Rajiv Dixit Lecture 26 June 2009



आपके जोरदार कटल धनि के बीच में मंच पर आमंत्रित कर रहा हूं आदरणीय राजीव भाई जी को जिनका जीवन पूर्ण रूपन समाज और राष्ट्र को समर्पित है उनके हृदय में एक आग है कि समाज और राष्ट्र अपने उस स्वर्णिम युग को प्राप्त हो भारत पुनः वैभवशाली हो भारत पूर्ण आजादी को प्राप्त हो और इस अभियान को वह स्वदेशी के माध्यम से स्वदेशी विचारधारा के माध्यम से जन जन तक पहुंचाने का बहुत पुनीत कार्य कर रहे हैं उनका इतिहास पर एक गहरा गहरी पकड़ है व एक भारत के वरिष्ठ चिंतक हैं और आज का उनका विषय भी इसी संदर्भ में है उनका विषय है विदेशी कंपनियों की लूट आप सब लोग जानते हैं आज से 62 वर्ष पहले जब भारत आजाद हुआ तो एक ब्रिटिश एंपायर से वहां आजादी प्राप्त हुई थी और यदि और 1 स वर्ष पहले चले तो जहांगीर के दरबार में एक अंग्रेज आया था उस अंग्रेज ने आकर एक फरियाद की थी कि मुझे व्यापार करना है और उसकी इस मांग पर उस तत्कालीन मुगल शासक ने उन्हें व्यापार करने का अधिकार दे दिया था एक कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार करने के नाम पर इस देश में इतनी घुसपैठ की कि भारत को डेढ स वर्ष तक गुलाम बनाए रखा और आज तो 5000 विदेशी कंपनियां भारत में घुसपैठ कर चुकी हैं आने वाला भविष्य क्या होगा किस खतरे में भारत जूझ रहा है एक ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1 स वर्ष तक भारत को गुलामी के अंधकार में झोंक दिया था इन 5000 विदेशी कंपनियों के साथ भारत कितने बड़े गर्त में जाने वाला है शायद इसको लेकर भारत का नेतृत्व मोन है परंतु भारत स्वाभिमान भारत के खोए हुए वैभव को भारत की खोई हुई संस्कृति को वापस लाने में कृत संकल्प है परम पूज्य स्वामी जी महाराज का यह आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन दिन दुनी और रात चौगुनी उन्नति करते हुए आज करोड़ों लोगों की जुबान पर एक ही नाम है कि भारत में कोई बदलाव कर सकता है तो एक ही शख्स कर सकता है और वह शख्स का नाम है पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एक ही संस्था इस अभियान को बुलंदी तक ही नहीं निर्णायक मोड़ तक लेकर जा सकती है भारत को पुनः विश्व गुरु के पद पर पहुंचा सकती है और उस संस्था का नाम है भारत स्वाभिमान और उस स्वाभिमान के हमारे स्वाभिमानी सेनानी हमारे बीच में है भारत ने राजनीतिक रूप से भी पूर्णतः आजादी प्राप्त नहीं की थी चाहे वह प्रशासनिक स्तर रहा हो चाहे वह शिक्षा की बात हो तो हम अभी आधी अधूरी आजादी में जी रहे हैं अभी पूर्ण आजादी की लड़ाई लड़ना बाकी है और उस लड़ाई में हमारे लिए सबसे बड़ी विरोधी ताकतों का कार्य करेंगी य विदेशी कंपनियां यह उन विरोधी ताकतों के साथ खड़ी हुई मिलेंगी इस बात का दंश इस बात को लेकर पूज्य स्वामी जी के हृदय में गहरी पीड़ा है उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की पेप्सी के खिलाफ कोका कोला के खिलाफ पे पदार्थों के खिलाफ भारत के लोगों ने उसको समझा और आज इन विदेशी पे पदार्थों कंपनियों के 60 प्र तक की सेल डाउन आ चुकी है वह लोग मारे मारे फिर रहे हैं अर्थात भारत का व्यक्ति जानता है समझ सकता है परंतु कोई समझाने वाला व्यक्ति चाहिए तो आज पूज्य स्वामी जी के हृदय के भावों को उनकी पीड़ा हों को आदरणीय राजीव भाई इस मंच से स्वर देने वाले हैं आपकी जोरदार कतल ध्वनियों के बीच में मैं उन्हें आमंत्रित कर रहा हूं उनके उद्बोधन के लिए आय राजीव भाई मातरम मातम भारत स्वाभिमान के सभी सम्माननीय कार्यकर्ता मित्रों आज मुझे आपके सामने एक विषय प्रस्तुत करना है और वह विषय है भारत में विदेशी कंपनियों की लूट यह विषय अपने भारत स्वाभिमान के जो नीतियां हैं उद्देश्य हैं उनका सबसे प्रमुख विषय है आप अगले पाच दिन लगातार परम पूजनीय स्वामी जी का जब बार-बार प्रवचन सुनेंगे सुबह के में या दोपहर के सत्र में तो स्वामी जी आपको एक संकल्प कराकर भेजेंगे वह संकल्प अगर आप ध्यान से सुनेंगे तो उस संकल्प में तीन बातें हैं पहला संकल्प है कि प्रतिदिन में माने आप हम सब एक घंटे योग और प्राणायाम करेंगे यह पहला संकल्प है दूसरा संकल्प है कि हम अपने जीवन में खुद प्राणायाम करेंगे एक घंटे योग करेंगे और दूस दस को भी एक घंटे कम से कम योग और प्राणायाम कराएंगे तो यह पहले संकल्प का दूसरा हिस्सा दूसरा संकल्प है कि हम अपने जीवन में यम नियम का पूरी तरह से पालन करेंगे और तीसरा और आखिरी संकल्प है कि अपने जीवन में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का पूर्ण आग्रह रखेंगे शून्य तकनीकी के क्षेत्र में शून्य तकनीकी आप सब समझते हैं जिस को करने में जिस वस्तु को बनाने में बड़ी मशीनों की जरूरत नहीं पड़ती वह सब शून्य तकनीकी तो हम अपने जीवन में शून्य तकनीकी से बनी हुई वस्तुओं को स्वदेशी कंपनियों की ही खरीदेंगे विदेशी नहीं खरीदेंगे यह तीसरा और आखिरी संकल्प आपको कराया जाएगा तो आप सोचिए कि यह हमारे संकल्प का हिस्सा है कि हम स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करें अपने जीवन में और दूसरों को भी उपयोग करने के लिए प्रेरित करें तो आखिर यह जरूरत हमें क्यों पड़ रही है स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने की अपने जीवन में और दूसरों को उपयोग करने के लिए प्रेरित करने की उनके जीवन में यह विषय हम ठीक से समझे और हम दूसरों को समझा सके उस दृष्टि से मैं आपसे कुछ बातें करूंगा जो बातें आपको मेरी लगे बहुत काम की है उपयोग की हैं उनको तुरंत आप लिख ले क्योंकि बार-बार ऐसे व्याख्यान नहीं हो पाते हैं तो आप जरूर लिख लेंगे कभी भी आप कॉपी खोलकर देखेंगे तो याद आ जाएगा और किसी से बात करेंगे तो आप वह सब सूचनाओं को जानकारियों को दूसरे को प्रेषित कर सकेंगे तो इस दृष्टि से आपकी कॉपी पेन तैयार रहे खुले रहे भारत देश में आजादी के 62 साल के बाद हमें भारत स्वाभिमान की तरफ से या परम पूजनीय स्वामी रामदेव जी को स्वदेशी आंदोलन चलाने की जरूरत क्यों पड़ गई है यहां से मैं बात शुरू करता हूं अगर आपने भारत का इतिहास पढ़ा होगा थोड़ा बहुत तो आपको भारत के इतिहास में यह बात पता चलेगी कि सन 1905 में इस देश में हमारे देश के एक बड़े महान क्रांतिकारी श्री लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वदेशी आंदोलन चलाया था और इतिहास के पन्ने जब आप पलट तो पता चलेगा कि ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी इस देश में श्री लाला लाजपत राय ने स्वदेशी आंदोलन चलाया था और इतिहास को पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि भारत देश के एक महान क्रांतिकारी श्री विपिन चंद्र पाल ने स्वदेशी आंदोलन चलाया था और इतिहास में आपने पढ़ा होगा लाल बाल पाल यह तीन नेताओं का तिकड़ी था लाल माने लाला लाजपतराय बाल माने विपिन चंद्रपाल सॉरी बाल माने श्री बाल गंगाधर तिलक और पाल माने श्री विपिन चंद्र पाल यह तीन बड़े क्रांतिवीर नेता थे जिन्होंने सन 1905 में स्वदेशी आंदोलन चलाया था और उस स्वदेशी आंदोलन में सबसे पहली सभा हुई थी पुणे में महाराष्ट्र का पुणे नाम का शहर है यह जो महाराष्ट्र से आए हुए कार्यकर्ता हैं अगर पुणे के होंगे तो पुणे में एक बड़ा ऐतिहासिक स्थान है उसका नाम है शनिवार वाड़ा पुणे शहर के मध्य में एक बहुत बड़ा चौक है बहुत बड़ा स्थान है शनिवार वाड़ा वहां पर सन 1905 के दिसंबर महीने में 7 तारीख को विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई थी और पूरे पुणे शहर से लोगों ने घर से अंग्रेजों के बनाए हुए कपड़े निकालकर वहां लाकर जला दिए थे अपनी इक्षा से और वह आयोजन किया था श्री लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पुणे में ही रहते थे उनका निवास स्थान पुणे में था महाराष्ट्र के और पश्चिम भारत के उस समय के सबसे बड़े नेता थे और जिस समय यह हुआ था उस समय महात्मा गांधी भारत में नहीं थे यह घटना है सन 1905 की महात्मा गांधी भारत में आए सन 1915 में तो गांधी जी के आने के 10 साल पहले इस देश में स्वदेशी आंदोलन शुरू हो गया शुरुआत कैसे हुई पुणे के शनिवारवाड़ा में 7 दिसंबर 1905 को विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और उसमें आग लगाई श्री बाल गंगाधर तिलक ने वहां से यह आंदोलन शुरू हुआ उसके बाद भारत के हर बड़े शहर में अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाना लोगों ने शुरू कर दिया था आपको सुनकर हैरानी होगी कि 1905 से यह आंदोलन शुरू हुआ एक शहर के एक मोहल्ले से और 1911 तक आते-आते छ वर्ष में यह स्वदेशी आंदोलन संपूर्ण भारत देश के एक-एक शहर में फैल गया एक एक शहर में पुणे में मुंबई में हैदराबाद में सिकंदराबाद में बेंगलोर में मद्रास में आगरा में अलीगढ़ में मेरठ में सहारनपुर में दिल्ली में ऐसे भारत के लगभग 600 बड़े स्थानों पर यह पूरे तेजी से आंदोलन फैल गया और आपको यह सुनकर भी हैरानी होगी कि श्रीमान लोक बाल गंगाधर तिलक एक बड़े नेता लाला लाजपत राय दूसरे बड़े नेता और विपिन चंद्रपाल तीसरे बड़े नेता विपिन चंद्रपाल बंगाल के बड़े नेता थे उस समय लाला लाजपत राय उत्तर भारत के पंजाब हरियाणा इसके बड़े नेता थे और लोकमान्य तिलक महाराष्ट्र और पूरे पश्चिम भारत के तीन नेताओं के कहने से आंदोलन शुरू हुआ और 6 साल में इस आंदोलन के एक करोड़ 24 लाख कार्यकर्ता पूरे देश में तैयार हो गए मात्र 6 साल आंदोलन क्या था अंग्रेजों के बनाए गए कपड़ों का बहिष्कार करना है और अंग्रेजी कपड़े किसी के शरीर पर हो तो उतार कर जला देना है किसी के घर में है तो निकाल कर जला देना है हर तरह से अंग्रेजी कपड़ों का बहिष्कार करना है और अंग्रेजी कपड़ों के अलावा अंग्रेजों की बनाई गई हर वस्तु का बहिष्कार करना उस जमाने में हमारे देश में ज्यादातर चीजें जो थी ना वह इंग्लैंड से आती थी बनके कपड़ा इंग्लैंड से आता था चीनी इंग्लैंड से आती थी चीनी माने शक्कर जिसको आज हम शुगर अंग्रेजी में कहते हैं यह इंग्लैंड से आती थी तो हिंदुस्तान के स्वदेशी आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने अंग्रेजी कपड़े का जैसे बहिष्कार किया वैसे अंग्रेजी चीनी का बहिष्कार कर दिया लोगों ने चीनी खाना बंद कर दिया आप सोच सकते हैं तो आप बोलेंगे फिर क्या किया अंग्रेजों की बनाई गई चीनी खरीदना तो बंद कर दिया और भारत के गांव-गांव के किसानों ने उसके विकल्प में गुड़ बनाना शुरू कर दिया और गुड़ खाकर अपना जीवन चलाना शुरू कर दिया अंग्रेजी चीनी नहीं खाएंगे अंग्रेजी कपड़े नहीं पहनेंगे अंग्रेजों के देश में से उस जमाने में ब्लेड आता था भारत में दाढ़ी बनाने वाला तो भारत के लोगों ने अंग्रेजी ब्लेड से दाढ़ी बनाना बंद कर दिया और भारत के नाइयों ने भी अंग्रेजी ब्लेड से दाढ़ी बनाना बंद कर दिया और उसकी जगह भारत में में उस्तरा बना लिया उन्होंने उस्तरा आप जानते