को आमदनी कम होती है इसके विपरीत दूसरे देशों के शेतकरी को जब ज्यादा सबसे वाला माल भारत में आकर बिकता है क्योंकि डब्ल्यूटीओ की एग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार कोई भी देश के शेती का माल किसी भी देश में जाकर आसानी से बिकेगा तो अमेरिका का क्षेत्र उत्पन्न भारत में आकर बिक सकता है यूरोप का क्षेत्र उत्पन्न भारत में आकर बिक सकता है तो अमेरिका और यूरोप के देशों की कापूस आके भारत में बिकना शुरू हो गई है अब अमेरिका की कापूस और यूरोप की कापूस भारत में आकर बिकती है तो उसका बाजार भाव ब 00 00 क्विंटल के आसपास होता है और भारत के शेतकरी समाज की जो कापूस होती है खराब से खराब कापूस 00 18800 क्विंटल की होती है तो भारत की शेतकरी की कापूस महंगी और अमेरिका के शेतकरी की कापूस सस्ती तो भारत के बाजार में भी अब विदेशी कापूस जास्ती बिकती है तो कापूस उत्पन्न करने वाले शेतकरी समाज की कापूस कम बिकती है एक तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव कम मिलता है दूसरे अपने ही देश के बाजार में कापूस कम बिकती है दोनों का ही दुष्परिणाम यह होता है कि कापूस उत्पन्न करने वाले शेतकरी को आमदनी कम होती है और वो व आमदनी उसके खर्चे से भी कई बार कम होती है तो बैंक का खर्चा इतना लागत बढ़ जाती है कि वह कर्जे में डूब जाता है और अंत में आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है हमारे देश में टाटा इंस्टिट्यूट ने एक रिसर्च कराया सर्वे कराया विदर्भ में शेतकरी समाज की आत्महत्या के विषय में तो उसमें पता चला कि बहुत सारे कापूस उत्पन्न करने वाले विदर्भ के जो शेतकरी हैं उनका जो कापूस उत्पन्न का खर्चा है उससे कम कीमत पर उनकी कापूस बिक रही है बाजार खर्चा आता है 00 क्विंटल खर्चा आता है 00 क्विंटल और कापूस बिकती है 00 क्विंटल 00 क्विंटल 50 क्विंटल ऐसी स्थिति हमारे यहां और एक समय क्या आता है कि जब आप खर्चा ज्यादा करें शेती में और उत्पन्न आपका ना बिके उस भाव से जिस भाव का खर्चा आपने किया तो हर समय आप घाटे घाटे और घाटे की शेती करें और की शेती की पूर्ति करने के लिए बैंक से कर्जा ले और बैंक के कर्जे को ब्याज देने के लिए कर्जा ले फिर कर्ज का ब्याज और ब्याज का कर्ज यही चक्कर में किसान आत्महत्या कर ले ऐसी हालत हमारे यहां है दूसरी एक समस्या गेट करार के बाद जो हमारे यहां पैदा हुई कि जब से परदेश के शेत उत्पन्न भारत के बाजार में आसानी से बिकने लगे हैं हमारे शेतकरी ने उन उत्पन्न को करना ही कम कर दिया आपको सुनकर अफसोस होगा और मुझे बहुत दर्द है यह कहते हुए कि भारत के बाजार पेट में मलेशिया की दाल बिकती है भारत के बाजार पेट में इंडोनेशिया की दाल बिकती है भारत के बाजार पेट में चाइना का लहसुन बिकता है भारत के बाजार पेट में ईरान का आलू बिक रहा है भारत के बाजार पेट में अमेरिका का सेब बिक रहा है सफरचंद जिसको हम कहते हैं एप्पल भारत के बाजार पेट में न्यूजीलैंड का केला बिक रहा है माने दुनिया भर के हजारों शेत शेत वस्तुएं कृषि वस्तुएं भारत के बाजार में आकर बिकने लगी है अब जिन वस्तुओं को अपना शेतकरी उत्पन्न करता था वही वस्तुएं जब विदेशों के बाजार से आकर अपने बाजार में बिकने लगेंगी तो भारत के शेतकरी के लिए बाजार कम होता गया और बाजार कम होता गया तो फिर शेतकरी को आमनी में कमी आ गई और फिर वह आमनी की कमी शेतकरी की गरीबी को बढ़ा गई आज से 10 12 साल पहले हम यह कल्पना नहीं कर सकते थे कि भारत के बाजार में चाइना का लहसुन मिलेगा ईरान का आलू मिलेगा अमेरिका का सफरचंद मिलेगा न्यूजीलैंड का केला मिलेगा या मलेशिया इंडोनेशिया जैसे देशों की दालें मिलेंगी एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस में बर्मा उसकी सबसे ज्यादा दाल आके यहां बिकती है अरहर की दाल मूंग की दाल उड़द की दाल चने की दाल बर्मा जैसे देश की अंधा दंद बिकती है और समस्या क्या आती है भारत के शेतकरी की दाल का भाव 3500 क्विंटल तो बर्मा की दाल का भाव 22700 क्विंटल 800 क्विंटल अब ₹ 500 क्विंटल भारत के शेतकरी की दाल 00 क्विंटल बर्मा की दाल तो हमारे देश के जो व्यापारी हैं उनको मुनाफा जास्ती चाहिए तो वह क्या करते हैं बर्मा की दाल खरीदते हैं अंधा धुंद बेचते हैं मैं कल जलगांव में था यहां आने के लिए मैं कल जलगांव से ट्रेन पकड़ा था सॉरी सवेरे जलगांव से ट्रेन पकड़ा था कल रात जलगांव में रुका था आप जानते हैं जलगांव बहुत बड़ा बाजार है दाल का मेरे एक बहुत नजदीकी दोस्त हैं जो दाल की प्रोसेसिंग करते हैं मूंग की दाल की प्रोसेसिंग करते हैं मैंने कल उनसे पूछा क्या हाल है बाजार का तो उन्होंने कहा राजीव भाई दो ढाई साल हो गए हैं हिंदुस्तान की मूंग की दाल बाजार में नहीं है दो ढाई साल हो गए मैं बोला फिर किसकी है तो उन्होंने कहा सारी मूंग की दाल बर्मा से आकर बिक रही है तो मैं बोला ढाई तीन साल पहले क्या होता था तो वो बोल रहे थे कि ढाई तीन साल पहले उत्तर प्रदेश की दाल आती थी यहां पर बिकने के लिए बिहार की आती थी यहां पर बिकने के लिए बंगाल की दाले आती थी बिकने के लिए उत्तराखंड की दाले आती थी बिकने के लिए ढाई तीन साल से दाले ही नहीं नजर आ रही है हिंदुस्तान की सारी बर्मा की दाल आती है बिकने के लिए तो मैंने उनसे पूछा कि अगर बर्मा की दाल आ रही है बिकने के लिए जलगांव में तो फिर जलगांव में बाकी भारतवासियों की दाल नहीं बिक रही तो उनकी दाल का क्या हुआ वह कहीं दूसरी जगह बेच रहे हैं तो उन्होंने कहा बेच नहीं रहे हैं दाल पैदा करना ही बंद कर दिया है उन्होंने हमारे देश के हजारों नहीं लाखों लाखों शेतकरी जो ढाई तीन साल पहले तक दाल पैदा करते थे उन्होंने ढाई तीन साल से दाल पैदा करना ही कम कर दिया है और सरकार अब चिंता कर रही है कि दाल का क्षेत्रफल इस देश में घट रहा है दलहन का क्षेत्रफल इस देश में घट रहा है अब शेतकरी कहते हैं हम क्या करें हमारी दाल को भाव नहीं है विदेशी दाल 00 क्विंटल में व्यापारी खरीद लेता हमारी कौन खरीदेगा 3500 क्विंटल में तो वो भाव नहीं है तो दाल पैदा करना कम कर दिया इसी तरह की स्थिति तिलहन के क्षेत्र में है तिलहन हिंदुस्तान के शेत बाजार में इस समय सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है आप सभी जानते हैं कि एक मलेशिया नाम का छोटा सा देश है उस देश का एक तेल है जिसका नाम है पामोलिन तेल वह पामली तेल सबसे ज्यादा भारत के बाजार में है सबसे ज्यादा एक दो टन नहीं लाखों टन में है करोड़ों टन में है पामोलिन तेल जो भारत के शेत बाजार में आ गया अब पामोलिन तेल आके बिकने लगा अब पामोलिन तेल का भाव भारत में आके पड़ता है 20 से ₹ लीटर और शेतकरी समाज जो उत्पन्न करके तेल देता है वह है ₹ लीटर अब भारत का शेतकरी सरसों का तेल करे ₹ लीटर नारियल का तेल करे ₹ लीटर तिलहन का तेल पैदा करे 90 लीटर तो भारत में 40 60 और 90 लीटर के आसपास तेल का भाव है और विदेशी पाम तेल मिलता है 20 से 22 रप लीटर तो सारे भारतवासी जो तेल बनाने वाले उद्योगपति हैं वोह सब पामोलिन तेल धड़ल्ले से लाखों लाखों टन में इंपोर्ट कर रहे हैं और उस पामोलिन तेल को भेड़ सेड़ते मिलावट करके आपको बेच रहे हैं आप बाजार से डिब्बा बंद जितना भी तेल लाकर खाते हैं वह सब पाम तेल है और आपको सुनकर हैरानी होगी चार पाच साल पहले तक इस देश में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी भी दूसरे तेल में मिलाकर नहीं बेचा जा सकता गेट करार और डब्ल्यूटीओ के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिलाकर बेचा जा सकता है अब पाम तेल आ गया व वेजिटेबल ऑयल के साथ मिलाकर बेचा जा रहा है आप बाजार से तेल खरीद के लाते हैं किसी भी नाम का तेल खरीदो रिफाइंड तेल के नाम से और डबल रिफाइंड तेल के नाम से बाजार में जितना भी तेल मिल रहा है वह सब पामोलिन तेल है अब पामोलिन तेल हम खा रहे हैं शेतकरी समाज खा रहा है क्यों क्योंकि शेतकरी समाज जो तिलहन पैदा करके बेचता था शेतकरी समाज जो सरसों का तेल पैदा करके देता था या नारियल का तेल उसको भाव नहीं है तो उन्होंने तिलहन पैदा करना कम कर दिया है तो भारत में तिलहन का क्षेत्रफल भी लगातार घटता चला जा रहा है डाले पैदा करना कम कर दिया तिलहन पैदा करना कम कर दिया तेल का उत्पन्न इस देश में कम हो गया तो विदेशों से पाम तेल आकर बिकने लगा अब वो पाम तेल के दो दुष्परिणाम है एक तो जो शेतकरी नारियल करते थे जो शेतकरी तिल पैदा करते थे जो शेतकरी सरसों पैदा करते उनको नुकसान दूसरा नुकसान देश के खाने वाले लोगों को जो पाम तेल खाएगा मैं आपको स्टम पेपर पर लिख के देख देता हूं तुरंत हार्ट अटैक से मर जाएगा क्योंकि पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के जो रिसर्च हुए हैं वह यह बताते हैं और यह डॉक्टर चौधरी के लिए मैं कहता हूं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस फैट्स सबसे ज्यादा और ट्रांस फैट्स वो फैट्स है जो कभी भी बॉडी में डिसोल्व नहीं होते किसी भी टेंपरेचर पर डिसोल्व नहीं होते और ट्रांस फैट जब बॉडी में डिसोल्व नहीं होते तो फैट बढ़ता जाता है बढ़ता जाता है बढ़ता जाता है और आपने सुना होगा कि जब फैट जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है तभी हृदय घात आता है और आदमी मर जाता है जब फैट जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है तभी ब्रेन हेमरेज होता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार हो जाता है जब ट्रांस फैट्स बहुत बढ़ जाते हैं शरीर में तभी शरीर में ऐसे भयंकर दुष्परिणाम होते हैं डायबिटीज बढ़ती है हाइपरटेंशन बढ़ता है जिसको बीपी आप कहते हैं हार्ट अटैक आता है ब्रेन हेमरेज हो जाता है ऐसे खतरनाक रोग जिनमें शरीर का हमेशा के लिए भयंकर दुष्परिणाम हो जाए या हमारे शरीर का भयंकर नुकसान हो जाए ऐसे रोग भी सारे के सारे पाम तेल के दुष्परिणाम ही है पाम तेल दुनिया में कोई नहीं खाता भारत को छोड़कर मलेशिया जिस देश से पाम तेल भारत में आता है डब्ल्यूटीओ करार के बाद वो मलेशिया खुद पाम तेल नहीं खाता मलेशिया में पाम तेल का जास्ती से जास्ती उपयोग होता है उद्योग धंधों में लेकिन वह पाम तेल गैट करार के बाद भारत में भयंकर पैमाने पर बेचा जा रहा है तेल का बाजार पूरी तरह से अब विदेशियों के कब्जे में चला गया तो एक तरफ अपना शेतकरी नुकसान पाता है दूसरी तरफ लोगों को भी तकलीफ आती है और इसी तरह गेट करार की एक खतरनाक शर्त ने हमारे देश को एक और बड़े खतरे में डाल दिया हमारे देश में पहले एक कानून था कि जो बीज होता है सीड्स जो होता है वो सीड्स पर किसी का पेटेंट नहीं हो सकता क्योंकि भारत में ऐसी मान्यता रही है कि यह जो बीज है वह भगवान की देन है प्रकृति की देन है ईश्वर ने बनाया परमपिता परमात्मा ने बनाया इसको आदमी ने नहीं बनाया तो इसलिए यह माना जाता है कि बीच जो होता है सीड्स जो होते हैं वह परमपिता परमात्मा की देन है ईश्वर की देन है उस पर मनुष्य का अधिकार नहीं है इसलिए वह पेटेंट के दायरे के बाहर है उनको पेटेंट टेबल नहीं माना जाता इस देश में अब गेट करार ने शर्त बदल दी करार की शर्त यह हो गई है कि सभी बीज अब पेटेंट के दायरे में आ गए पहले हमारे यहां बीज होते थे डिस्कवरी डॉक्टर साहब चौधरी साहब पहले बीज होते थे सब डिस्कवरी अब पेटेंटेबिलिटी की दायरी में आने के बाद बीजों को सरकार ने इन्वेंशन जैसा मानना शुरू कर दिया और खतरनाक स्थिति यह बना दी है कि डिस्कवरी और इन्वेंशन बोथ आर पेटेंटेबल इन अवर कंट्री नाउ ऑन द बेसिस ऑफ दिस गेट एग्रीमेंट गेट करार के आधार पर