हैं जिसको ऐसे ऐसे करके तेज करते हैं तो उतरे से दाढ़ी बनाना शुरू कर दिया अंग्रेजी ब्लेड का पूरी तरह से बहिष्कार एक भी नाई की दुकान पर सन 1905 में कोई जाता था दाढ़ी बनाने के लिए तो उस तरह से दाढ़ी बनाई जाती थी ब्लेड बंद कर दिया इस्तेमाल करना इसी तरह से अंग्रेजों के देश से बनकर एक चीज आती थी जिसको नील कहते हैं नील की खेती भारत में होती थी उसका कच्चा माल यहां से इंग्लैंड जाता था और फिर नील बनके आता था जो कपड़े में हम लगाते हैं सफेद कपड़े में तो भारत के करोड़ों लोगों ने अंग्रेजों का नील कपड़े में लगाना बंद कर दिया इसी तरह से अंग्रेजों के देश में से 60 70 तरह की चीजें आती थी उन सब चीजों का एक-एक करके भारत के लोगों ने बहिष्कार कर दिया खरीदना बंद कर दिया और अंग्रेजों की यह चीजें जिन दुकानों पर बिकती थी वहां पर लोग जाकर सत्याग्रह करते थे जैसे अंग्रेजी वस्तु बेचने की दुकानें होती हैं ना आज भी हमारे देश में बड़े-बड़े शहरों में विदेशी माल बेचने की दुकान होती है ना उसमें लिखा रहता है विदेशी माल ऐसे ही अंग्रेजों के जमाने में होता था अंग्रेजी माल की दुकानें होती थी वहां पर यह लोकमान्य तिलक लाला लाजपत राय विपिन चंद्र पाल के जो कार्यकर्ता होते थे स्वदेशी आंदोलन के वह जाकर सत्याग्रह करते थे और जो व्यक्ति दुकान में घुसता था कोई भी सामान खरीदने केलिए लिए उससे वह सामान छीन लेते थे और वहीं आग लगा देते थे उसको कभी-कभी झगड़ा हो जाता था क्योंकि सामान खरीदने के लिए जो आदमी जा रहा है वह गुस्सा होता था कि हमने तो पैसा खर्च कर दिया और तुमने हमारा सामान छीन के जला दिया तो स्वदेशी आंदोलन के कार्यकर्ता अपनी जेब से निकाल के उसका पैसा उसको दे देते थे कहते थे तुम जाओ और इस पैसे से कोई स्वदेशी माल खरीद के इस्तेमाल करो विदेशी माल मत खरीदो कार्यकर्ताओं का उत्साह इतना जबरदस्त होता था कि अगर किसी ने विदेशी माल के खरीदे जाने के बाद उसका छीन लिया जला दिया गुस्सा किया तो कार्यकर्ता अपनी जेब से निकाल के उसको पैसा दे देते थे कि देखो तुम्हारे सामान का पैसा हमने दे दिया तो माल खरीद के जला देते कहीं-कहीं तो ऐसा होता था कि जबरदस्ती कुछ ऐसे लोग होते थे जो अंग्रेजी मानसिकता के जैसे आज होते हैं ना अंग्रेजी मानसिकता के बहुत सारे लोग होते हैं वो कहते हैं हमको तो विदेश माल ही चाहिए हमको तो विदेशी वस्तु ही चाहिए क्योंकि उसकी क्वालिटी अच्छी होती है ऐसे उस जमाने में भी थे कि हमको तो विदेशी माल ही खरीदना है तो ऐसे लोग जब दुकानों में घुसते थे जबरदस्ती कि हमको तो विदेशी माल खरीदना है तो स्वदेशी आंदोलन के कार्यकर्ता सड़क पर उनके सामने लेट जाते थे जमीन पर दुकान का दरवाजा होता है ना उसमें जमीन पर लेट जाते थे और कहते थे हमारी छाती पर पैर रखो तब अंदर जाओ तो डर के मारे बहुत सारे लोग पीछे हट जाते थे और ऐसे भी स्वदेशी आंदोलन में कार्यकर्ता हुए हैं एक बड़े महान कार्यकर्ता जिनका नाम बहुत कम लोग जानते हैं स्वदेशी आंदोलन के थे उनका नाम था बाबू गेनू मराठी व्यक्ति थे महाराष्ट्र के थे मुंबई में रहते थे उन्होंने एक टोली बना रखी थी और वो टोली क्या करती थी पूरे मुंबई शहर में घूम घूम के वो टोली यह पता करती थी कि विदेशी माल की कौन-कौन सी गाड़ियां कहां कहा आ रही है कहां-कहां गाड़ियां आ रही है क्योंकि अंग्रेजों के जमाने में कुछ गाड़ियां चलने लगी थी उनमें विदेशी माल भर भर के आता था बाहर से तो बाबू गेनू और उनके सहयोगी कार्यकर्ता घूमते थे मुंबई में रात को चौकीदारी करते हुए घूमते थे और पता करते थे कि कहां विदेशी माल की गाड़ी आई और जहां उनको पता चला कि विदेशी माल की गाड़ी आई बस वहीं गए और गाड़ी में आग लगाई जला दिया उसको ऐसा उनका काम था एक बार तो क्या हुआ कि बाबू गेनू और अपने सहयोगी उनके कार्यकर्ताओं के साथ मुंबई में आप जानते हैं ना बंदरगाह है जहां पर पानी के जहाज आते हैं तो विदेशों से माल उतरता है और विदेशों में माल भी जाता है तो इंग्लैंड से विदेशी माल का लदा हुआ एक बड़ा पानी का जहाज आया जिसमें हजारों टन माल लगा हुआ था बाबू गेनू और उनके सहयोगियों को पता चल गया कि यह तो विदेशी माल आ रहा है पहुंच गए बंदरगाह पर और पूरे बंदरगाह को घेर लिया उन्होंने और उन्होंने संकल्प ले लिया और कसम खाली कि इस एक भी विदेशी माल को हम यहां उतरने नहीं देंगे और बंबई शहर में घुसने नहीं देंगे तो क्या हुआ आप जानते हैं पानी के जहाज से माल उतारा जाता है फिर ट्रकों में लादा जाता है फिर वो गाड़ियों में लता है फिर उसके बाद वह गाड़ियां गांव-गांव चली जाती है माल बांटने के लिए तो ऐसा ही हो गया तो बाबू गेन ने क्या किया कि एक गाड़ी ऐसी ही विदेशी माल की भरी हुई जाने की तैयारी में थी बाबू गेनू उसके आगे लेट गए और अंग्रेज उसको चला रहा था तो अंग्रेज ने कुछ नहीं देखा और बाबू गेनू के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी बा तो स्वदेशी आंदोलन ने ऐसे ऐसे संकल्प वान कार्यकर्ता पैदा किए कि उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना विदेशी माल को शहर में जा ने से रोकने के लिए गाड़ी के नीचे लेट गए और एक अंग्रेज ड्राइवर ने गाड़ी चढ़ा दी और बाबू गेनू का स्वर्गवास हो गया शहादत उनकी हो गई ऐसे संकल्प वान स्वदेशी कार्यकर्ता पैदा हुए थे और इनकी संख्या कितनी थी 1 करोड़ 24 लाख के आसपास पूरे देश में यह कार्यकर्ता थे आखिर यह सारे के सारे कार्यकर्ता विदेशी माल नहीं बिकने देंगे और विदेशी माल का उपयोग नहीं होने देंगे यह संकल्प लेकर क्यों काम कर रहे थे कारण ऐसा था कि उस जमाने में ईस्ट इंडिया कंपनी का माल पूरे भारत में बिकता था और उस माल की बिक्री से हर साल ईस्ट इंडिया कंपनी को करोड़ों रुपए का फायदा होता था आज के हिसाब से अगर मैं बात करूं तो एक साल में ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत देश में अपना माल बेचकर करीब करब 21 हज करोड़ रुपए का फायदा होता था आज के हिसाब से बात करो 5 के आंकड़े बताते हैं दस्तावेज बताते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी एक साल में 7 करोड़ रुपए का नेट प्रॉफिट कमाती थी इस देश में से और उस जमाने का एक रुपया 2009 के 00 के बराबर है इस समय 1905 में एक रुपए की जितनी कीमत होती थी आज सन 2009 में उतनी ही कीमत 00 की है इसका मतलब क्या है रुपए का अवमूल्यन 1900 पा से आज तक 300 गुना हो चुका है तो 300 का गुणा कर लो 70 करोड़ में लगभग 21000 करोड़ रुपए आज के मूल्य के हिसाब से ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कमाती थी उनका सामान बेचकर यहां से पैसा कमाती थी तो समस्या क्या होती थी हर साल भारत का 21000 करोड़ रुपए लंदन चला जाता था और यह सिलसिला कब से चल रहा था जब से ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में आई तब से आपको मालूम है ईस्ट इंडिया कंपनी सन 1618 में भारत आ गई थी अपने जयदीप भाई थोड़ी देर पहले आपसे कह रहे थे एक राजा था इस देश में उसका नाम था जहांगीर जहांगीर के दरबार में ईस्ट इंडिया कंपनी का सबसे पहले एक एजेंट आया था उसका नाम था टॉमस रो उसको अंग्रेज लोग थॉमस रो भी कहते हैं टॉमस रो भी कुछ लोग बोलते हैं थॉमस रो भी बोलते हैं तो टॉमस रो सबसे पहले आया 1618 में और उसने जहांगीर के सामने एक पत्र प्रस्तुत किया और कहा कि हमको भारत में व्यापार करने का लाइसेंस चाहिए वह आप दे दो तो यह जो पत्र था वह अंग्रेजी भाषा में था तो अंग्रेजी भाषा में उन्होंने कहा हमको ट्रेडिंग लाइसेंस चाहिए माने ट्रेड करने के लिए लाइसेंस चाहिए जहांगीर को ज्यादा अंग्रेजी आती नहीं थी हमारे देश में ऐसे बहुत सारे राजा हुए जिनको अंग्रेजी नहीं आती थी तो इसमें कोई शर्म की बात नहीं है क्योंकि अंग्रेजी हमारी भाषा नहीं थी जहांगीर को उर्दू आती थी फारसी आती थी हिंदी आती थी अंग्रेजी नहीं आती थी पत्र अंग्रेजी में प्रस्तुत किया गया तो जहांगीर ने अपने एक दरबारी से वह पत्र पढ़वाओ इसमें क्या लिखा हुआ है तो उस दरबारी ने आधा सच आधा झूठ बताया क्योंकि वह दरबारी अंग्रेजों से मिला हुआ था थॉमस रो ने उसको पहले ही रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया था कि इस पत्र का अगर भाषांतर पूछेगा जहांगीर तो क्या बताना है तो क्या बताया उसने उसने कहा कि यह पत्र है ईस्ट इंडिया नाम की इंग्लैंड की कंपनी का है यह आपसे व्यापार करने का लाइसेंस मांग रहे हैं तो जहांगीर ने पूछा व्यापार क्या करोगे भाई कुछ खरीदोगे कुछ बेचो ग तभी तो व्यापार होता है ना लेकिन इंग्लैंड में व्यापार का मतलब कुछ और होता था उस जमाने में अंग्रेजों की जो डिक्शनरी है ना मूल डिक्शनरी उसको कहते हैं वेबस्टर डिक्शनरी वेबस्टर डिक्शनरी अगर आपको मिल जाए 17वीं शताब्दी की तो आप जरूर उसमें ढूंढ सकते हैं उसमें व्यापार का मतलब क्या होता है अंग्रेजी का शब्द है टी आर ए डी ई ट्रेड हम ट्रेड का मतलब निकालते हैं व्यापार इंग्लैंड में ट्रेड का अर्थ होता था लूटमार और सारा झमेला यहीं से शुरू हो गया उसमें लिखा गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में ट्रेड करेगी तो जहांगीर के दरबारी ने समझा कि यह व्यापार करेंगे व्यापार करेंगे तो क्या करेंगे कुछ खरीदेंगे कुछ बेचेंगे तो जहांगीर को लगा इसमें आपत्ति क्या है हमारे यहां से कुछ खरीद के ले जाएंगे और हमको कुछ बेचेंगे इसमें आपत्ति क्या है जहांगीर को उस दरबारी ने यह नहीं बताया कि ट्रेड का असली मतलब होता है लूटमार लूट लेना किसी को इंग्लैंड में 17वी शताब्दी में 16वीं शताब्दी में ट्रेड शब्द का अर्थ इस्तेमाल होता था लूटमार के लिए तो जब पत्र प्रस्तुत हुआ जहांगीर के सामने तो जहांगीर ने कहा ठीक है व्यापार ही तो करेंगे दरबारी ने कहा कुछ खरीदेंगे कुछ बचेंगे वास्तव में उनकी मंशा क्या थी लूटमार का लाइसेंस लेने के लिए तो जहांगीर ने हां कर दिया जहांगीर अगर यह कर लेता कि वह पत्र किसी दूसरे को पढ़वाओ कर दिए ईस्ट इंडिया कंपनी को लूटमार करने का लाइसेंस मिल गया और जिंदगी भर ईस्ट इंडिया कंपनी जब तक भारत में रही वह उसी लाइसेंस को दिखाते थे कि देखो आपके राजा ने हमको लूटमार करने का लाइसेंस दिया है आपके राजा ने भारत के राजा ने हमको लाइसेंस दिया फिर ईस्ट इंडिया कंपनी को पूछा गया कि भाई आप कहां से व्यापार शुरू करेंगे या लूटमार शुरू करेंगे तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने कहा सूरत शहर से करेंगे सूरत ही क्यों भारत में तो ऐसे 600 से ज्यादा शहर थे आगरा था अलीगढ़ था बरेली था दिल्ली था शाजापुर था सहारनपुर था रुड़की था हरिद्वार था ऐसे 600 से ज्यादा शहर थे सूरत ही क्यों कारण यह था कि उस जमाने में सूरत भारत का सबसे बड़ा पैसे वाला शहर था आज मैं आपसे यह पूछूं कि भारत में सबसे ज्यादा पैसे वाला शहर कौन सा तो क्या कहेंगे आप मुंबई कहेंगे ना मुंबई को भारत की आर्थिक राजधानी कहा जाता है फाइनेंशियल कैपिटल भारत में मुंबई है सबसे ज्यादा पैसे वाला शहर मुंबई है सबसे ज्यादा टैक्स देने वाला शहर मुंबई है सबसे ज्यादा खर्चा करने वाला शहर मुंबई है सबसे ज्यादा टैक्स जहां इकट्ठा होता वह मुंबई है 1618 में मुंबई जैसा शहर होता था सूरत सूरत में सबसे ज्यादा था उस जमाने बहुत पैसा था सूरत में रहने वाले लोगों के पास कितना पैसा था उसके बारे में एक आपको कहानी सुनाता हूं एक अंग्रेज अधिकारी इस देश में आया उसका नाम था बर्नियर वह सूरत में घूमा और 17 साल रहा तो उसने वर्णन लिखा सूरत के बारे में तो कहता है कि मैं सूरत के किसी भी घर में गया तो हर एक घर में मैंने सोने के सिक्कों का ऐसा ढेर देखा जैसे गेहूं और चने का ढेर लगा रहता है हर एक घर में सोने के सिक्कों का ऐसा ढेर देखा जैसे घरों में गेहूं और चने का ढेर होता है और बर्नियर अपनी डायरी में लिखता है कि सूरत के लोग इतने मालदार हैं इतने पैसे वाले हैं कि किसी को पता ही नहीं है कि उसके पास कितनी संपत्ति है वह अपनी डायरी में लिखता है कि मैंने बहुत लोगों के घरों में पूछा कि आपके पास कितने सोने के सिक्के हैं तो हर एक ने मुझे जवाब दिया मालूम नहीं कितने सोने के सिक्के हैं क्योंकि गिने नहीं है और फिर वो बर्नियर कहता है यहां के लोग तो बोलते हैं कि ये सोने के सिक्कों को तराजू में तौल के रखते हैं 10 किलो 20 किलो 50 किलो 100 किलो गिनने की फुर्सत नहीं है किसी के पास इतने सोने के सिक्के घर-घर में है फिर वो अपनी डायरी में लिखता है कि अगर सूरत शहर को ही लूटना पड़े तो इसी एक शहर को लूटने में कम से कम हजार साल लग जाएंगे इतनी संपत्ति शहर में है सूरत बहुत पैसे वाला शहर था आप पूछेंगे भाई सूरत में पैसा कहां से आया इतने सोने के सिक्के कहां से आए सोने का सिक्का इस देश में सोना पैदा नहीं होता आपको मालूम है इस देश में सोने का उत्पादन ज्यादा नहीं होता सोने की एक ही खदान है इस देश में वह भी कर्नाटक में है कोला एक ही खदान है बाकी तो दूसरी है ही नहीं पूरे देश में तो जिस देश में सोने की एक ही खदान हो वहां लोगों के घर घर में सोने का ढेर लगा हो यह कहां से आया सूरत उस समय का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र था जैसे आज मुंबई है ना व्यापार का केंद्र वैसे सूरत था भारत का सारा माल विदेशों में बिकने के लिए सूरत से ही जाता था क्योंकि सूरत में बहुत बड़ा बंदरगाह हुआ करता था तो भर भर के पानी के जहाज भारत का माल सूरत से से बाहर जाता था विदेशों में और हमारा माल दुनिया के जिस देश में भी जाता था बिकने के लिए वहां हम अपना माल बेचते थे और बदले में सोना आता था हमारे देश में कारण क्या था 16वीं शताब्दी और 17वीं शताब्दी में व्यापार में जो माध्यम था ना एक्सचेंज का वह सोना था जैसे आज व्यापार में माध्यम है रुपया आप कोई चीज खरीदते हैं रुपए से कोई चीज बेचते हैं रुपए में 16वीं और 17वीं शताब्दी में कोई चीज खरीदी जाती थी सोने में और कोई चीज बेची जाती थी सोने में तो भारत से तरह-तरह की चीजें बिकने के लिए जाती थी उसमें सबसे ज्यादा बिकने के लिए जाता था कपड़ा भारत का क्योंकि भारत में कपड़ा सबसे अच्छी क्वालिटी का बनता था 17वीं शताब्दी में आपको मालूम है भारत के कपड़े की कहानी यहां पर ढाका की मलमल बनती थी मलमल नाम सुना है मलमल एक खास तरह का कपड़ा होता है ढाका एक शहर था इस देश में जो बांग्लादेश का अभी हिस्सा हो गया पहले वह भारत में था तो ढाका की मलमल बनती थी और 15 मीटर लंबा मलमल के कपड़े का थान तय करते जाओ करते जाओ करते जाओ तो माचिस की एक डिब्बी में आ जाता था इतनी बारीक बुनाई होती थी मलमल की ढाका में मलमल बनती थी सूरत में मलमल बनती थी मालवा में मलमल बनती थी आप में से कुछ कार्यकर्ता आए हैं मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश में एक इलाका जिसको मालवा कहते हैं इंदौर है उज्जैन है रतलाम है तो मालवा में जबरदस्त किस्म का कपड़ा बनता था भारत में ऐसे 350 से ज्यादा बड़े शहर थे जहां कपड़ा बनाने के बड़े-बड़े केंद्र चलते थे बहुत अच्छी क्वालिटी का कपड़ा बनता था दुनिया में कोई इतना अच्छा कपड़ा बना नहीं पाता था जो भारत में बनता था आप पूछेंगे भारत के कपड़े में ऐसी क्या खासियत थी कपड़े में खासियत यह थी कि भारत में कपास बहुत अच्छी क्वालिटी का होता था कपड़ा बनता है कपास से कपास हिंदुस्तान में सभी राज्यों में होता है उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम एक भी राज्य ऐसा नहीं भारत में जहां कपास नहीं होता तो अच्छी क्वालिटी का कपास पैदा होगा तो अच्छा कपड़ा बनेगा तो बहुत अच्छा कपड़ा भारत में बनता था और वह कपड़ा दुनिया के सब देशों में बिकने के लिए जाता था उसको बेचने के लिए पानी के जहाज लगते थे उस समय हवाई जहाज नहीं चलते थे तो सारे पानी के जहाज सूरत से कपड़ा भरकर देशों में जाया करते थे और उधर से सोना लेकर आया करते थे आपको इतिहास की यह जानकारी दूं तो आपको गर्व होगा भारत का कपड़ा जब पेरिस में बिकता था लंदन में बिकता था न्यूयॉर्क में बिकता था वाशिंगटन में बिकता था अमेरिका के कनाडा के आसपास के यूरोप के देशों में बिकता था तो तराजू में रखा जाता था भारत का कपड़ा तो जितने वजन का भारत का कपड़ा होता था उतने ही वजन का सोना हमें मिलता था अगर मान लीजिए हमने एक कपड़े का थान बेचा और वह 1 किलो का है तो 1 किलो सोना हमें मिलता था हमारे कपड़े की इतनी जबरदस्त क्वालिटी थी सारी दुनिया के लोग हमारा कपड़ा पहनते थे आपको सुनक ताज्जुब होगा रोमन साम्राज्य में 3000 साल जितने राजा हुए जितनी रानियां हुई सब भारत का कपड़ा पहनकर ही जिंदा रह थे 3000 साल रोमन साम्राज्य और जब रोमन साम्राज्य का पतन हो गया यूरोप और अमेरिका और यह कनाडा जैसे देश उभर आए तो फिर इनके यहां भारत का कपड़ा बिकने लगा तो हमारा कपड़ा बहुत जबरदस्त बिकता था उसके बदले में हमको सोना मिलता था कपड़े जैसी ही एक दूसरी चीज अपनी बहुत बिकती थी दुनिया के देशों में और वह थी भारत का लोहा स्टील हमारे भारत में कच्चे लोहे की बड़ी खदान हैं आप जानते कच्चा लोहा इस देश में बहुत होता है उड़ीसा में भरपूर मात्रा में है झारखंड में भरपूर मात्रा में है कर्नाटक में भरपूर मात्रा में है महाराष्ट्र में भरपूर मात्रा में है भारत के 12 राज्यों में कच्चा लोहा बहुत अधिक मात्रा में मिलता है तो लोहे की खदान बहुत है हजारों साल से कच्चा लोहा निकल रहा है और जिस देश में कच्चा लोहा निकलेगा वहीं पर स्टील बन सकता है स्टील बनाने के लिए कच्चा लोहा चाहिए तो भारत में कच्चा लोहा होता था हम उसका स्टील बनाते थे और 17वीं शताब्दी में 200 हज से ज्यादा फैक्ट्रियां थी जो स्टील बनाती थी इस देश में और इस क्वालिटी का स्टील बनाते थे इस देश में जिसमें कभी जंग नहीं लगता था आज 21वीं शताब्दी में सारी हाईफाई टेक्नोलॉजी के बाद जो स्टील बनता है उसमें जंग लग जाता है आपको मालूम है भारत के स्टील में जंग नहीं लगता था और अगर आप उसका प्रमाण देखना चाहे तो दिल्ली के पास मेहरोली नाम का एक छोटा सा गांव है वहां एक लह स्तंभ खड़ा हुआ है उसको जाकर देख लीजिए उसमें जंग का एक निशान नहीं है और सैकड़ों साल से वह पानी में बारिश में धूल में आंधी में धक्कड़ में खड़ा हुआ है एक रंच मात्र उस पर कहीं जंग नहीं आया इस क्वालिटी का स्टील इस देश में 3000 साल से बनता था और वो स्टील हम दूसरों को बेचते थे और आपको सुनक हैरानी होगी स्टील बेचकर भी हम सोना ही कमाते थे लोहा बेचकर हम सोना कमाते थे लोहा बेचा और सोना लाया हमने कपड़ा बेचा और सोना लाया इसी तरह से भारत की एक चीज बिकने के लिए जाती थी दुनिया के बाजार में वह थी ईंट ईंट समझते हैं घर बनाने वाली सबसे बेहतरीन क्वालिटी की ईंट भारत में ही बनती है पतली सी एकदम जिसकी उम्र 1000 साल तक है आपने पुराने किले देखें शिवाजी महाराज के किले महाराष्ट्र में जाकर देखिए राणा प्रताप का किला आप देखिए राजस्थान में जाकर देखिए चित्तौड़गढ़ में जितने पुराने किले हैं उसमें पतली पतली ईंट लगी हुई है ना हजारों साल उसकी उम्र होती है मोटी ईंट जल्दी टूटती है पतली ईंट टूटती नहीं है जल्दी तो पतली ईंट हम बनाते थे दुनिया के बहुत सारे देश हमसे ईंट खरीद के ले जाते थे ईंट को ईंट से जोड़ने के लिए हमारे यहां चूना बनता था चूना और व चूना दुनिया के देशों में हम बेचते थे तो हमारी ईंट बेचते थे तो भी हमको सोना चांदी ही मिलता था चूना बेचते थे तो भी सोना चांदी ही मिलता था कपड़ा बेचते थे तो भी सोना चांदी मिलता था लोहा बेचते थे तो भी सोना चांदी मिलता था भारत से मसाले जाते थे बिकने के लिए वह तो आप सभी ने पढ़ा होगा 36 तरह के मसाले जाते थे काली मिर्च जाती थी अजवाइन बिकने के लिए जाती थी इलायची बिकती थी बड़ी इलायची बिकती थी छोटी इलायची बिकती थी तेज पात बिकता था हमारे देश के 36 तरह के मसाले दुनिया भर में बिकते थे और उसके बदले में भी हमको सोना चांदी हीरे जवाहरात ही मिलते थे और 3000 साल भारत यह सारी चीजें दुनिया के देशों को बेचता था और जिस शहर से यह चीजें बिकने के लिए जाती थी उस शहर का नाम था सूरत तो सबसे ज्यादा पैसा कहां आता था सूरत में इसलिए सूरत के एक-एक घर के व्यापारी के पास ढेरों ढेरों सैकड़ों सैकड़ों क्विंटल सोना होता था यह अंग्रेजों ने दस्तावेजों में लिखा है जो मैं आपको सुना रहा तो सूरत इतना पैसे वाला शहर था इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने जहांगीर से कहा कि हमको सूरत में व्यापार करने का लाइसेंस चाहिए अब आप ध्यान देना जहां भी मैं बोलूंगा व्यापार वहां आप सोच लेना लूटमार क्योंकि उनके लिए ट्रेड का मतलब था लूटमार हमारे ट्रेड का मतलब था व्यापार तो उन्होंने लूटमार का लाइसेंस ले लिया जहांगीर भोला भोला सीधा-साधा उसने लाइसेंस दे दिया सूरत में जाकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना धंधा शुरू किया और क्या धंधा शुरू किया लूटमार करने का और वो लूटमार कैसे करते थे जिस व्यापारी के घर में उनको पता चल जाए अच्छा खासा सोना है बस उसी के घर में धावा बोलना जैसे डकैती डालते हैं लोग वैसे ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग डकती डाला करते थे सैनिकों की फौज खड़ी की एकएक घर में घुस गए मारपीट किया छीन छान के सोना ले आए और वह सोना फिर यहां से जहाजों पर लाद लाद कर इंग्लैंड भेजा करते थे ईस्ट इंडिया कंपनी का एक अधिकारी था उसका नाम था रॉबर्ट क्लाइव व 1750 में भारत आया था और 1757 में उसने एक युद्ध लड़ा था प्लासी का रॉबर्ट क्लाइव ने अपनी जीवनी में लिखा है कि मैंने भारत के कलकत्ता नाम के शहर से जब लूटमार की तो इतना सो सोना चांदी इकट्ठा हुआ था उसको लंदन लाने में 900 पानी के जहाज लगे 900 पानी के जहाज एक दो नहीं 900 900 शिप्स और जहाज बोल रहा हूं मैं