अब डिस्कवरीज भी पेटेंटेबल है इन्वेंशन भी पेटेंटेबल है तो सीड और बीज जो पहले पेटेंट के दायरे के बाहर थे अब वह पेटेंट के दायरे में आ गए जब बीच पर पेटेंट नहीं होता और बीच पर पेटेंट होता उसमें फर्क क्या होता है मैं एक उदाहरण से समझाता हूं पेटेंट का माने होता है पूरा अधिकार उत्पादन करने का बेचने का और मुनाफा कमाने का मैं आपको एक उदाहरण से समझाता हूं मेरे हाथ में एक पेन है अगर मैं यह कहता हूं कि यह पेन पर मेरा पेटेंट है इसका मतलब यह है कि इस पेन को मैं ही बनाऊंगा और मैं ही बेचूंगा और मैं ही मुनाफा कमाऊ दूसरी कोई कंपनी इस पैन को ना बना सकती है ना बेच सकती है ना मुनाफा कमा सकती है अगर मैं यह कहता हूं कि इस पेन पर मेरा पेटेंट नहीं है और किसी का भी पेटेंट नहीं है तो इसका मतलब यह है कि इस पेन को कोई भी कंपनी बनाएगी कोई भी कंपनी बेचेगी कोई भी कंपनी मुनाफा कमाए गी अगर इस पेन पर पेटेंट नहीं है तो इस पेन को बनाने वा हजारों कंपनी होंगी और अगर इस पेन पर पेटेंट है तो इसको बनाने वाली एक ही कंपनी होगी अब अगर हजारों कंपनी यह पेन बनाती है तो आप सोचो उन हजारों कंपनियों में आपस में प्रतियोगिता होती है कंपटीशन होता है तो यह पेन सस्ते से सस्ता मिलेगा लेकिन कोई एक कंपनी अगर यह पेन बनाती है तो उसकी अकेले की मोनोपोली है अकेले का एक अधिकार है तो वो जितने चाहे उतने रुपए में बेचेगी और जितना चाहेगी उतना मुनाफा इस पेन पर वो क कंपनी कमाए गी अब हमारे यहां बीज के क्षेत्र में ऐसा हो गया पहले ऐसा होता था कि हमारे शेतकरी समाज बीज बनाते थे और बीज से बीज हमारे यहां हजारों साल से बनता चला आया हमारे यहां परंपरा ऐसी रही है कि एक बार हमने शेती की शेती में बयारण डाला उस बयारण से उत्पन्न आया उस उत्पन्न में से थोड़ा बयारण हमने अगले साल की शेती के लिए रख लिया फिर उसको बयारण के रूप में डाला फिर उत्पन्न आया फिर तीसरे साल के लिए हमने बयारण उसमें से निकाल याया फिर चौथे साल के लिए इस तरह से बयारण से बयारण बीज से बीज बनता था इसको सीड मल्टीप्लिकेशन कहा जाता है और यह भारत में हजारों साल पुराना है इससे शेती के हजारों बीज विकसित हुए हैं आपको सुनकर हैरानी होगी भारत दुनिया में अकेला देश है जहां की शेती में 1 हजार से ज्यादा चावल के बयारण रहे 150000 बीज चावल के सीड्स एक 50 है गेहूं के हजारों किस्म इस देश में रहे कापूस के सैकड़ों किस्म इस देश में रहे उस के सैकड़ों किस्म इस देश में रहे तो बीज में विविधता बहुत रही है और उस विविधता के आधार पर यह बीज बनते रहे और भारत में बिकते रहे अब हमारे यहां क्या हो गया गेट करार की शर्त के बाद पेटेंट का दायरा आ गया बीज में अब व्यवस्था ऐसी हो गई है कि कोई एक कंपनी बीज बनाएगी जितने साल उसका पेटेंट बीज पर रहेगा दूसरी कोई कंपनी वह बीज नहीं बनाएगी एक ही कंपनी का बीज है जो आपको खरीदना पड़ेगा और उपयोग करना पड़ेगा परिणाम क्या हुआ अमेरिका की बड़ी-बड़ी बीज कंपनियां आ गई एक अमेरिका की कंपनी आ गई उसका नाम है पायनियर दूसरी अमेरिका की कंपनी आ गई उसका नाम है सी जेंटा तीसरी अमेरिका की कंपनी आ गई एली लिली चौथी एक यूरोप की कंपनी आ गई यूनिलीवर ऐसी बी सियों बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी बीच के क्षेत्र में आ गई और उन्होंने भारत के शेतकरी समाज के विकसित किए हुए बीज को अमेरिका और यूरोप में पेटेंट करवाना शुरू कर दिया और उस पेटेंट के आधार पर भारत में धंधा शुरू कर दिया बहुत दुख होता है और अफसोस होता है मुझे कहते हुए कि भारत के छत्तीसगढ़ प्रांत में चावल का बयारण जो हजारों साल से चलता आ रहा था उस पर अभी पेटेंट अमेरिका की सी जेंटा कंपनी का है इसी तरह से भारत के कापुस के बहुत सारे बयारण जो हजारों साल से क्षेत्र समाज ने विकसित किए उस पर अमेरिकन कंपनियों ने पेटेंट एप्लीकेशन दे रखे हैं तो हमारे बयारण और अब विदेशी कंपनियों के पेटेंट के दायरे में इस पेटेंट के दायरे का मतलब मैंने आपसे कहा कि बीच पर अगर किसी कंपनी का 20 साल का पेटेंट है तो वह कंपनी 20 साल तक उस बीज को बेचेगी और 20 साल तक उस पर मुनाफा वह कमाती रहेगी भारत का कोई भी शेतकरी अगर उस बीज को बनाकर बेचने की कोशिश करेगा तो वह अमेरिकन कंपनी उस शेतकरी के खिलाफ मुकदमा करेगी और शेतकरी को जेल में डाल दिया जाएगा उसको हथकड़ियां लगाई जाएंगी और उसको नॉन वेलेबल ऑफेंस डिक्लेयर किया जाएगा अब सोचो मैं हजारों साल से एक बियार बनाता हूं अपने क्षेत्र में वापरता हूं उसी पर अमेरिकन कंपनी ने पेटेंट ले लिया तो वो बियार का सारा कंट्रोल अमेरिकन कंपनी के हाथ में चला गया मेरे हाथ में अब कुछ नहीं रह गया तो परिणाम क्या होगा शेतकरी समाज जो बीज से बीज बनाता था और बीज के उत्पादन में स्वावलंबी होता था अब वो शेतकरी समाज का सारा स्वावलंबन खत्म हो रहा है और वह सारा का सारा बीज अब मल्टीनेशनल कंपनी के कंट्रोल में चला गया अब उसका परिणाम क्या हुआ जब मल्टीनेशनल कंपनी के कंट्रोल में बीज चला गया तो बीज का भाव बढ़ गया जो बीज पहले आपको 40 50 60 किलो मिल जाता था अब उस बीज की कीमत हो गई 00 किलो 000 किलो 00 किलो 000 के आप यहां पर कोई शेतकरी भाई हैं जो शायद कापूस करते होंगे आपने कापूस में एक बीज का नाम सुना होगा ना बीटी कॉटन बीटी कॉटन बीटी कॉटन यह बीटी कॉटन पेटेंटेड सीड है और इसी तरह से हमारे देश के बाजार में आया परिणाम क्या हुआ कि जो सामान्य रूप से कॉटन का बीज हमें मिलता था अभी वह 10 पट 15 पट 20 पट 25 पट 30 पट महंगा हो गया बीटी कॉटन के नाम और अब यह जो मल्टीनेशनल बीज बेचते हैं बीटी कॉटन का तो वो क्या कहते हैं वो कहते हैं कि कॉटन के के बीज में जंतु बहुत लगते हैं कीट बहुत लगते हैं हमने बीटी कॉटन ऐसा बीज बनाया जिसमें जंतु ही नहीं लगेगा कीट