नाव नहीं बोल रहा हूं जहाज नाव और जहाज में अंतर होता है एक जहाज उस जमाने में जो होता था उसमें 60 से 70 मीट्रिक टन माल आता था और एक मीट्रिक टन में 1000 किलोग्राम हो तो 900 पानी के जहाज भर के सोना चांदी लूटा था रॉबर्ट क्लाइव ने तो रॉबर्ट क्लाइव जैसे अंग्रेज अधिकारी जब आते थे तो वो ढूंढते थे कि भारत के किस शहर में ज्यादा सोना है वहीं पर जाकर पोस्टिंग करवाते थे और वहीं से लूटमार का धंधा शुरू करते थे तो ईस्ट इंडिया कंपनी का सबसे मुख्य काम था लूटमार घरों में घिसकर लूट लेना दुकानों में जाकर लूट लेना किसी के महल में जाकर लूट लेना छोटे-छोटे राजाओं को लूट लेना यह सब वह किया करते थे लूट लूट कर यहां से पैसे इकट्ठे किया करते थे और वह क्या-क्या लूटते थे हमारे देश का जो सोना चांदी था वह तो लूटते ही थे इसके अलावा कपड़ा बनाने वाले जो कारीगर होते थे ना उनका कपड़ा लूट लेते थे और कारीगर उनसे झगड़ा करें तो मारते थे उनको गोली मारते थे उनकी गर्दन काटते थे हाथ काट देते थे हाथ अंगूठे काट देते थे तो कारीगरों से कपड़ा लूट लिया व्यापारियों के घर में से सोने चांदी के सिक्के लूट लिए फिर किसी के पास से कुछ लूट लिया किसी के और जो कुछ लूटते थे वह फोकट में मिला ना उनको तो उसको ले जाकर वह बेचते थे लंदन में पेरिस में दूसरे शहरों के बड़े-बड़े बाजारों में और उससे जो मुनाफा होता था वह ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रॉफिट माना जाता था आपको सुनकर ताज्जुब होगा जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई थी तो उनके खजाने में पैसे नहीं थे ईस्ट इंडिया क कनी इंग्लैंड में दिवालिया कंपनी थी दिवालिया आप समझते हैं जिनके पास कुछ नहीं होता ठन ठन गोपाल एक धेला नहीं खजाने में ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई थी कुछ ऐसे लुटेरों ने जो समुद्र के पानी के जहाजों को लूटने का काम करते थे ईस्ट इंडिया कंपनी उन्होंने बनाई थी इंग्लैंड के कुछ लुटेरे थे जिनको कहा जाता था बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तो ईस्ट इंडिया कंपनी का जो बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स था वो बड़े-बड़े डॉन माफिया किस्म के लोग थे उस जमाने के उन्होंने बनाई थी वह कंपनी पैसे पास में थे नहीं उसको ले आए वह भारत में और सीधे लूटमार करना शुरू कर दिया तो पैसे आ गए उस पैसे से फिर सारा खेल खेलना उन्होंने शुरू किया पहले पैसे लूटे फिर उस पैसे से उन्होंने सैनिक रखना शुरू किया फिर सेना बढ़ गई तो और ज्यादा लूटमार करना शुरू किया जहां-जहां उनकी लूटमार होती थी स्थानीय राजाओं के साथ उनका संघर्ष होता था युद्ध होता था कभी ईस्ट इंडिया कंपनी जीत जाती थी कभी कोई राजा जीत जाता था जो राजा जीत जाता था वहां ईस्ट इंडिया कंपनी लूटमार नहीं कर पाती थी और जहां का राजा हार गया बस पूरी जगह को वो लूटते थे एक उदाहरण से बताता हूं पंजाब हमारा एक बड़ा राज्य था उस जमाने में 17वीं शताब्दी में पंजाब के एक राजा हुआ करते थे महाराजा रणजीत सिंह नाम सुना आपने ईस्ट इंडिया कंपनी ने महाराजा रणजीत सिंह के राज्य में 10 बार लूटमार करने का प्रयास किया हर बार महाराजा रणजीत सिंह की सेनाओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया हर बार जब जब ईस्ट इंडिया कंपनी पंजाब की तरफ गई महाराजा रणजीत सिंह के सैनिक इतने शूरवीर और ताकतवर थे एक भी अंग्रेज जिंदा नहीं बचा जब भी वह गए लूट मार करर कभी जलंधर में कभी कपूरथला में कभी अमृतसर में कभी लाहौर में उस समय लाहौर जो था ना वो पंजाब का ही हिस्सा था यह तो बटवारे में पाकिस्तान चला गया तो भारत के पंजाब राज्य में जब भी ईस्ट इंडिया कंपनी ने कदम रखा महाराजा रणजीत सिंह ने पूरी ताकत से उनका मुकाबला किया और हर बार अंग्रेजों को हरा के वहां से वापस भेजा तो पंजाब को नहीं लूट पाते थे वह जल्दी ऐसे ही हमारे मध्य भारत में मध्य प्रदेश में झांसी है ना झांसी झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई हुआ करती थी उसके राज्य में जब भी अंग्रेजों ने कदम रखा लूट पार करने के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने जबरदस्त संघर्ष किया उनके साथ और जल्दी अंग्रेज कामयाब नहीं हो पाए आपको मालूम है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के राज्य में जबजब अंग्रेज लूटने के लिए गए हर बार अंग्रेज पराजित होकर लौटे एक बार झांसी की रानी के विश्वास पात्रों के गद्दारी से झांसी की रानी गिरफ्तार हुई और मारी गई उसके पहले कभी लूट नहीं पाए अंग्रेज झांसे को ऐसे ही दक्षिण भारत में एक जबरदस्त रानी हुआ करती थी कित्तूर नम्मा बेलगांव है कर्नाटक वाले यहां कुछ आए हैं कर्नाटक में बेलगांव है बेलगाम के पास एक छोटा सा गांव है कित्तूर वहां उसका जन्म हुआ इसलिए नाम पड़ गया कित्तूर चन्मा दक्षिण भारत में गांव का नाम अपने नाम के साथ लिखने की परंपरा है दक्षिण के जो नाम होते हैं ना आपने सुना है एच डी देवगौड़ा तो एच माने हर दन हल्ली हरद हली उसके गांव का नाम है देवगौड़ा का गांव का नाम पहले लिखते हैं अपना नाम बाद तो कित्तूर चन्मा कित्तूर गांव का नाम कित्तूर नम्मा के राज्य में जब जब अंग्रेज गए लूटने के लिए कभी कामयाब नहीं हो पाए हर बार अंग्रेजों को हराया उसने ऐसे ही दक्षिण भारत में एक बड़ा प्रतापी राजा था हैदर अली हैदर अली के राज्य में जब जब अंग्रेज गए लूटमार करने के लिए कभी कामयाब नहीं हुए हर बार हैदर अली ने हरा के भेजा उनको तो भारत में कई शूरवीर राजा थे जो अंग्रेजों से टक्कर लेते थे संघर्ष करते थे और उनको हराते थे लेकिन कुछ कमजोर राजा भी थे जहां अंग्रेज कामयाब हो जाते थे एक राज्य था हमारे यहां जयपुर वहां का राजा बहुत ही कमजोर था बहुत कमजोर था इतना कमजोर था कि अंग्रेज एक चिट्ठी लिखकर भेजे जयपुर के राजा को कि एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं दे दो तो वह राजा चुपचाप अंग्रेजों के घर देकर आता था कभी उसने यह नहीं कहा कि नहीं दूंगा वो कहता था कि अगर मैं ऐसा बोलूंगा नहीं दूंगा तो अंग्रेज चढ़ाई कर देंगे मेरा पूरा महल लूट के ले जाएंगे और उसमें तो बहुत चला जाएगा तो अपने घर से ही ले जाक एक करोड़ देके आता था अब अंग्रेज एक बार एक करोड़ मांगते थे तो अगली बार कहते थे 10 करोड़ दे दो तो फिर वो राजा जाता था 10 करोड़ देके आता था तो ऐसे कमजोर राजा भी थे इस देश में जयपुर के मैंने तो नाम लेकर कह दिया ऐसे कई कमजोर राजा थे वो चुपचाप देक आते थे तो ईस्ट इंडिया कंपनी का जो धंधा चला इस देश में वो इस तरह से चला लूटमार करके इस देश में से पैसा उन्होंने बनाना शुरू किया जिस कंपनी के पास एक धेला नहीं था उनके खजाने में वो जब भारत आ गए और 10-15 साल उनका यह धंधा चल पड़ा लूटमार का करोड़ों स्टर्लिंग पाउंड उनके खजाने में जमा हो गए फिर जब बहुत पैसा उनको मिल गया तो खून लग गया मुंह में वो कहते हैं ना शेर के मुंह खून लग गया तो ईस्ट इंडिया कंपनी को खून लग गया और उनको लगा कि भारत में तो बहुत पैसा है बहुत संपत्ति है लूटमार तो करनी ही पड़ेगी और पैसा यहां से लेकर लंदन जाना ही पड़ेगा तो उन्होंने एक फैसला किया फैसला क्या किया कि इस देश में अब खाली लूटमार नहीं कर नहीं करेंगे इस देश में हम अपनी सरकार भी चलाएंगे एक तो है व्यापारी आया एक तो डकेट आया लूटमार करके ले गया लेकिन एक डकैत आया जिसने आपके घर पर ही कब्जा कर लिया सोचो आप कोई डकैत आपके घर में घुस गया जो भी थोड़ा बहुत संपत्ति है लूट के ले गया यह एक घटना है लेकिन कोई डकैत आपके घर में घुस गया और आपको मार के घर के बाहर निकाल दिया और घर पर कब्जा करके वह मालिक बनकर बैठ गया ऐसा ही हमारे देश में हुआ हमारे देश में पता है क्या हुआ जिस जहांगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लाइसेंस दिया था लूटमार करने का उसी जहांगीर को ईस्ट इंडिया कंपनी ने कुर्सी से उतरवा दिया उसी ज जंगीर ऐसा हुआ जो जो राजा के यहां ईस्ट इंडिया कंपनी वाले पहुंचे लूटमार करने हर राजा को उन्होंने कोई ना कोई षड्यंत्र करके कुर्सी से उतरवा दिया और वहां अंग्रेजों की सत्ता स्थापित होती चली गई ऐसे करके धीरे-धीरे भारत का आधे से ज्यादा राज्य उन्होंने कब्जे में ले लिया 1618 में वह एक शहर में आए थे सूरत में और 1718 तक आते-आते 100 साल में हिंदुस्तान के आधे से ज्यादा राज्य पर उनका कब्जा हो गया और पहले कब्जा हुआ कमजोर राज्यों पर मैंने आपको बताया ना जयपुर का ऐसे राजा ऐसे भारत में 200 से ज्यादा कमजोर राजा थे और उनकी कमजोरियां क्या थी सब शराब में डूबे हुए नशों में डूबे हुए गंदे गंदे काम करने में डूबे हुए वैश्यावृति में डूबे हुए रखलो में डूबे हुए हरम में डूबे हुए एक शब्द होता है ना  यह कहां से आया उर्दू का शब्द है फारसी से आया हरम हरम का मतलब होता है एक ऐसा महल जहां बहुत सारी स्त्रियां रहती हो और राजा उन स्त्रियों के साथ विलास करता हो उसको हरम कहते हैं अब उस हरम में से जहां बहुत सारी स्त्रियां राजाओं के साथ रहती थी तो उनमें कुछ बच्चे पैदा हो जाते थे उनको कहा जाता था ये हंसने की बात नहीं है सच्चाई बता  शब्द है ना वह हरम में से आया तो ऐसे बहुत राजा थे जिन्होंने हरम रखे हुए थे 5050 महिलाएं 100 100 महिलाएं डेढ़ डेढ़ स महिलाएं चरित्रहीन राजा एकदम से निकृष्ट किस्म के राजा एकदम से जिनको अपने शरीर सुख के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता था ऐसे राजा बहुत कमजोर होते थे आप जानते हैं जो विलासी होता है और वासना में डूबा हुआ होता है वह सब चीजों में डूबा हुआ होता है तो ऐसे राजाओं से ईस्ट इंडिया कंपनी पहले लड़ाई करती थी और उस लड़ाई में एक बार में ही राजा हार जाते थे और राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी का हो जाता था ऐसे करके पूरे भारत में उन्होंने कब्जा जमाया और धीरे-धीरे वह कब्जा 150 साल में सारे भारत पर हो गया 1618 से 1750 तक आते-आते जगह-जगह लूटमार करते-करते पूरे भारत पर कब्जा हो गया भारत का एक बड़ा राज्य था उस जमाने में बंगाल बंगाल जो राज्य था ना व तना बड़ा था आपको बताता हूं आज का पूरा बिहार आज का पूरा झारखंड आज का पूरा पश्चिम बंगाल आज का पूरा बांग्लादेश आज का पूरा आसाम और आसाम के ऊपर के सारे प्रदेश यह मिलाकर था पूरा बंगाल इतना बड़ा राज्य था वहां का राजा था सिराजुद्दौला बड़ा प्रतापी था बहुत शूरवीर था चरित्रवान था चरित्र का बहुत ऊंचा था मेहनत करने में बहुत परिपक्व था शूर वीरता में बहुत ऊंचा था न्यायप्रिय था प्रजा वत्सल था सारे सद्गुण उसमें थे तो ईस्ट इंडिया कंपनी कभी घुस नहीं पाई बंगाल में क्योंकि राजा मजबूत था जब जब ईस्ट इंडिया कंपनी घुसी बंगाल में मार के भगा दिया उसने सिराजुद्दौला फिर क्या हुआ सिराज उ दौला का जो सेनापति था वह गद्दार निकल गया सिराज उ दौला तो देशभक्त था प्रतापी था शूरवीर था वो तो ईस्ट इंडिया कंपनी को घुसने नहीं देता था उसका जो सेनापति था मीर जाफर वो गद्दार निकल गया आपने कहानी पढ़ी होगी मीर जाफर ईस्ट इंडिया कंपनी से मिल गया और मीर जाफर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को जाके अंदर की सब बातें बता दी और उन अंदर की बातों की जानकारी लेके ईस्ट इंडिया कंपनी ने हमला किया सिराजुद्दौला के राज्य पर अब हमला हुआ तो सिराजुद्दौला की फौज युद्ध के लिए तैयार हुई सिराजुद्दौला के पास 18000 सैनिक थे ईस्ट इंडिया कंपनी के पास 350 सैनिक थे अब आपसे कोई यह पूछे कि 18000 सैनिक एक तरफ 300 सैनिक एक तरफ कौन जीतेगा 18000 सैनिक जीतेंगे लेकिन युद्ध जीता 300 सैनिक वाली ईस्ट इंडिया कंपनी ने कैसे जीता यह 350 सैनिकों को लेकर अंग्रेज अधिकारी था रॉबर्ट क्लाइव वह सिराजुद्दौला से युद्ध करने के लिए प्लासी के मैदान में पहुंचा प्लासी एक छोटी सी जगह है कलका के नजदीक है अगर बंगाल के कुछ कार्यकर्ता होंगे तो वहां जाकर देख सकते हैं उस प्लासी में युद्ध की तैयारी हुई 24 जून 1857 की डेट तय हो गई सॉरी 1757 24 जून 1757 23 जून और 24 जून दो डेट तय हुई युद्ध के लिए 350 सैनिक इनके 18000 सैनिक उनके तो रॉबर्ट क्लाइव जानता था कि युद्ध तो मैं हार जाऊंगा 20 मिनट में ही सब मारामारी हो जाएगी 300 सैनिकों को मारना कितनी देर का काम तो उसने कहा युद्ध तो नहीं कर सकता तो उसने मीर जाफर को फोड़ा जो सेनापति था सिराजुद्दौला और उसको कहा कि देखो एक करोड़ सोण मुद्राएं तुमको मैं दूंगा और तुम मेरी मदद करो हम सिराज उद दौला को मार डालेंगे और तुमको फिर राजा बना देंगे बंगाल का तो मीर जाफर बंगाल का राजा बनने के लालच में फंस गया और पैसे के लालच में फस गया पैसे का लालच और कुर्सी का लालच उसने मीर जाफर को तोड़वा दिया तो मीर जाफर ने क्या किया अपने जो 18000 सैनिक थे उनका आत्म समर्पण अंग्रेजों के सामने करवा दिया उस और सिराजुद्दौला से गलती क्या हो गई सिराजुद्दौला युद्ध में खुद नहीं गया क्यों क्योंकि सिराजुद्दौला को मालूम था कि युद्ध तो 20 मिनट में खत्म हो जाएगा मैं जाकर क्या करूंगा मेरे सैनिक ही मार डालेंगे अंग्रेजों को वो इस गलतफहमी में रह गया तो सिराजुद्दौला था मुर्शिदाबाद में क्योंकि उस समय बंगाल की राजधानी थी मुर्शिदाबाद बंगाल की राजधानी कलकाता तो बाद में बनी है पहले मुर्शिदाबाद थी तो वह मुर्शिदाबाद में बैठा रह गया सैनिकों को भेज दिया युद्ध करने के लिए उसको मालूम नहीं था कि मीर जाफर पहले ही टूट चुका है मीर जाफर ने आत्मसमर्पण करा दिया तो प्लासी के मैदान में युद्ध नहीं हुआ भारत के 18000 सैनिकों ने अंग्रेजों के 350 सैनिकों के सामने शर्मनाक आत्म समर्पण किया मीर जाफर की गद्दारी में और वहां से इतिहास पूरे देश का बदल गया इतिहास क्या बदल गया अंग्रेजों ने घोषित कर दिया हमने युद्ध जीत लिया फिर अंग्रेजों ने 18000 सैनिकों को बंदी बना लिया और 350 अंग्रेजों के सैनिक 18000 यह सैनिक इनको लेकर पूरी फौज बना के रॉबर्ट क्लाइव गया मुर्शिदाबाद कलकत्ता से प्लासी से चलकर मुर्शिदाबाद तो कलकत्ता से माने प्लासी से मुर्शिदाबाद के बीच की दूरी बहुत बड़ी है 15 दिन लगा उसको घोड़े पर चलने में तो उसने अपनी डायरी में लिखा है रॉबर्ट क्लाइव ने कि मैं घोड़े पर आगे आगे बैठता था मेरे पीछे मेरे 350 सैनिक बैठते थे पीछे भारत के गुलाम बनाए हुए 18000 सैनिक चलते थे और भारत के लोग सड़क के दोनों किनारे खड़े होकर हमारे जुलूस को देखते थे और उस परे तालियां बजाते थे अगर भारत के लोगों ने हमको पत्थर का एक एक टुकड़ा उठाकर मारा होता तो भारत का इतिहास तो 1757 में ही बदल गया हो हमारी क री क्या रही विदेशी है बहुत अच्छा है विदेशी है बहुत अच्छा है आज भी है ना कैसे मूर्ख हम हिंदुस्तानी हैं कभी-कभी मैं आगरा चला जाता हूं ताजमहल के आसपास कोई विदेशी आ जाए तो सारे हिंदुस्तानी उसके आसपास ऐसे इकट्ठे हो जाते हैं जैसे भगवान का दूत उतरा आया कोई होता है कि नहीं दिल्ली में कोई विदेशी घूमने आ जाए मुंबई में कोई आ जाए हम उसको ऐसे आसपास घेर लेते हैं जैसे वो देवदूत है यह हमारी गुलामी की मानसिकता 1757 से भी पुरानी है इसी ने हमको गुलाम बनाया उस समय क्या हुआ रॉबर्ट क्लाइव विदेशी है गोरा गोरा है लाल लाल गाल दिखाई देते हैं उसके पीछे 300 सैनिक 350 सैनिक वोह भी गोरे गोरे हैं अच्छे-अच्छे दिखाई देते हैं तो हम तो उनको देखते ही तालियां बजाते रह गए अगर पत्थर उठाकर मारा होता तो मर जाते वह सब के सब वही और देश कभी गुलाम नहीं होता ईस्ट इंडिया कंपनी का यह देशी गोरे रंग के प्रति जो मोह है ना यह बहुत खतरनाक है बहुत खतरनाक हम सब हिंदुस्तानियों के खून में घुस गया है गोरा रंग गोरा होना मुझे इतना तकलीफ होती है गुस्सा भी आता है रविवार का अखबार जब मैं पढ़ता हूं ना तो उसमें एक कॉलम निकलता है वैवाहिक कॉलम मैट्रिमोनियल तो हर एक को उसमें लिखा रहता है गोरी वधु चाहिए गोरी बहू चाहिए गोरी पत्नी चाहिए अब सबको गोरी चाहिए तो काली कहां जाएंगी मुझे समझ में नहीं आता यह गोरे रंग के प्रति इतना आकर्षण हम में क्यों आ गया गोरा एक रंग ही है ना काला भी एक रंग है अब देखो यह हिंदुस्तान कैसा बावला और पागल हुआ है हमारे भगवान श्रीराम सांवले है कि नहीं भगवान विष्णु सांवले है कि नहीं भगवान शंकर सांवले हैं कि नहीं सारे भगवान देवी देवता सांवले या काले और भक्त सब अपने को गोरा होने के लिए परेशान है और उस गोरे होने के चक्कर में क्या-क्या क्रीम पाउडर लिपस्टिक पोते रहते हैं फेयर एंड लवली और क्या-क्या यह सारा तमाशा गोरेपन के प्रति हमारे दिमाग में जो खतरनाक स्तर तक घुसा हुआ है आकर्षण इसी ने हमको गुलाम बनाया रोबर्ट क्लाइव कहता है कि जो लोग सड़क के किनारे खड़े होकर हमारे रंग को आकर्षित महसूस करते थे अगर उन्होंने ही पत्थर उठा उठा के मारा होता तो मैं तो वही मर गया होता और भारत पर तो कभी ईस्ट इंडिया कंपनी का राज नहीं हुआ होता लेकिन वहां हमारी गलती हो गई हम आकर्षण में फंस गए और अंग्रेजों के चक्कर में गुलाम होए बंगाल अंग्रेजों की गुलामी में चला गया और बंगाल जितना बड़ा राज्य जब अंग्रेजों की गुलामी में आ गया मैंने कहा तो फिर धीरे-धीरे मद्रास उनकी गुलामी में आ गया फिर मुंबई गुलामी में आ गया फिर पूरा भारत गुलामी में आ गया अब जब गुलामी आ गई तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए लूट मार के मैंने बताया ना रॉबर्ट क्लाइव ने जैसे ही प्लासी का युद्ध जीत लिया रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला की हत्या करा दी फिर थोड़े दिन के लिए मीर कासिम को बंगाल का राजा बना दिया फिर मीर कासिम की हत्या करा दी फिर मीर जाफर को बंगाल का राजा बना दिया फिर मीर जाफर जब राजा बना तब रॉबर्ट क्लाइव ने कहा यह तो बड़ा खतरनाक आदमी है जो अपने राजा से गद्दारी कर सकता है वह मुझसे से भी गद्दारी करेगा तो एक दिन रॉबर्ट क्लाइव ने खुद मीर जाफर के पेट में छोरा भोग दिया और मार डाला उसको गद्दारों का यही अंजाम होता है अब मीर जाफर तो मर गया एक करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के चक्कर में पूरे देश को हमेशा के लिए गुलाम बना गया कुर्सी के लालच में पैसे के लालच में व तो मर गया लेकिन देश गुलाम हो गया फिर रॉबर्ट क्लाइव राजा बन गया बंगाल का राजा बन गया तो लूटना शुरू किया और लूट के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए मैंने बताया ना उसने अकेले कोलकात्ता शहर से 900 पानी के जहाज भर के सोने चांदी हीरे जवाहरात लूटे और जब लूट के लंदन ले गया तो लंदन की पार्लियामेंट में उससे बात की गई जिरह की गई बहस की गई कि तुम भारत से क्या लाए हो कहने लगा सोने चांदी के जहाज भर के लाया हूं कितने लाए हो तो 900 जहाज लाया हूं तो इंग्लैंड का प्रधानमंत्री हैरान हो गया कहने लगा इतना उसने कहा हां इतना तो इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ने पूछा यह कहां से लाए हो पूरे भारत से उसने कहा पूरे भारत से नहीं भारत के एक शहर कलकत्ता से पूरे भारत में तो पता नहीं कितना सोना चांदी है तो फिर उससे पूछा गया यह कितना है पैसे कितने हैं माने कितना है पैसे में यह सारा सामान तो उसने कहा 000 मिलियन स्टर्लिंग पाउंड यह उसने रकम बताई थी इसको लिख लो आप 1000 मिलियन स्टर्लिंग पाउंड लूट का जो धन ले गया सोना चांदी ही जवारा मुन्ना माणिक मोती जो भर भर के 900 जहाज ले गया था उसकी रकम उसने बताई 1000 मिलियन मिलियन समझते हैं 10 लाख 1000 गुना 10 लाख स्टर्लिंग पाउंड और एक स्टर्लिंग पाउंड इस समय है लगभग 0 रुप का और 1757 के स्टर्लिंग पाउंड की आज तक की कीमत 300 गुनी कम हुई है तो 1000 लिखो 1000 फिर उसमें 10 लाख का गुणा करो फिर उसमें 300 का गुणा करो फिर 80 का गुणा करो इतनी रकम लूटकर अकेला एक रॉबर्ट क्लाइव ले गया मैं बताता हूं फिर से 1000 लिखो फिर 10 लाख का गुणा करो उसमें 1000 गुना 10 लाख फिर गुना 300 और गुना 80 तो आज के हिसाब से रकम निकलेगी लाखों करोड़ों रुपए में निकलेगी निकाल लेना इसको आप मैंने आंकड़ा बता दिया आप लोगों को यह समझाना जब आप गांव-गांव जाओ कि विदेशी कंपनियों को भगाने के लिए हमने जो आंदोलन शुरू किया है क्यों क्योंकि एक विदेशी कंपनी आई ईस्ट इंडिया उसका एक अधिकारी था रॉबर्ट क्लाइव वह इतना धन लूट करर ले गया इस देश में से तो विदेशी कंपनियों को रहना खतरनाक होता है देश में और रॉबर्ट क्लाइव अकेला एक अधिकारी नहीं था ऐसे हिंदुस्तान में 84 अधिकारी आए रॉबर्ट क्लाइव आया उसने लूटा फिर वॉरेन हेस्टिंग्स आया उसने लूटा फिर कर्जन आया उसने लूटा फिर लिलिथ गो आया उसने लूटा फिर डिकंस आया उसने लूटा फिर विलियम वेंटिंग आया उसने लूटा फिर कॉर्न वॉलिस आया उसने लूटा ऐसे एक नहीं 84 अधिकारी आए और लूट लूट के लाखों करोड़ों रुपए की संपत्ति ले गए यहां से परिणाम क्या हुआ परिणाम यह हुआ कि जो देश के एक-एक घर में सोने चांदी के सिक्कों का ढेर लगा रहता था ईस्ट इंडिया कंपनी के लगभग 100 साल की लूट में सारा देश कंगाल और भिकारी हो गया गरीबी पूरे देश में फैल गई हम हिंदुस्तान को भगवान ने गरीब नहीं बनाया दुनिया के बहुत सारे देशों को भगवान ने गरीब पैदा किया है दुनिया में ऐसे बहुत सारे देश हैं जो बहुत गरीब हैं भगवान के कारण क्योंकि उनके देश में कोई संपत्ति नहीं है प्राकृतिक प्राकृतिक संपत्ति आप समझते हैं सोना चांदी कोयला हीरे जवार जिन देशों में बिल्कुल नहीं है वो भगवान के द्वारा गरीब पैदा किए गए हैं भारत में तो हजारों किस्म की संपत्ति है हम गरीब भगवान ने नहीं बनाए हमारी गरीबी तो ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों की लूट में से आई है यह ध्यान रखना है हमको इतना लूटा और फिर दूसरे तरीके से लूटा कि जो कारीगर कपड़ा बनाते थे उनसे कपड़ा