ही नहीं लगेगा मतलब उस बीज को इतना जहरीला कर दिया कि उसमें कोई जंतु और कीट नहीं आएगा और वह जहरीला बीज जब आप शेत में डालेंगे और शेत में से उसका कॉटन उत्पन्न होगा और गलती से आपकी गाय और भैंस उस खेत में चली गई तो वह तुरंत वहीं बैठ जाएगी और दो-तीन दिन के बाद वो वहीं मर जाएगी उठकर नहीं आ सकती मैं संपूर्ण भारत देश में प्रवास करता हूं पिछले साल में हरियाणा और पंजाब में एक महीने के प्रवास पर था तो हरियाणा में और पंजाब में मैंने दो जिले देखे एक जालंधर जिला देखा पंजाब में और हरियाणा में पानीपत जालंधर जिले के सैकड़ों गांव में जहां बीटी कॉटन किसानों ने लगाया वह किसान मुझे अपना शेत दिखाने के लिए ले गए तो उन किसानों ने मुझे परीक्षण करके बताया एक शेत में मैं खड़ा था जलंधर से 30 किलोमीटर दूर एक गांव में एक शेतकरी आया उसने कहा देखो यह कितना जहरीला शे बीज है बीटी कॉटन का फसल खड़ी हुई थी उस शेत में उसने मार मार के जबरदस्ती से एक भैंस को अंदर डाल दिया शेत में वह जा नहीं रही थी लेकिन धक्का दे देक डाल दिया थोड़ी देर के बाद वह भैंस चलते चलते बैठ गई फिर वह मुझे भैंस के पास लेकर गया भैंस को बैठने के बाद मैंने देखा उसकी गर्दन टेढ़ी हो गई गर्दन टेढ़ी हो गई तो उसने अब शेतकरी ने कहा अब यह उठेगी नहीं यहां से मैंने कहा क्यों उसने कहा अब यह गई हम रात को उसके घर में जाकर सो गए सवे आक देखा तो भैंस बिल्कुल बेहोश पड़ी थी और दूसरे दिन आकर देखा तो वो भैंस मरी हुई थी वो शेतकरी ने कहा कि मेरे गांव में सैकड़ों भैंसे ऐसे मरी है बीटी कॉटन के खेत में भैंस घुस गई जिंदा वापस नहीं लौटी बीटी कॉटन के शेत में अगर कोई गाय घुस गई जिंदा वापस नहीं लौटी बकरी घुस गई जिंदा वापस नहीं लौटी इतना खतरनाक इतना जहरीला बीज ये बीटी कॉटन के नाम पर सारे देश में भेजा गया शेतकरी को यह उल्लू बनाया मूर्ख बनाया कि इससे उत्पन्न जास्ती मिलेगा लेकिन शेतकरी को यह नहीं बताया कि जो उत्पन्न जास्ती मिलेगा वह जास्ती खर्चे के बाद मिलेगा पहले कॉटन उत्पन्न करने का जो खर्चा आता था उससे खर्चा दुप्पट और तीन पट हो गया तो खर्चा आपका दुप्पट और तीन पट करा दिया फिर उसके बाद उत्पन्न थोड़ा जास्ती मिला तो आप उस तरह से घाटे में ही रहे कोई फायदा नहीं हुआ उसम और जो जो शेतकरी ने बीटी कॉटन लगाया आंध्र प्रदेश में पंजाब में हरियाणा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुजरात में वह सब शेतकरी अभी रो रहे हैं और परेशान हो रहे हैं एक तो उनके जानवर बीमार हो रहे हैं दूसरा उनके शेत की मिट्टी पहले से ज्यादा तकलीफ हो गई है मराठी का एक शब्द इस्तेमाल करूं तो मिट्टी नापी होना शुरू हो गई यह डब्ल्यूटीओ के खतरे हैं और धोखे हैं हमारे देश में अब कोई भी मल्टीनेशनल कंपनी आएगी कोई भी बीज लाएगी अब एक अमेरिकन कंपनी आ रही है वह बीटी कॉटन की तरह से बीटी ब्रिंजल लेकर आ रही है बीटी बैंगन बैंगन को बीटी बना दिया अब वह बैंगन बाजार में आएगा आप शेतकरी अपने गांव में शेत में उसे लगाएंगे माटी आपकी नाप होगी और वह बैंगन आपने गलती से खा लिया भाजी पाले के रूप में सब्जी के रूप में तो आपका शरीर भी नापी हो जाए दुनिया के जिन देशों में बीटी ब्रिंजल को बैन किया गया वहां के लोगों का कहना है और वैज्ञानिकों का कहना है कि जो जो देश में बीटी ब्रिंजल चला नपुंसक सबसे ज्यादा बड़ी लोगों ने जिसने भी खाया नपुंसकता बड़ी अब फिर बीटी टमाटर लाने की बात कर रहे हैं फिर बीटी पोटेटो माने बीटी बटाटा लाने की बात कर रहे हैं तो बीटी बना बनाकर सारे भाजी पाले को हिंदुस्तान में लाने की तैयारी बहुत सारे मल्टी नेशनल्स कर रहे तो एक तरफ शेतकरी समाज को तकलीफ हमारी माटी को नापी बनाने की साजिश या षडयंत्र और दूसरी तरफ शेत का जो उत्पन्न बढ़े उससे भी ज्यादा उसका खर्चा बढ़े हमारे देश में यह चल रहा है और एक छोटी आखरी बात और कहता हूं कि डब्ल्यूटीओ जब से आया 1995 से तब से मैंने भाव देखना शुरू किया एक एक साल का भाव मैंने इकट्ठा किया डब्ल्यूटीओ 1995 में 1 जनवरी से शुरू हुआ हमारे देश में यूरिया और डीएपी का भाव बढ़ना शुरू हो गया डब्ल्यूटीओ के बाद 1995 के आंकड़े बताता हूं 1994 दिसंबर तक हमारे देश में 50 किलो यूरिया 50 किलो यूरिया था र का र पर बैग 50 किलो का यूरिया का बैग 7 रप का डब्ल्यूटीओ आने के बाद हमारे देश की सरकार ने डायरेक्ट और इनडायरेक्ट दोनों सब्सिडीज को कट करने का जो प्रयास किया शेतकरी समाज की यूरिया डीएपी की सब्सिडी भी कम हुई शेतकरी समाज के लिए तो अब वही यूरिया 7 रप का जो 50 किलो था अब 270 275 रप का 50 किलो है 2009 में तो यूरिया का भाव बढ़ गया कम से कम कम से कम अगर आप 7 रप का 140 में लो दो पट हो और 7 रप का आप अगर 180 में लेते हो तीन पट हो गया रप का अगर आप 250 260 270 में ले तो चार पट तो चार पट यूरिया का भाव बढ़ा दिया सरकार ने डब्ल्यूटीओ की कंडीशन फिर डीएपी का भाव उससे भी ज्यादा हो गया डीएपी तो करीब आठ से न पट महंगा हो गया जब डब्ल्यूटीओ लागू हुआ था हमारे देश में तो एक लीटर डीजल था 7 पैसे का अब एक लीटर डीजल है 55 रप का माने डीजल का भाव दुप्पट हो गया डब्ल्यूटीओ के आने के बाद अब शेतकरी जो सबसे ज्यादा वापरता है वह यूरिया दूसरे नंबर पर डीएपी तीसरे नंबर पर डीजल तो यूरिया डीएपी डीजल जो शेतकरी का सबसे जास्ती खर्चा है वही चार पट आठ से 10 पट और दुप्पट महंगा हुआ तो शेतकरी का खर्चा भी चार पट आठ से 10 पट महंगा हो गया खर्चा जास्ती हो हो गया महंगा जास्ती हो गई खेती यूरिया डीएपी महंगा हो गया डीजल महंगा हो गया तो शेती का उत्पन्न खर्चा ज्यादा हो गया लागत खर्च ज्यादा हो गया कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन ज्यादा हो गया और अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ती शेती वस्तुएं आने लगी मैंने आपसे कहा डब्ल्यूटीओ की कंडीशन पहले ऐसी थी माने पहले डब्ल्यूटीओ नहीं था तो बाहर से आने वाले शेत उत्पन्न पर हम टैक्स लगाकर उसको महंगा बनाते थे अब डब्ल्यूटीओ की शर्तों के बाद बाहर से आने वाले शेती के उत्पन्न पर जास्ती टैक्स नहीं लगा सकते वो स महंगा नहीं हो सकता वह सस्ता आ के बाजार में बिकता है तो भारत के शेतकरी का शेत उत्पन्न महंगा और बाहर से आने वाले शेतकरी अमेरिका यूरोप के शेतकरी का शेत उत्पन्न सस्ता तो सस्ता शेत उत्पन्न भारत के बाजार में आकर ज्यादा बिकेगा तो शेतकरी अपने का उत्पन्न कम बिकेगा तो वही उत्पन्न कम बिकने से शेती का जो लागत शेती का जो विकास दर है जो डब्ल्यूटीओ आने के पहले 4.8 ट था अब वो विकास दर 4 टके से भी कम है 2009 तक आते आते व तीन टक्का रह जाएगा माने शेतकरी समाज और ज्यादा गरीब गरीब गरीब और गरीब होता चला जाए तो हमारी सरकार तो डब्ल्यूटीओ की नीतियों में ऐसी फंसी है जो शेतकरी समाज को ज्यादा गरीब बना रही है और शेतकरी समाज की तकलीफें ज्यादा बढ़ा रही है तो आप बोलेंगे अब क्या करना चाहिए तो मैं मेरे व्याख्यान के अंत में यही आपसे कहना चाहता हूं कि सारे शेतकरी समाज को मिलकर अभी दो काम करने चाहिए पहला काम तो यह करना चाहिए कि जो सरकार ने डब्ल्यूटीओ एग्रीमेंट किया जिन सरकारों ने डब्ल्यूटीओ की शर्तों को हमारे शेतकरी समाज पर लाद दिया ऐसी सरकारों को सबक सिखाना चाहिए ऐसे नेताओं को ऐसे पुढारी हों को सबक सिखाना चाहिए जिन्होंने डब्ल्यूटीओ इस देश के ऊपर थोप दिया और इस देश के शेतकरी को मरने के लिए स्थिति में डाल दिया आत्महत्या करने की स्थिति में डाल दिया यह सोच आप कितनी विडंबना है कि लोगों का पेट भरने वाला शेतकरी खुद भूखा रह जाए और आत्महत्या ने के लिए मजबूर हो जाए सारे देश का पेट भरने वाला शेतकरी खुद भूखा रहे और आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो विवश हो यह कितनी बड़ी विडंबना है जो इस देश की आजादी के 60 साल में हमको देखनी पड़ रही है यह उस देश में देखनी पड़ रही है जिस देश में शेती की प्रधानता हमेशा से रही यह उस देश में देखनी पड़ रही है जहां के प्रधानमंत्रियों ने जय जवान जय किसान का नारा दिया है उस देश के किसानों को आत्महत्या करनी पड़ रही तो अभी तो दो ही काम है जो कर सकते हैं आप और उसको रास्ते को ठीक कर सकते हैं बदल सकते हैं इन परिस्थितियों को पहला तो हमारी सरकारों के ऊपर दबाव बनाना कि यह जो डब्ल्यूटीओ एग्रीमेंट है यह जो गेट करार है या तो इसकी शर्तों को बदलो नहीं तो गेट करार को रद्द करो हमें यह नहीं चाहिए अगर इसकी शर्तें नहीं बदलती हैं तो जिन शर्तों पर गेट करार लागू है यह तो हमें नहीं चाहिए यह समाज के बीच में से आवाज आने की जरूरत है और मुझे तो ऐसा लगता है कि इस आधार पर हमारे देश में बड़े आंदोलन करने की जरूरत है और बड़े आंदोलन वह कौन करेगा वह आप सब मिलकर शेतकरी समाज के लोग ही करेंगे हम सब उसमें सहयोग करेंगे हम सब उसमें सहभागी बनेंगे तो शेतकरी समाज के बीच में से यह आवाज आनी चाहिए कि डब्ल्यूटीओ करार की शेती विषय की जो शर्तें हैं इन शर्तों को या तो पूरी तरह से बदल दो नहीं तो गेट करार को रद्द कर दो हमें यह नहीं चाहिए तब आप बोलेंगे अगर हम गेट करार रद्द कर देंगे तो सारी दुनिया में अकेले पड़ जाएंगे अलग थलग हो जाएंगे ऐसा कुछ नहीं है मैं आपको माहिती के लिए बताता हूं गेट करार एक मल्टीलेटरल एग्रीमेंट है बहुपक्षीय समझौता है जिसमें बहुत सारे देशों के साथ मिलकर एक साथ व्यापार किया जाता है दूसरा व्यापार का और एक रास्ता है दुनिया में एक तो व्यापार होता है वह मल्टीलेटरल है बहुपक्षीय है एक तो व्यापार होता है व बायलट है द्विपक्षीय है तो मल्टीलेटरल व्यापार नहीं करेंगे बायलट करेंगे इसमें तकलीफ क्या है और हमारा बायलट व्यापार मल्टीलेटरल से ज्यादा अच्छा होगा द्विपक्षीय समझौते करेंगे एक एक देश के साथ समझौते करके व्यापार करेंगे कैसे होगा मान लीजिए हमारे देश में बहुत जास्ती मात्रा में चाय उत्पन्न होती है कॉफी उत्पन्न होती है और यूरोप के देशों में चाय और कॉफी की बहुत ज्यादा जरूरत है लेकिन उनके यहां उत्पन्न नहीं होती है तो हमारी चाय कॉफी का व्यापार हम यूरोप के देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर करेंगे और उसमें हमारा रेट फिक्स करेंगे ना कि उनके रेट पर बेचेंगे क्योंकि हमें गर्ज नहीं है उन्हें गरज है हमारी चाय और कॉफी की अगर यूरोप के देशों को भारत की चाय कॉफी पीने को नहीं मिलेगी तो वह मर जाएंगे क्योंकि ठंडी इतनी ज्यादा है उस देश में कि उनका ब्लड प्रेशर इतना लो हो जाता है और उसमें मृत्यु की संभावना सबसे तीव्र हो जाती है इसी तरह से और एक उदाहरण देता हूं तिलहन हमारे देश में सबसे अच्छी क्वालिटी का है पूरी दुनिया में इतना तिल जो भारत में होता है कहीं नहीं होता और सारे अरब देशों में तिल का तेल खाने की परंपरा है तिल का तेल खाते हैं खजूर का तेल खाते हैं नारियल का तेल खाते हैं तो जिन देशों को तिल का तेल चाहिए और हमारे पास तिल बहुत अधिक मात्रा में हो तो हम भाव तय करके द्विपक्षीय आधार पर समझौता करके वह तेल बेचेंगे उसमें भाव भी अच्छा मिलेगा और हमारी इज्जत और सम्मान भी ज्यादा बढ़ेगा दुनिया तो मेरा यह कहना है कि मल्टीलेटरल व्यापार का जो समझौता डब्ल्यूटीओ है इसको खत्म करके बायलट तरीके से द्विपक्षीय तरीके से हम व्यापार के समझौते कर सकते हैं और एक एक देश के साथ एक एक समझौता करके हमारी वस्तुओं को ज्यादा अच्छे भाव पर बेच सकते हैं तो हमको डब्ल्यूटीओ की तो वैसे कोई जरूरत नहीं है हम द्विपक्षीय आधार पर व्यापार दुनिया में कर सकते हैं और दूसरी जानकारी अगर डब्ल्यूटीओ हम खत्म करा देते हैं तो भारत