लूट लिया और उनके साथ समझौते किए कपड़ा बनाने वाले कारीगरों से कि वह जितना भी कपड़ा बनाएंगे सारा ईस्ट इंडिया कंपनी को मुफत में देना पड़ेगा और जो कारीगर यह कपड़ा नहीं देता था मुफत में उसके अंगूठे काट लिए जाते थे उसका हाथ काटा जाता था फिर ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक कानून बनाया कि भारत के किसान जो भी अनाज पैदा करते हैं उसका 90 प्र अंग्रेजों को देना पड़ेगा अगर कोई किसान 100 क्विंटल अनाज पैदा करता है तो 90 क्विंटल अंग्रेजों को देना पड़ेगा और किसानों को लूटना शुरू कर दिया अंग्रेजों ने फिर हमारे जो व्यापारी थे ना व्यापारियों को लूटना शुरू किया अंग्रेजों ने कैसे लूटना व्यापारियों पर टैक्स लगा दिया अंग्रेजों ने कोई भी व्यापारी माल बनाएगा उत्पादन करेगा तो उस अंग्रेजों ने 350 प्र टैक्स लगा दिया जैसे 00 का कपड़ा मैं पैदा करूं उस पर 50 टैक्स देना पड़ेगा फिर उस कपड़े को बेचू तो बेचने के लिए टैक्स देना पड़ेगा फिर बेचकर मुनाफा कमाऊं तो मुनाफे पर टैक्स देना पड़ेगा इनकम टैक्स ऐसे बी सियों किस्म के टैक्स लगा दिए और व्यापारियों को लूटना शुरू कर दिया तो कारीगरों को लूटा व्यापारियों को लूटा किसानों को लूटा और लूटने आर्थिक रूप से और दूसरे काम बहुत किए अंग्रेजों ने दूसरे काम क्या किए जहां-जहां अंग्रेज जाते थे लूटमार करने के लिए किसी भी गांव और किसी भी शहर में वहां अगर अगर उनको हमारे देश की माताएं बहनें जो सुंदर हैं शरीर में दिखाई दे जाएं तो अंग्रेज उनको छोड़ते नहीं थे बिना बलात्कार किए धन तो लूटा ही हमारा हमारी मां बहन बेटियों की इज्जत भी लूटी उन्होंने और मां बहन बेटियों के साथ इतना बुरा बर्ताव करते थे कि वह पढ़ते समय मुझे खून खोलता है हमारी माताओं बहनों बेटियों के साथ अंग्रेजों का बर्ताव कैसा होता था कोई सुंदर महिला अंग्रेजों को दिखाई जा उसको सरेआम नंगा करते थे फिर उस महिला के स्तन का जो अग्र भाग होता है उसको लोहे के चिमटे से दबाते थे और तब तक दबाते थे जब तक खून ना निकल आए और इस पर अंग्रेज हंसते थे और वह मां बहन बेटी चीखती और चिल्लाती थी जब वह बेडल हो जाती थी गिर पड़ती थी तब अंग्रेज उसके साथ बलात्कार करते थे और सामूहिक बलात्कार करते थे और बाद में उसकी गर्दन काट देते थे और उसको फेंक के चले जाते थे यह अंग्रेज किया करते थे खाली लूटमार नहीं करते थे माताओं बहन बेटियों के साथ व्चा किया करते और एक खतरनाक काम अंग्रेज किया करते थे इस देश में कि जिस इलाके में गए लूटमार करने के लिए वहां के लोगों का धर्म बदलवा दो मारो पीटो उनको और ईसाई बना दो उनको जो हिंदू धर्म का पालन करते हैं भारतीय धर्मों का पालन करते हैं मार पीट के ईसाई बनाते थे जो नहीं बनता था उसके नाखून खींच लेते थे ऐसे अत्याचार किया करते थे पैर के नाखून खींचते थे उंगलियों के नाखून खींचते थे और कई बार क्या होता था कई-कई गांव में इकट्ठे लोग हो जाते थे संघर्ष करने के लिए तो बर्फ की सिलियो पर लोगों को नंगा लिकर ऊपर से बैत की मार मारते थे अंग्रेज ऐसे अत्याचार करते और कई तरह के अत्याचार वह ऐसे किया करते थे किसानों से टैक्स लेना वह तो एक अलग बात है किसानों से जमीने छीन लेना कल मैं सुना रहा था ना डलोजी नाम का एक अंग्रेज था उसने एक कानून ही बना दिया जमीन छीनने का जिस कानून का नाम है लैंड एक्यूजन एक-एक गांव के 25-25 हज किसानों से एक-एक दिन में जमीनें छीन थे तो जमीनें छीनने का अत्याचार मां बहन बेटियों के साथ बलात्कार का अत्याचार पैसे की लूटमार का अत्याचार धर्म परिवर्तन का अत्याचार ऐसे सब तरह के अत्याचार अंग्रेज और ईस्ट इंडिया कंपनी कर रहे थे तब उनके खिलाफ भारत में विद्रोह हुआ था और तब भारत के लोग लोगों ने बगावत की थी पहला विद्रोह तो हुआ 1857 में आप सभी जानते हैं नाना साहब पेशवा ने बिठूर जैसे छोटे से स्थान पर संगठन बनाकर भारत को आजाद करने का संकल्प कराया और 1857 की क्रांति की कहानी आप सब जानते हैं मंगल पांडे ने एक अंग्रेज अधिकारी को गोली मारी थी मेजर हूसन को ढेर हो गया उसके बाद कुछ अंग्रेजों ने पकड़ लिया और आठ दिन बाद मंगल पांडे को फांसी पर चढ़ा दिया तो मंगल पांडे के जो सहयोगी थे उन्होंने नौकरी छोड़ दी संकल्प उठा लिया हाथ में गंगाजली उठाई और कसम खाई कि जिन अंग्रेजों ने मंगल पांडे को अत्याचार करके मारा है हम इन अब अंग्रेजों को मारेंगे तो पहली बार भारत के लोगों में जोश आया पहली बार भारत के लोगों में बलवती हुई भावना प्रतिकार करने की प्रतिशोध और आपको मालूम है कि मंगल पांडे के 1100 सहयोगी थे सबने छोड़ दी पांच पांच छह छह का समूह बना लिया एकएक गांव दोदो गांव तीन-तीन गांव घूमना शुरू किया उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम चारों दिशाओं में फैल गए गांव-गांव अंग्रेजों के अत्याचार की कहानियां सुनाना शुरू किया तो लोगों का खून उबलने लगा और संगठन बनने लगा और वह संगठन एक दिन इतना ताकतवर हुआ कि नाना साहब पेशवा जैसे एक व्यक्ति का शुरू किया हुआ संगठन बहुत जल्दी 7 32000 क्रांति वीरों का संगठन बन गया और थोड़े ही दिन के बाद चार करोड़ से ज्यादा लोग उसमें शामिल हो गए फिर यह तय हुआ कि एक साथ अंग्रेजों को पूरे देश से मार के भगा देना है एक साथ तो उसकी तारीख तय हुई 31 मई 1857 पूरे देश में अंग्रेजों के साथ विद्रोह होगा बगावत होगी और हर जगह जो अंग्रेज मिलेगा उसको मार डाला जाएगा यह साढ़े करोड़ भारतवासियों ने संकल्प ले लिया सवा करोड़ सॉरी और उसमें से गलती क्या हो गई गलती यह हो हो गई कि 31 मई 1857 की तारीख तय हुई एक साथ पूरे देश में बगावत करने की लेकिन यहां मेरठ में कुछ क्रांतिकारियों ने 20 दिन पहले ही उस बगावत को शुरू कर दिया 10 मई 1857 गड़बड़ ये हो गई माने अति उत्साह जो है ना बहुत खतरनाक होता है जब तय हुआ कि पूरे देश में 31 मई को एक साथ विद्रोह करेंगे अंग्रेजों के खिलाफ तो मेरठ में 10 मई को करने की कोई जरूरत नहीं थी लेकिन मेरठ में कुछ जाट समूह के लोग थे जिन्होंने पूरा आओ ना देखा ताओ अंग्रेजों पर चढ़ बैठे और 10 मई शाम को 5:00 बजे पूरे मेरठ शहर के हर अंग्रेज के घर में उन्होंने आग लगा दी अंग्रेज घर के साथ जलकर मर गए और पूरा मेरठ डेढ़ दिन में अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो गया जो अंग्रेज घरों में से निकलकर भागे ना उनको जाट समूह की महिलाओं ने हंसिए से काट डाला गर्दन काट दे आप जानते हैं जब अत्याचार बहुत होता है ना तो आदमी फिर होशो हवास खो देता है वैसे भारत के लोग अहिंसा वादी हैं चींटी को भी नहीं मारते मक्खी को भी नहीं मारते कहते हैं चीटी मारेंगे तो पाप लगेगा हम कितने अहिंसा वादी हैं अपने घर में सवेरे सवेरे झाड़ू लगाते हैं ना वो झाड़ू के नीचे भी चींटी आके ना मर जाए इसके हिसाब से झाड़ू बनाते हैं व आपने देखा भारत की जो झाड़ू होती है आगे से खुली हुई होती है पीछे से एकदम बंद होती है वोह खुला हुआ इसलिए रखते हैं कि चीटी आए तो बीच में से निकल जाए मरे नहीं इतने अहिंसा वादी हैं सवेरे झाड़ू लगाएंगे तो चींटी भी नहीं मरनी चाहिए लेकिन जब अपने पर आ गए और होशो हवास खो दिया और गुस्सा और प्रतिशोध की भावना इतनी बढ़ गई तो मेरठ की महिलाओं ने अंग्रेजों के गर्दन काट दिए हंसिए से तो यह इस बात को बताता है कि किसी भी समाज की किसी भी समूह की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए कभी भी अंग्रेजों ने वही गलती की हमारी परीक्षा ली अत्याचार किए और हद से ज्यादा जब वह अत्याचार ऊपर गुजर गए तो काट दिया डेढ़ दिन में पूरा मेरठ अंग्रेजों से आजाद हो गया फिर दिल्ली में हुआ दिल्ली पांच दिन में आजाद हो गई दिल्ली में 13000 से ज्यादा अंग्रेजों को मार डाला हिंदुस्तानियों ने पांच दिल्ली आप कभी गए हैं दरियागंज दरियागंज दिल्ली वाले बैठे होंगे दरियागंज में एक पोस्ट ऑफिस है यह पोस्ट ऑफिस लाल खून का केंद्र बन गया था उस जमाने यह दिल्ली के दरियागंज का पोस्ट ऑफिस है ना सबसे ज्यादा अंग्रेजों का कत्लेआम इसी एक जगह पर हुआ था कारण क्या था कि जहां आज पोस्ट ऑफिस है वहां चर्च हुआ करता था तो ज्यादा अंग्रेज वहां प्रार्थना करने के लिए आया करते थे तो दिल्ली वास ने एक दिन रविवार का दिन जहां प्रार्थना करने के लिए आएंगे वह तय कर लिया और इकट्ठे हो गए सब के सब चर्च में जैसे ही घुसे तो यह चर्च में घुसे और मारकाट ऐसी मचाई कोई जिंदा नहीं बचा दिल्ली के इतिहास को जब मैं पढ़ता हूं छोटी-छोटी गलियां है ना दरियागंज में लाल खून से नालियां भर गई थी पांच दिन इतना कत्लेआम हुआ था दिल्ली फिर दिल्ली के बाद बरेली में हुआ शाजापुर में हुआ सहारनपुर में हुआ यहां रुड़की में हुआ जहां-जहां अंग्रेजों की छाव नियां थी सब जगह उनका पूरे हिंदुस्तान में नर संघार शुरू हुआ तीन महीने में अंग्रेज खत्म हो गए 365000 अंग्रेज तीन महीने में मारे गए इस देश में 1827 की क्रांति में इतना जबरदस्त तूफान अंग्रेज मारे गए तो अंग्रेजों का सा शासन खत्म हो गया ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा उतर गया यूनियन जैक हटा दिया गया भारत का झंडा हर जगह लहराने लगा भारत के स्थानीय राजाओं ने सत्ता संभालना शुरू कर दिया 10 मई 1857 से शुरू हुई क्रांति 1 सितंबर 1857 को जब गणना की गई पूरे देश में तो तीन चार ही अंग्रेज जिंदा बचे थे सब मारे गए [संगीत] 365000 जो बचे वह भाग गए लंदन और जो भागे ना वह कैसे भागे उन्होंने अपने शरीर को कोयला लगा लगा केर काला किया उसमें बच गए वो हां काला अगर नहीं किया होता शरीर तो वह भी मारे जाते क्योंकि हिंदुस्तानी उस समय इतने खून के प्यासे थे जो गोरी चमड़ी वाला मिले उसी की गर्दन काट वो एक ऐसा दौर इस देश में पैदा हुआ था कि जहां गोरी चमड़ी वाला मिले बस उसी को नाप तो अंग्रेजों ने शरीर पर कोयला मला कालिख मली एकदम काले होकर छुप-छुप के दिल्ली से और कहां-कहां से निकल गए लंदन पहुंच गए वहां कहानी सुनाई उन्होंने कि भारत में तो ऐसा हो गया है तो लंदन परेशान हो गया अंग्रेजों की सरकार परेशान हो गई कि भारतवासियों में इतना गुस्सा कैसे पैदा हो गया तो उन्होंने कहा कि उसके ये ये कारण रहे तो अब भारत पर फिर कब्जा करना चाहिए फिर जाना चाहिए क्योंकि धन संपत्ति तो अभी हम लूट नहीं पाए अभी तो 100 साल ही लूटा है और 100 साल लूटना है तो अंग्रेजों ने योजना बनाई और उस योजना में यह तय किया गया कि भारत में एक जमाने में मीर जाफर ने अंग्रेजों की मदद की थी तो ढूंढो कौन-कौन मीर जाफर अभी भारत में बचा हुआ है तो अंग्रेजों ने यहां के राजाओं के बीच में एक सर्वेक्षण करवाया और यह पता लगाया कि कौन-कौन राजा अंग्रेजों की मदद कर सकता है तो भारत में कई राजा ऐसे निकले गद्दार जिनका नाम लेके टेस्ट खराब नहीं करना चाहता मैं आपको 20 खानदान ऐसे निकले जिन्होंने बहुत गद्दारी की है कुछ पंजाब के कुछ हरियाणा के कुछ आंध्र