के बाजार में क्या फायदा होगा बर्मा की दाल बिकना बंद हो जाएगी भारत के बाजार अमेरिका का सेब बिकना बंद हो जाएगा न्यूजीलैंड का केला बिकना बंद हो जाएगा अमेरिका की कापूस आना बिकना बंद हो जाएगी यहां पर कनाडा का गेहूं आकर बिकना बंद हो जाएगा ऑस्ट्रेलिया का गेहूं आकर नहीं बिकेगा माने परदेशी शेती वस्तुएं भारत के बाजार में बिकना कम हो जाएंगी परिणाम क्या होगा भारत के शेत बाजार में भारत की स्वदेशी वस्तुओं की डिमांड बढ़ जाएगी और जैसे ही स्वदेशी वस्तुओं की डिमांड बढ़ेगी तो स्वदेशी वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाएंगी और शेतकरी समाज को जास्ती लाभ मिलेगा मैंने एक सीधा सा हिसाब निकाला कि आज अगर हम डब्ल्यूटीओ को कैंसिल कर दें और विदेश का कापूस भारत के शेती में आकर बिकना बंद हो जाए भारत के शेत बाजार में भारत के मार्केट में विदेशी कापूस ना बिके तो अभी विदर्भ के शेतकरी का कापूस पाच से सवा हज रप क्विंटल का भाव आराम से हो जाएगा अभी आज की तारीख विदेशी कापूस जैसे ही खत्म होगा भारत के बाजार से देशी कापूस को पा सवा हजार रप क्विंटल का भाव सीधे हो जाता है देसी गेहूं अगर भारत के बाजार में आकर बिकना बंद हो जाए तो देसी गेहूं को भाव वैसे ही 000 क्विंटल हो जाता है जो अभी 00 क्विंटल भी नहीं विदेशी चावल अगर आकर बिकना बंद हो जाए फिलीपींस का चावल यहां ना बिके तो भारत के चावल का भाव 1400 से 1500 क्विंटल सीधे हो जाता है दुप्पट भाव हो जाता है गेहूं का भाव दुप्पट चावल का भाव दुप्पट आपके कापूस का भाव दुप्पट आपका जो केला है उसका भाव दुप्पट सफरचंद का भाव दुप्पट आपकी जो भी क्षेत्र वस्तुएं हैं वो दुप्पट से तीन पट भाव पर तो आज हो जाएंगी अगर विदेश से आने वाली वस्तुओं को बंद कर दिया जाए इस देश और विदेशी क्षेत्र वस्तुओं को जैसे ही हम बंद करेंगे तो भारत के शेतकरी की वस्तुएं महंगी हो जाएंगी वह एक बात होगी और दूसरी बात यह होगी कि भारत के शेतकरी को जब ज्यादा भाव मिलने लगेगा तो वह शेती अपने आप उस दिशा में करना ज्यादा शुरू करेगा अगर कापूस को 5000 रप क्विंटल भाव हो जाए अपने आप कापूस उत्पन्न करने का क्षेत्रफल बढ़ जाएगा इस देश में अगर गेहूं को भाव दो हज हो जाए गेहूं ज्यादा करना अपने आप शुरू कर देंगे शेतकरी अगर चावल को भाव ज्यादा हो गया तो चावल ज्यादा अपने आप ही शुरू हो जाएगा तिलहन को भाव ज्यादा हो जाए दलहन को भाव ज्यादा हो जाए दलहन का क्षेत्रफल बढ़ता है तिलन का क्षेत्रफल बढ़ता है यह सरकार ने कई बार स्टडी कराई है कि एक से दो प्रतिशत भाव में जब बढ़ोत्तरी होती है तो एक कोट हेक्टेयर ज्यादा शेती होने लगती है हमारे कृषि मंत्रालय का एक रिसर्च है एक सर्वे है कि एक से दो पट भाव बढ़ जाए सॉरी एक से दो प्रत भाव में बढ़ोत्तरी हो जाए एक कोट हेक्टेयर शेती ज्यादा होने लगती है अगर आ से 10 प्रतिशत भाव ज्यादा हो जाए तो आप सोचो कितने कोट हेक्टेयर जास्ती शेती इस देश में होने लगती है तो शेती जास्ती होती है क्षेत्रफल ज्यादा होता है शेती का और ज्यादा लोगों को उसमें रोजगार मिलता है और एक तीसरा फायदा होता है अगर डब्ल्यूटीओ की शर्तों को हम रद्द कर दें और हिंदुस्तान की सरकार यह तय करे और हम उनको दबाव डाले कि 1995 में जब आपने डब्ल्यूटीओ लागू किया था उस समय शेती का जो लागत खर्च था उसी लागत खर्च पर शेती को ले जाकर फिक्स कर दो तो यूरिया आपको फिर से ₹ का 50 किलो मिलता है डीएपी आपको बड़े आराम से बहुत आराम से 8 से ₹ का एक किलो मिल जाता है जो इस समय 22 से ₹ किलो है यूरिया डीएपी का भाव चार पट सस्ता होता है डीएपी का भाव आठ से 10 पट सस्ता होता है डीजल पेट्रोल का भाव कम से कम दो पट सस्ता होता है तो यह सब चीजें सस्ती होती है यूरिया सस्ता डीएपी सस्ता सुपर फॉस्फेट सस्ता फिर डीजल सस्ता तो शेती का लागत खर्च कम होता है लागत खर्च कम होता है और बाजार में कीमत जास्ती मिलती है तो किसानों को दोहरा फायदा होता है दो तरफ से प्रॉफिट होता है एक तो बढ़े हुए कीमत पर माल बेचना वो एक फायदा और दूसरा लागत और खर्च लगातार कम हो जाना दूसरा फायदा और हमारे देश में और सारी दुनिया में यह माना जाता है कि खर्चा जितना कम होता है आमनी उतनी ही बढ़ती जाती है शेतकरी समाज का खर्चा जितना कम होगा आमनी उतनी ही बढ़ती जाएगी तो डब्ल्यूटीओ करार को रद्द करने से इतने सारे फायदे हमारे क्षेत्र कररी समाज को होते हैं और मेरा मानना है कि कापूस 5000 क्विंटल गेहूं 00 क्विंटल और चावल ढ़ हज क्विंटल बिकने लगे और हर शेत वस्तु का उत्पन्न र उत्पन्न आधा आधा खर्चा कम हो जाए और माल का भाव दुप्पट बढ़ जाए सब शेतकरी श्रीमंत होते जाए एक भी शेतकरी आत्महत्या करने के लिए मजबूर ना हो इस देश यह एक तरीका का है दूसरा एक तरीका है कि अगर डब्ल्यूटीओ कैंसिल नहीं होता भारत सरकार उसको लागू रखती है और भारत सरकार कहती है कि हम तो इसको कैंसिल नहीं करेंगे तब आप शेतकरी समाज मिलकर एक फैसला करो कि हम ऐसे पुढारी हों को संसद में और विधानसभा में चुनकर भेजेंगे जो इस डब्ल्यूटीओ को कैंसिल करने की बात करेंगे जो पुढारी जो नेता डब्ल्यूटीओ की खिलाफत नहीं करते जो डब्ल्यूटीओ को रद्द करने की बात नहीं करते उन सब पुढारी हों को इस बार के चुनाव में सबक सिखाएंगे आप एक ही बात तय कर लो उसके बाद सब ठीक हो जाएगा इस देश में आप जानते हैं हमारे देश में 64 कोटि वोट हैं 64 कोटि मतदान करने वाले नागरिक हैं अब 64 कोटी मतदान करने वाले नागरिकों में 80 % नागरिक शेतकरी समाज के हैं 80 % अगर यह 80 % शेतकरी समाज के नागरिक ये तय कर ले कि हम मतदान उसी पुढारी को करेंगे उस नेता को मतदान देंगे जो डब्ल्यूटीओ को रद्द कराएगा और डब्ल्यूटीओ को रद्द कराने का माने शेतकरी समाज की समृद्धि और संपत्ति को दुप्पट बनाना तीन पट बनाना तो जो शेतकरी समाज को समृद्धि शली बनाएगा दुप्पट और तीन पट और डब्ल्यू टियो को रद्द कराएगा ऐसे पुढारी को वोट करेंगे ऐसे पुढारी को मत देंगे तो आप देख लो अगली बार की लोकसभा बदल जाएगी अगली सवार की विधानसभा बदल जाएगी पूरी तस्वीर बदल जाएगी आप बोलेंगे ऐसे पुढारी आएंगे कहां से आपके बीच में से आएंगे यह मंच पर हमारे रवि भाई राणा बैठे हैं हम सब लोग इनको कह रहे हैं कि आप तैयारी करो और तैयारी करो गंभीरता से तैयारी करो विधानसभा में जाओ नहीं तो लोकसभा में जाओ और अपने जैसे 350 खासदार को लोकसभा में लेकर जाओ और अपने जैसे 480 आमदार को विधानसभा में लेकर जाओ यह रवि राणा एक है इनके जैसे 480 आमदार नहीं मिलेंगे पूरे महाराष्ट्र में खूब मिलेंगे जो बेईमान नहीं है जो चोर नहीं है ल लंपट नहीं है उचक्के नहीं है शराबी नहीं है कबाबी नहीं है ऐसे तो बहुत लोग मिलेंगे रवि राणा में तो कम से कम इतने दुर्गुण तो नहीं है शराब वो पीते नहीं दारू पीते नहीं मास खाते नहीं लंपट है नहीं चोरी कभी की नहीं जेल कभी गए नहीं पुलिस के अपराध में उनका कोई रिकॉर्ड नहीं तो ऐसे ईमानदार स्वच्छ छ वाले लोग 480 हमको चाहिए पूरे महाराष्ट्र की लोकसंख्या है 10 कोटि की 10 कोट में 480 नहीं मिलेंगे जरूर मिलेंगे बस हमें करना क्या है कि ये रवि राणा हुए ऐसे 479 479 और इकट्ठे करके एक साथ इनको विधानसभा में भेज देना है तो आप बोलेंगे फिर क्या होगा महाराष्ट्र की विधानसभा में अगर 480 आमदार ऐसे जाते हैं जो गेट करार का विरोध करते हैं और एक विधानसभा इस गेट करार को रद्द कर दे तो भारत सरकार की की ताकत नहीं है जो पूरे देश पर उसको लागू कर दे क्योंकि यह संविधान हमारा ऐसा कहता है हमारे संविधान में बिल्कुल स्पष्ट लिखा हुआ है कि भारत की विधानसभाओं ने अगर गेट करार को अमान्य किया रद्द किया कैंसिल किया तो सरकार लागू नहीं करा सकती क्योंकि भारत एक फेडरल स्टेट है संघीय राज्य है जिसमें विधानसभाओं की भी ताकत लोकसभा के बराबर है तो अभी लोकसभा का चुनाव आ रहा है दो महीने के बाद तो दो महीने के बाद लोकसभा का चुनाव आएगा और आपके मतदान संघ से मतदार संघ से जो भी व्यक्ति खासदार है उसको आप सीधे सवाल पूछो देखो भाई 13 साल से य गेट करार हमारे देश में आया आपने गेट करार को रद्द करने के लिए पिछले 13 साल में क्या किया और आने वाले 5 साल में आप क्या करेंगे तभी हमारा वोट आपको मिलेगा जिस दिन आपने वोट को गेट करार के सवाल से जोड़ दिया उसी दिन खासदार को झक मार के कहना पड़ेगा कि हां हम गेट करार को रद्द करेंगे अगर तुम रद्द करोगे तो स्टम पेपर पर लिख के दो पूरे पब्लिक के सामने घोषणा करो कि मैं लोकसभा में जाने के बाद गेट करार को रद्द कराने के लिए काम करूंगा और अगर तुमने नहीं कराया तो तुमको वापस बुलाकर किसी दूसरे को भेजेंगे हम गेट करार को रद्द कराने के लिए यह नहीं कि 5 साल तुमको चुनकर भेज दिया तो 5 साल हम चुप बैठ जाएंगे तुमने अगर काम नहीं किया तो तुमको वापस बुलाएंगे दूसरे को भेज देंगे तीसरे को भेज द तो गेट करार को रद्द कराने वाले खासदार चाहिए लोकसभा गटार गेट करार को रुद्ध कराने वाले आमदार चाहिए विधानसभा में और अबकी बार के चुनाव में आप इस बात का ध्यान रखिए कि जो लोग गेट करार का विरोध करते हैं जो मल्टीनेशनल का विरोध करते हैं जो विदेशी कंपनियों का विरोध करते हैं भारत के शेतकरी समाज को समृद्ध बनाना चाहते हैं शेती को संपन्न बनाना चाहते हैं उन्हीं को वोट करिए और मेरा आपको हाथ जोड़कर निवेदन है कि वोट करते समय पक्ष को ध्यान में मत रखिए व्यक्ति को ध्यान में रखिए क्योंकि पक्ष कई बार बेईमान हो जाते हैं हम पक्षों को एक बात के लिए चुनकर भेजते हैं कि इस काम को करने के लिए जा रहे हैं जब वह वहां पहुंच जाते कहते हैं यह नहीं हो सकता कुछ और बताओ यह नहीं हो सकता कुछ और बताओ फिर वह अपने मूल मुद्दे सब भूल जाते हैं फालतू फालतू काम करना शुरू कर देते हैं इसलिए पक्षों को वोट मत करिए व्यक्तियों को वोट करिए कोई बहुत अच्छा कामदार है कोई बहुत अच्छा खासदार है लेकिन उसका पक्ष खराब है तो भी आप उस आमदार और खासदार को वोट करिए क्योंकि पक्ष को आपने अगर वोट किया तो पक्ष तो नागनाथ और सांप नाथ है दोनों ही डस चाहे जिससे डस वा लो अपने आप आजादी के 60 साल में यही हुआ है इसलिए व्यक्तियों को चुनिए और व्यक्तियों को चुनते समय उनकी कुछ विशेषताएं हैं जो ध्यान में रखिए कि वह व्यक्ति कितना ईमानदार है कितना चरित्रवान है रात को रोज दारू पीकर तो नहीं सोता है रात को कोई खराब काम तो नहीं करता है गलत काम तो नहीं करता है परस्त्री गमन तो नहीं करता परवेश गमन तो नहीं करता ऐसी बातों को चुनकर अगर आप ध्यान देंगे तो अच्छे लोग चुनकर जाएंगे और अच्छे लोग हमेशा अच्छे ही काम करते हैं बुरे लोगों को चुनकर भेजेंगे व बुरे काम ही करेंगे अभी तो आप ऐसा चुनाव करते हैं कि एक व्यक्ति है उसने 100 मर्डर किए दूसरे ने 90 मर्डर किए आप 90 वाले को वोट दे देते हैं वो 90 वाला जब चुनकर जाता है तो वो 150 मर्डर करा देता है व उसका बाप निकलता है पिछले वाले का ऐसा चुनाव बंद कर दीजिए और स्वामी रामदेव जी ने अभी भारत स्वाभिमान करके अभियान शुरू किया है उसका तो यह मुद्दा है ईमानदार चरित्रवान पारदर्शी साहसी पराक्रमी यह पांच सूत्र है ईमानदार चरित्रवान साहसी पराक्रमी और पारदर्शी ऐसे गुण जिसमें भी है वह सबको चुनवा करर संसद में भेजना लोकसभा में विधानसभा में भेजना इसके लिए भारत स्वाभिमान मंच बना दिया अभियान शुरू कर दिया उ मैं उसी अभियान का एक कार्य करने वाला व्यक्ति हूं हमारे रवि भाई राणा भी उस अभियान के साथ जुड़े हुए हैं यहां बहुत सारे जो पतंजलि योग समिति के कार्यकर्ता बैठे होंगे वह भी उस अभियान के अंग हैं तो इस अभियान को लेकर