प्रदेश के कुछ कर्नाटक के इन्होंने अंग्रेजों को चिट्ठी चि लिखी और राजाओं ने चिट्ठियों में लिखा कि आप वापस आ जाइए हम आपकी मदद करेंगे आपको सैनिक देंगे आपको पैसा देंगे सारी मदद करेंगे और जहां क्रांतिकारियों का गढ़ है वह हम आपको बताएंगे और आप क्रांतिकारियों को मारो और फिर से भारत पर कब्जा करो तो 1 नवंबर 1857 से फिर अंग्रेज वापस आने लगे और एक-एक करके उन्होंने क्रांतिकारियों के जो अड्डे थे उनको नाश करना शुरू किया कल मैंने बिठूर की कहानी आपको सुनाई थी बिठूर का नाश किया फिर कानपुर का फिर लखनऊ का फिर इलाहाबाद का और गद्दार राजाओं ने अंग्रेजों की मदद करके सैनिक और पैसा देके क्रांतिकारियों को मरवाने का काम किया उनमें कई क्रांतिकारी हमारे मारे गए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई मारी गई आप सभी जानते हैं नाना फड़न विस मारे गए आप सभी जानते हैं नाना साहब पेशवा तो काफी दिन बचे रहे लेकिन अंत में उनको भी मार डाला तात्या टोपे भी बचे रहे लेकिन अंत में अंग्रेजों ने उनको भी ढूंढकर मार डाला तो एक-एक करके सारे क्रांतिकारी खत्म हो गए अंग्रेजों का फिर कब्जा हो गया और यह देश फिर से गुलाम हो गया उस गुलामी के बाद फिर क्रांतिकारियों ने इकट्ठा होना शुरू किया और धीरे-धीरे इकट्ठे होते-होते 1905 आ गया और 1905 में जब क्रांतिकारी इकट्ठे हुए तो लड़ाई का तरीका बदल गया पहले लड़ाई अंग्रेजों से सीधे-सीधे हुई आरपार की अंग्रेजों ने बंदूक चलाई तो हमने भी बंदूक चलाई अंग्रेजों ने तलवार चलाई हमने ने भी उनके सिर काटे 1857 में लड़ाई ऐसे हुई 1905 में लड़ाई का तरीका बदल गया लोकमान्य तिलक लाला लाजपतराय विपिन चंद्र पाल ने कहा कि अंग्रेजों को तलवारों से हरा नहीं सकते बंदूकों से मार नहीं सकते क्योंकि हम मारेंगे और आएंगे और मारेंगे और आएंगे और यह अंतहीन सिलसिला है तो लोकमान्य तिलक ने कहा कि इन अंग्रेजों की जड़ खो दो इनकी जड़ में मट्ठा डालो कहते हैं ना एक पेड़ काटो तो ऊपर के पत्ते तोड़ दो टहनी काट दो फिर उगाए फिर उगाए फिर उगाए लेकिन जड़ में ही मट्ठा डाल दो तो पेड़ पूरा ध्वस्त हो जाएगा तो अंग्रेजों की जड़ कहां थी अंग्रेजों की जड़ थी उनका व्यापार व्यापार क्या था इंग्लैंड से माल लाते थे भारत में बेचते थे वह मुनाफा उनको मिलता था यह उनका सबसे बड़ा आधार था तो लोकमान्य तिलक लाला राजपत राय विपिन चंद्र पाल ने कहा कि अगर इनका यह आधार हम तोड़ देंगे तो अंग्रेज हमेशा के लिए टूट जाएंगे इसलिए स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ और इसलिए इस देश के लोगों ने गली गली गांव-गांव घर-घर विदेशी माल का बहिष्कार और स्वदेशी माल का स्वीकार यह मंत्र गुंजायमान किया और यह आंदोलन इतना जबरदस्त निकला मैंने बताया ना आपको 1905 में शुरू हुआ 1911 तक आते-आते हिंदुस्तान में अंग्रेजी माल बिकना बंद हो गया अंग्रेजों का कपड़ा बिकना बंद हो गया अंग्रेजों की चीनी बिकना बंद हो गई अंग्रेजों का ब्लेड बिकना बंद हो गया अंग्रेजों का नील बिकना बंद हो गया उनका सारा माल बिकना बंद हो गया तो वह परेशान हो गए और परेशान होने के बाद फिर भारत के नेताओं से उन्होंने बातचीत करने की कोशिश की एक बार भारत के नेताओं को झांसा दिया आप जैसा कहेंगे हम वैसा करेंगे लेकिन आप बहिष्कार मत करवाइए तो विपिन चंद्रपाल लाला लाजपत राय ने कहा आप पर भरोसा नहीं अंग्रेजों पर भरोसा नहीं लाला लाजपतराय कहा करते थे कि दुनिया में किसी भी जाति पर भरोसा किया जा सता अंग्रेज जाति पर तो बिल्कुल भरोसा नहीं कर सकते तो इन क्रांतिकारियों ने आंदोलन आगे बढ़ाया आगे चलाया अंग्रेजों में कमजोरी आती गई मुनाफा मिलना बंद हो गया और जहां-जहां अंग्रेज टैक्स लगाते थे लोगों ने टैक्स देना बंद कर दिया अंग्रेज टैक्स लगाते थे ना लोग कहते थे टैक्स भरेंगे नहीं तुमको जो करना है कर लो तो अंग्रेज क्या करते थे जेलों में डाल देते थे तो लोग कहते थे चलो हम जेल में रहेंगे तो शुरू में तो क्या हुआ कि कुछ लोग में गए बाद में जेल भर गई रहने को जगह नहीं मिली तो अंग्रेज भी परेशान हो गए कि आप कहां लाए इनको दिल्ली की जेल थी सेंट्रल जेल उसमें ज्यादा से ज्यादा ज्यादा से ज्यादा उस जमाने में 10 से 11 हज कैदी रह सकते थे और दिल्ली में 6 हज से व्यापारियों ने टैक्स देना बंद कर दिया अंग्रेजों को देंगे ही नहीं तुमको जेल में डालना डाल दो उस जमाने में हिंदुस्तान के लोगों का डर निकल गया था जेल जाने से भारत के लोग डरना बंद कर दिए जेल जाएंगे चले जाएंगे टैक्स नहीं देंगे अंग्रेजों जेल जाना पड़ेगा जाएंगे उनका सामान नहीं खरीदेंगे किसानों ने टैक्स देना बंद कर दिया जो लगान लगता था ना 90 प्र वह बंद कर दिया व्यापारियों ने टैक्स देना बंद कर दिया और व्यापारियों ने अंग्रेजों का माल बेचना बंद कर दिया ग्राहकों ने खरीदना बंद कर दिया तो सब तरफ से मार पड़ी कि नहीं अंग्रेजों पर और उसी समय क्या हुआ उसी समय 1914 में प्रथम विश्व युद्ध हो गया तो अंग्रेजों को और मार पड़ी उस विश्व युद्ध में उनका बहुत खर्चा हुआ इधर से आमदनी कम हो गई उधर युद्ध का खर्चा बढ़ गया तो इंग्लैंड कर्जदार देश हो गया तो फिर धीरे-धीरे कमजोरी बढ़ती गई फिर हिंदुस्तान में क्या हुआ लोकमान्य टलक की मृत्यु हो गई क्योंकि उनको बीमारी हो गई उस जमाने में लोकमान्य टलक गांव-गांव जाकर भाषण दिया करते थे तो भाषण देने के लिए माइक नहीं होता था अकेला गला फाड़ फाड़ के बोलना पड़ता था आपको मालूम है बोलने में बहुत ऊर्जा खर्च होती है पूरा गला खराब हो गया था लोकमान चिलक का फेफड़े गल गए थे टी भी हो गई उनको और 1920 में उनकी मृत्यु हो गई इसी तरह लाला लाजपत राय को अंग्रेजों ने देश निकाला दे दिया भारत से भगा दिया उनके ऊपर मुकदमे बाजी इतनी की कि उनको देश से निकल के जाना पड़ा लेकिन भगवान ने फिर क्या किया लोकमान तिलक लाला लाजपत राय विपिन चंद्रपाल का जो लीडरशिप था यह टूट गया उसी समय गांधी जी आ गए और यह जो इनके कार्यकर्ता थे 1 करोड़ 24 लाख गांधी जी ने इन्हीं कार्यकर्ताओं को अपने साथ लिया और उससे भी बड़ा स्वदेशी आंदोलन शुरू कर दिया गांधी जी ने एक कदम आगे बढ़कर क्या किया कि हम विदेशी कपड़े की तो होली जलाएंगे खुद अपने हाथ से चरखा कात करर सूती खादी कपड़ा बनाएंगे और वही पहनेंगे लाल बाल पाल के जमाने में स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य था विदेशी कपड़े की होली जलाना गांधी जी के आने के बाद उद्देश्य हुआ विदेशी कपड़े की तो होली जलाना अपना स्वदेशी कपड़ा खुद बनाना और खुद पहनना तो गांव-गांव गांधी जी ने चरखा चलवा और लाखों कार्यकर्ता उसमें जुड़ गए चरखा चलाने में खादी बनना शुरू हुई तो लोगों ने अंग्रेजी कपड़ा छोड़कर खादी खरीदना शुरू किया और अंग्रेजों को फिर पैसा मिलना बंद हुआ पहले अंग्रेज क्या करते थे सारा कच्चा माल यहां से कॉटन ले जाते थे लंदन और फिर कपड़ा बनता था फिर यहां आकर बिकता था जब खादी यहीं बनने लगी तो कॉटन लंदन जाना बंद हो गया तो लंका शायर और मैनचेस्टर की मिलें बंद हो गई गांधी जी के आने के बाद ऐसा जबरदस्त पूरे देश में आंदोलन चला कि इंग्लैंड की कपड़ा मिले बंद हो गई क्योंकि उनको कॉटन मिलना बंद हो गया क्योंकि उस कॉटन से यहीं खादी बनने लगी फिर गांधी जी के प्रभाव में कुछ लोग आए एक बड़े नेता थे इस देश में सॉरी नेता नहीं उद्योगपति जमशेद जी टाटा उनकी गांधी जी से मुलाकात हो गई तो गांधी जी ने उनको समझाया कि आपके पास पैसा है पूंजी है एक जमाने में भारत लोहा बनाता था सारी दुनिया को बेचता था 3000 साल हम एक्सपोर्ट करते थे आप फिर लोहा बनाना शुरू करिए क्योंकि उस समय लोहे का कच्चा माल लंदन जाता था लोहा बन के आता था तो गांधी जी ने कहा लोहा नहीं यहीं बनना चाहिए तो जमशेद जी टाटा ने 1911 में कारखाना खड़ा कर दिया फिर से इस देश में लोहा बनाने का आपको मालूम है जमशेदपुर झारखंड में यह उसी 1911 में खड़ा किया है स्वदेशी आंदोलन की ताकत पर खड़ा हुआ यह पूरा जमशेदपुर बंगाल के एक बड़े व्यक्ति हुआ करते थे जो वैज्ञानिक थे और उद्योगपति थे उनका नाम था वीसी राय विधान चंद राय वह गांधी जी से प्रभावित हुए और उन्होंने एक बहुत बड़ी कंपनी खड़ी कर दी जिसका नाम है बंगाल केमिकल्स उस जमाने में केमिकल की सारी चीजें इंग्लैंड से आती थी उन्होंने कहा इंग्लैंड से क्यों खरीदेंगे हम खुद बनाएंगे तो बंगाल केमिकल्स नाम की बहुत बड़ी स्वदेशी कंपनी खड़ी हुई टाटा स्टील नाम की बड़ी स्वदेशी कंपनी खड़ी हुई ऐसे धीरे-धीरे सैकड़ों भारत की स्वदेशी कंपनियां खड़ी होती गई अंग्रेजों का माल बिकना धीरे-धीरे बंद होता गया बाद में कहानी आई 1930 में नमक सत्याग्रह हुआ उसमें अंग्रेजों की और ज्यादा कमर टूटी फिर 1942 में भारत छोड़ो हो गया उसमें तो अंग्रेज पूरी तरह से खत्म हो गए क्योंकि 1942 में दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था उसमें अंग्रेजों की बुरी तरह से मार कर रहा था हिटलर तो हिटलर ने इतना पीटा अंग्रेजों को कि इनके सारे पैर उखड़ गए फिर 1942 में अंग्रेजों ने तय कर लिया कि हम भारत छोड़कर चले जाएंगे अब यहां हम रह नहीं पाएंगे क्योंकि जब उनका माल नहीं बिकेगा तो यहां रहकर करेंगे क्या तो यह स्वदेशी आंदोलन की ताकत ने 1942 में अंग्रेजों को मजबूर कर दिया और 1947 में अंग्रेज 15 अगस्त को भारत छोड़कर भाग गए यह कहानी स्वदेशी आंदोलन की तो इस कहानी को इतने विस्तार से मैंने क्यों सुनाया ताकि आप इस कहानी को दूसरों को सुना सके हम जब लोगों से कहेंगे ना स्वदेशी की बात करेंगे स्वदेशी का आग्रह करेंगे तो लोग पूछेंगे भाई क्यों तो उनसे कहो कि यह स्वदेशी आंदोलन हमारी आजादी का आधार है हमारी स्वतंत्रता का आधार है हमारे क्रांतिकारियों का बीज मंत्र है इसी स्वदेशी की ताकत पर हमने देश की आजादी पाई है इसलिए स्वदेशी का आग्रह हमारे जीवन में होगा अब यह तो हो गई कहानी आजादी के पहले की अब थोड़ी बाद की कनी बताता आजादी आ गई देश में हमारी सरकार बन गई पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बन गए जब वह प्रधानमंत्री बने तो कैबिनेट की बैठक हुई उसमें यह बात आई कि भाई देश का विकास करना है तो क्या करें देश का विकास करना है ना अपने रास्ते पर अपने तरीके से चलाना है स्वदेशी बनाना स्वावलंबी बनाना है तो क्या करें तो देश में उद्योग धंधे होने चाहिए होने चाहिए कि नहीं बेकारी कम हो गरीबी कम हो तो उद्योग धंधे हो अपना माल हम खुद बनाए दूसरों के सामने हाथ ना फैलाए पूरा उत्पादन होना चाहिए तो उद्योग धंधों के लिए पैसे चाहिए खजाना देखा तो खाली था पैसे थे ही नहीं क्यों अंग्रेजों ने लूट लिया सारा और जो थोड़ा बच गया था पैसा वह पाकिस्तान के बंटवारे में देना पड़ा आपको मालूम है 55 करोड़ रुपया थोड़ा बच गया था हमारे पास वह पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो अंग्रेजों