दो साल स्वामी रामदेव जी और मैं भारत के 600 जिलों का प्रवास करने जा रहे हैं और 600 जिलों का प्रवास करके हर जगह एक ही बात कहने जा रहे हैं कि आपके मतदान के समय ध्यान दीजिए वोट देते समय ऐसे व्यक्तियों को जो विदेशी कंपनी का बहिष्कार करते हो गेट करार को रद्द कराने की बात करते हो अंग्रेजों के जमाने के बनाए हुए कानूनों को खत्म कराने की बात करते हो ऐसे 1520 मुद्दे तय हुए हैं उसके आधार पर आप वोट करिए और यह बात कहने के लिए स्वयं रामदेव जी जाने वाले हैं 600 जिलों में मैं जाने वाला हूं और ऐसे दूसरे भी साधु संत जाने वाले हैं 600 जिलो आपको सुनकर हैरानी होगी श्री श्री रवि शंकर जी उनका पत्र आ गया कि हम आपके साथ इस पूरे अभियान में हैं हमारे देश के महामंडलेश्वर बहुत बहुत बहुत पूजनीय सत्यमित्रानंद जी गिरी वह परसों हमारे साथ थे हरिद्वार में उनका पूरा आशीर्वाद है कि अगर यह काम के लिए आप निकलते हैं तो मैं भी आपके साथ मुरारी बापू जी का संपूर्ण आशीर्वाद इस बात के लिए 15 बड़े साधु संत जिनके एकएक के एक एक कोटि से ज्यादा फॉलोअर है एक एक कोटि से ज्यादा जिनके फॉलोअर ऐसे 15 संत एक साथ भारत के 600 जिलों का प्रवास शुरू करने जा रहे हैं अगले दो साल और यह प्रवास इसी बात के लिए है कि हमको गेट करार नहीं चाहिए मल्टीनेशनल नहीं चाहिए डब्ल्यूटीओ नहीं चाहिए विदेशी करण जो हो रहा है इस देश का वोह नहीं चाहिए कर्ज बाजारी जो बढ़ रही है शेतकरी समाज की और देश की वो नहीं चाहिए तो इन सब बातों को लेकर जब साधु संत निकल रहे हैं समाज में तो आप जान लीजिए परिवर्तन तो अब होगा इस देश में क्योंकि जब भी भारत का सन्यासी और साधु निकला है तो उसने देश और समाज को बदला है यह हमारा हजारों साल का इतिहास है आप कभी भी उठा के देख सकते साधु समाज संत समाज जब भी निकला है समाज उसके पीछे चला है और हमारे यहां की राजनीतिक व्यवस्था तो हमेशा संत समाज के नीचे रही है संत समाज ऊपर रहा है राज्य व्यवस्था हमेशा उसके नीचे रही है संत समाज के आशीर्वाद से हमारे यहां राजा काम करते रहे हैं आपको मालूम है भारत के महान महान राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हर्षवर्धन सम्राट अशोक समुद्रगुप्त ये जितने बड़े महान महान चक्रवर्ती सम्राट हुए इन सबका नियम था कि दरबार में अगर कोई साधु आ गया तो यह राजा अपना सिंहासन छोड़ता था और साधु सिंहासन पर बैठता था मतलब साधु के लिए सन्यासी के लिए सिंहासन खाली है राजा उसके चरणों में बैठता था इसका मतलब यह है कि साधु समाज संत समाज और धर्म सत्ता हमारी राज्य सत्ता को निर्देशित करती थी तो जब तक भारत की धर्म सत्ता राज्य सत्ता को निर्देशित करती थी तब तक भारत सोनी की चुड़िया था चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का समय देख लो भारत सोने की चुड़िया था समुद्रगुप्त का समय देख लो भारत सोने की चुड़िया था हर्षवर्धन का समय देख लो भारत सोने की चुड़िया था सम्राट अशोक का समय देख लो भारत सोने की चुड़िया था जब जब धर्म सत्ता ऊपर रही है राज्य सत्ता नीचे रही है भारत सोने की चिड़िया रहा लेकिन जब विदेशियों का हमला हुआ और विदेशियों ने आकर यहां पर साम्राज्य स्थापित कर लिया तो धर्म सत्ता पीछे चली गई राज्य सत्ता ऊपर आ गई तब से भारत नीचे रसातल में गिरता ही जा रहा है गिरता ही जा रहा है गिरता ही जा रहा गिरता जा रहा और इतना गिर गया है कि अब उठने के लिए लोगों को भरोसा खत्म हो गया है कि यह देश फिर से उठ सकता है गरीबी बढ़ी व्यभिचार बढ़ा पापा चार बढ़ा अत्याचार बढ़ा भ्रष्टाचार बढ़ा जब से हमारा समाज पीछे हो गया राज्य सत्ता आगे हो गई धर्म सत्ता नीचे आ गई राज्य सत्ता ऊपर हो गई सारी गड़बड़ी हो गई अब फिर से धर्म सत्ता आगे आ रही है स्वामी रामदेव जी धर्म सत्ता के प्रतीक है स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी धर्म सत्ता के प्रतीक है महामंडलेश्वर जितने इस देश में धर्म सत्ता के प्रतीक है हमारे देश के जितने भी ऐसे महान महान मुरारी बापू धर्म सत्ता के प्रतीक है आसाराम बापू धर्म सत्ता के प्रतीक है तो ये धर्म सत्ता के प्रतीक ऐसे बड़े साधु पुरुष सन्यासी सब एक साथ इकट्ठे हो रहे हैं 3 अप्रैल को हरिद्वार में एक बड़ा सम्मेलन होने जा रहा है उसमें घोषणा होने जा रही है उस सम्मेलन के बाद यह घोषणा होगी और सारे देश में इन साधु संतों के प्रवास शुरू हो जाएंगे अगले दो-तीन वर्षों में आप देखेंगे नए-नए लोग निकल कर आएंगे नए-नए पुढारी निकल कर आएंगे नए-नए खासदार निकलेंगे नए-नए आमदार निकलेंगे जो इन साधु संतों के आशीर्वाद से संसद और विधानसभाओं में जाएंगे और देश की व्यवस्था परिवर्तन करने का काम शुरू हो जाएगा तो मैं आपको यह व्यवस्था परिवर्तन के काम के लिए निमंत्रण देने आया आपको निवेदन करने आया कि आप भी इस अभियान में जुड़ जाइए शामिल हो जाइए भारत स्वाभिमान का जो अभियान शुरू हो रहा है आप भी इसके सक्रिय सदस्य बन जाइए इसके सदस्य बनने के लिए जो भी माहिती है वह आपको यहां पतंजलि योग समिति के लोग दे देंगे रवि भाई राणा भी आपको माहिती दे देंगे उसके माहिती पत्रक हैं वो आप ले जाकर ध्यान से पढ़ लीजिए माहिती पत्रक भरकर आप उनको जमा कर दीजिए जमा करके आप भी हमारे साथ सदस्य हो जाएंगे फिर आप भी इस जिम्मेदारी में आ जाएंगे और आप भी इस काम को आगे बढ़ाने के लिए हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस लड़ाई को लड़ेंगे और इस लड़ाई को जीतेंगे मैं यह कहते हुए मेरा व्याख्यान समाप्त कर रहा हूं कि इस डब्ल्यूटीओ के खिलाफ की लड़ाई को मल्टीनेशनल के खिलाफ की लड़ाई को हम लड़ेंगे और जीतेंगे लड़ेंगे और जीतेंगे लड़ेंगे और जीतेंगे आप सभी का आभार बहुत धन्यवाद
Rajiv Dixit.
Rajiv Dixit Lecture
pallavi priya prakashan