ने ऐसा समझौता करवाया कि वो 55 करोड़ पाकिस्तान को देना पड़ा तो अपने खजाने में कुछ था नहीं अब स सरकार के सामने समस्या क्या आई कि उद्योग लगाना है व्यापार करना है पैसे हैं नहीं तो क्या करें तो कहीं से पैसे लाओ तो वहां फिर एक दूसरी गलती हुई दूसरी गलती क्या हुई कि अगर पैसे नहीं है और पैसे लाने हैं तो रास्ता यह अपनाना चाहिए कि पैसे अपने यहां पैदा करो पूंजी का उत्पादन करो पूंजी का उत्पादन कहां होता है खेती से आप जानते हैं पूंजी जो है ना कैपिटल वो खेत में से पैदा होती है कारखाने में से नहीं वो कैसे होती है हम खेत में एक बीज डालते हैं गेहूं का तो उसका बाल बनता है ना पौधा पौधा बनता है पक जाता है फिर काटते हैं तो कितने गेहूं के दाने निकलते हैं 60 70 80 इतने ही निकलते हैं ना एक दाना डाला 60 पैदा हो गए एक दाना डाला 70 हो गए एक दाना डाला 80 हो गए तो दाना तो हमने एक डाला और पैदा हो गए 80 दाने तो जो 79 दाने ज्यादा हुए वो पूज बन गई हमारी खर्चा किया एक दाने का पैदा हो गए 80 दाने कई कई जगह तो भारत में गेहूं के ऐसे बीज हैं जहां एक बीज डालो तो सवा स गेहूं के दाने निकलते हैं बाल में एक मैंने देखा मध्य प्रदेश में एक बीज डालो तो 150 दाने निकलते हैं एक बाल में तीन बाल निकलती है तो पूंजी पैदा होती है धरती में से धरती माता है जो खेती में इतना उत्पादन देती है उसमें से पूंजी पैदा होती है तो क्या करना चाहिए था उस समय जब भारत सरकार के सामने यह समस्या आई कि कारखाने लगाने उद्योग करना व्यापार करना पैसे की जरूरत है तो खेतों की तरफ ध्यान देना चाहिए था किसानों को सुविधाएं देनी चाहिए थी किसानों को बढ़ावा देना चाहिए था किसान पूंजी पैदा करके देते और उस पूंजी से हम देश का विकास करते लेकिन हमारे नेताओं ने गलती कर दी गलती क्या कर दी किसानों की तरफ ध्यान नहीं दिया खेतों की तरफ ध्यान नहीं दिया पूंजी के लिए विदेशों से कर्ज मांगना शुरू कर दिया जिस हिंदुस्तान ने अपने इतिहास में कभी किसी देश से कर्ज नहीं लिया था उस हिंदुस्तान ने आजादी के बाद 1952 में पहली बार दुनिया से कर्ज मांगा आपको यह सुनकर बहुत दुख होगा कि 1947 तक हम दुनिया में ऐसे देश थे जिसके ऊपर कर्जे का एक रुपया नहीं था फिर 1952 में हमारी सरकार ने विदेशी कर्ज लेना शुरू कर दिया कर्ज लेना शुरू कर दिया तो कर्ज देने वालों ने अपनी शर्तें हमारे ऊपर लगाना शुरू कर दिया आप किसी से भी कर्ज लेंगे तो फोकट में तो नहीं देगा आप बैंक से कर्ज मांगने जाते हैं ना तो बैंक अपनी शर्त बताता है कि नहीं ऐसे ही हमने विश्व बैंक से कर्ज मांगा विश्व बैंक ने अपनी शर्त बताना शुरू किया और उनकी शर्तें क्या थी उनकी शर्तें यह थी कि जिस मुद्रा में भारत हमसे कर्ज लेगा उसकी कीमत बढ़नी चाहिए मतलब भारत कर्ज लेगा अगर डॉलर में तो डॉलर की कीमत बढ़नी चाहिए भारत कर्ज लेगा अगर स्टर्लिंग पाउंड में तो स्टर्लिंग पाउंड की कीमत बढ़नी चाहिए भारत अगर कर्ज लेगा फ्रेंच में फ्रैंक में फ्रांस की करेंसी फ्रैंक तो उसकी कीमत तो जो भी विदेशी मुद्राओं में हमने कर्ज लेना शुरू किया उन मुद्राओं की कीमत बढ़ती गई और उस कीमत को बढ़ाने के लिए भारत की सरकार ने अपने रुपए की कीमत को गिराना शु श कर दिया 1952 में रुपए की कीमत गिरी 1947 15 अगस्त को एक रुपया एक डॉलर के बराबर था एक रुपया एक स्टर्लिंग पाउंड के बराबर था एक रुपया एक फ्रेंच फ्रेंक के बराबर था लेकिन 1952 आते आते रुप डॉलर हो गया फिर हमने दोबारा 1957 में कर्ज लिया फिर 1962 में लिया फिर 1967 में लिया फिर 1972 में लिया फिर 1977 में लिया फिर 1982 में लिया और 1982 के बाद हर साल कर्ज लेना शुरू कर दिया पहले पाच पाच साल में एक बार कर्ज लेते थे फिर 1982 के बाद हर साल 1983 1984 1985 हर साल कर्ज लेना शुरू किया और कई-कई प्रधानमंत्री तो ऐसे आए महानुभाव इस देश में जिन्होंने पुराने कर्जे का ब्याज देने के लिए नया कर्ज ले ऐसे भी प्रधानमंत्री आए उन्होंने कर्ज के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए परिणाम क्या हुआ कर्ज बढ़ता गया और 1991 से इस देश में एक नीति चल पड़ी जिसका नाम आप जानते हैं उदारीकरण अंग्रेजी में कहते हैं उसको लिबरलाइजेशन हिंदी में उदारीकरण फिर एक नीति है वैश्वीकरण ग्लोबलाइजेशन मैंने इस नीति का नाम बदल के रखा है उधार करण कर्ज लेना उधार लेना कर्ज लेना उधार लेना कर्ज लेना उधार लेना जितने प्रधानमंत्री आए सबने अंधाधुंध कर्ज लिया तो बढ़ते बढ़ते बढ़ते बढ़ते अब कर्ज बहुत अधिक हो गया और इन सरकारों ने क्या किया विदेशी कर्ज लिया देश के अंदर से भी कर्ज लिया दोनों तरफ से कर्ज ले लेकर ले लेकर ले लेकर विकास करने की नीव डाल दी सबसे खराब काम हुआ कर्ज ले विकास करना हमारे भारत की परंपरा क्या है जितनी लंबी चादर उतने लंबे पाव यह भारत की परंपरा है अगर हमारे पास कम पैसे हैं तो कम पैसे में ही काम चलाओ कर्जा लेकर मत आओ यह भारत की परंपरा लेकिन सरकारों ने इसका उल्टा कर दिया उन्होंने कहा कि चादर अगर बड़ी नहीं है तो उधार की चादर ले आओ तो कर्ज ले लेकर के ऊपर इस समय लगभग 18 लाख करोड़ रुपए का तो विदेशी कर्ज हो गया केंद्र सरकार और राज्य सरकारों पर और लगभग 18 लाख करोड़ का ही देशी कर्ज हो गया माने इस समय देश 36 लाख करोड़ के कर्जे में दबा हुआ है अगर आप हिसाब निकालेंगे तो एक एक हिंदुस्तानी 000 का कर्जदार है यह स्थिति हो गई अब इसमें परेशानी क्या आई कि हमने जहां विदेशों से कर्ज लिया अमेरिका से जापान से जर्मनी से फ्रांस से स्वीडन से स्विटजरलैंड से उन देशों ने हमारे ऊपर शर्तें लगाई तो पहली शर्त तो मैंने बताई रुपए की कीमत गिराओ और जिस मुद्रा में कर्ज ले रहे हो उसकी कीमत बढ़ाओ तो डॉलर की कीमत बढ़ते बढ़ते कहां तक आई एक डलर एक रप था 1947 में अब हो गया है 50 एक डलर माने रुपए की कीमत 50 गुनी कम हो गई 1947 में एक रुप एक स्टर्लिंग पाउंड था अब हो गया है रप एक स्टर्लिंग पाउंड एक करेंसी आई है दुनिया में जिसका नाम है यूरो डॉलर एक यूरो डॉलर 6 रुप हो गया हर एक दुनिया की करेंसी की तुलना में भारत के रुपए की कीमत गिर गई हमारे ऊपर शर्त लगी तो हमने वह शर्त मानी दूसरी शर्त हमारे ऊपर क्या आ गई कि जो जो देश से हम कर्ज लेंगे उन्हीं देशों की कंपनियों को भारत में व्यापार करने के लिए बुलाना पड़ेगा अगर हम अमेरिका से कर्ज लेंगे तो अमेरिका की कंपनियां भारत में आएंगी व्यापार करेंगी उनको लाइसेंस देना ही पड़ेगा अगर जापान से कर्ज लेंगे तो जापान की कंपनियां आएंगी उनको लाइसेंस देना पड़ेगा जर्मनी से कर्ज लेंगे तो वहां की कंपनियां आएंगी उनको लाइसेंस देना पड़ेगा तो भारत की सरकार ने 24 देशों से कर्ज ले रखा है तो 24 देशों की 5000 कंपनियां घुस गई हमारे देश में धंधा करने के लिए अब दुख और तकलीफ की बात क्या है कि हमने एक ईस्ट इंडिया कंपनी को 100 साल की मेहनत करके मार के भगाया था और उसको भगाने में लाखों शहीदों की कुर्बानी देनी पड़ी थी करोड़ों हिंदुस्तानियों को अपनी मां बहन बेटियों का बेइज्जती सहन करना पड़ा था एक कंपनी को को भगाने में लेकिन अब आजादी के बाद ऐसे चक्कर में देश फंस गया कि 5000 से ज्यादा विदेशी कंपनियां फिर आ गई अब इन कंपनियों के आने से फिर नुकसान हो रहा है पहले ईस्ट इंडिया कंपनी आई वह माल बेच के मुनाफा कमाती थी ऐसे यह 5000 कंपनियां माल बेच के मुनाफा कमाती है और नुकसान दोहरा हो रहा है हमारा एक नुकसान तो यह हो रहा रुपए की कीमत जैसे-जैसे गिर रही है ना बहुत नुकसान होता है इससे देश को आप समझते हैं कैसे नुकसान होता है 1947 में अगर हम रप का माल अमेरिका को बेचते थे तो हमको $ डॉलर मिलता था अब 2009 में हमको 50 का माल बेचना पड़ता है तब एक डॉलर मिलता है माने माल हमारा 50 गुना ज्यादा जाता है डॉलर हमारे पास एक ही आता है सोचो कितना बड़ा नुकसान है देश का एक उदाहरण से समझाता हूं ये आप सबको समझाइए रुपए की कीमत जब गिरती है तो नुकसान क्या होता है हम हिंदुस्तान से कच्चा लोहा बेचते हैं दूसरे देशों को तो जब हम आजाद हुए ना हमने कच्चा लोहा पहली बार जब बेचा दूसरे देशों को तो उसकी कीमत थी ₹ किलो आयरन ओवर अब क्या हुआ रुपए की कीमत गिरती गई गिरती गई गिरती गई तो वही कच्चा लोहा अब हम दुनिया के देशों को बेचते हैं तो उसकी कीमत है 15 पैसा किलो हमारा जो माल दुनिया में बिकता था ना ₹ किलो अब बिकता है 15 पैसा किलो आप सोचो 1 किलो कच्चा लोहा बेचने पर ₹ 85 पैसे का नुकसान होता है और एक साल में कर्नाटक राज्य अकेला 2 करोड़ मेट्रिक टन कच्चा लोहा बेचता है 144000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है फिर महाराष्ट्र राज्य बेचता है उसको नुकसान होता है फिर झारखंड बेचता है उसको नुकसान होता है फिर उड़ीसा बेचता है तो हिंदुस्तान को हर साल 60 से 700 हजार करोड़ का नुकसान तो कच्चा लोहा बेचने से हो रहा है क्योंकि रुपए की कीमत कम है डॉलर की कीमत ज्यादा है और एक उदाहरण से समझाता हूं आप इसको ऐसे समझ लो अगर आप बासमती चावल खाना चाहो अपने घर में तो क्या भाव मिलेगा 50 किलो मिलेगा जो चावल आप खाओगे 50 किलो रुपए की कीमत कम होने से वह चावल दुनिया के देशों को बेचा जाएगा एक रप किलो जो चीज आपको मिलेगी 50 किलो दूसरे देश उसको खरीदेंगे हमसे एक रप किलो यह है नुकसान हिंदुस्तान में आम होता है ना सबसे अच्छी क्वालिटी का आम है अल्फेंस सुना है महाराष्ट्र वाले जानते होंगे और एक है रत्नागिरी एक है हापुस एक है केसर गुजरात में जो होता है काफी तो यह सबसे अच्छी क्वालिटी के आम है इनको छूना तो दूर की बात देखना हो तो कीमत सुनके कपकपी आ जाती है 12 आम 00 का है 500 डजन का तो आप खरीदोगे तो आपको वह आम मिल रहा है 00 में 12 वही आम हिंदुस्तान से एक्सपोर्ट हो रहा है 4 50 रप में 12 क्योंकि रुपए की कीमत कम है डॉलर की कीमत ज्यादा है आप बादाम काजू किशमिश मुनक्का खरीद के खाते हो ना 00 400 किलो यह चीजें विदेशों को एक्सपोर्ट हो जाती हैं 0 70 किलो कारण रुपए की कीमत कम है डॉलर की कीमत तो होता क्या है हमारी हर चीज दूसरे देश में सस्ती बिकती है और इसका उल्टा क्या होता है दूसरे देशों से हम कुछ भी खरीदें तो वह महंगा पड़ता है बहुत महंगा पड़ता है डीजल खरीदें पेट्रोल खरीदें केरोसिन खरीदें एलपीजी खरीदें यह बहुत महंगा पड़ता है तो जो बेच रहे हैं वह 50 गुना सस्ता है जो खरीद रहे हैं वह 50 गुना महंगा है अगर दोनों को एक साथ जोड़ दो तो 100 गुने का नुकसान पूरे देश को हो रहा है लाखों करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है और दूसरा नुकसान क्या हो रहा है जिन जिन देशों से हमने कर्ज लिया उन उन देशों की कंपनियां आ गई व्यापार करने के लिए अमेरिका से कर्ज लिया तो अमेरिका की कंपनियां आ गई पेप्सी कोला कोका कोला कॉलगेट पामोलिव प्रॉक्टर एंड गैंबल रैकेट एंड कोलमैन जॉनसन एंड जॉनसन आदि आदि कंपनिया आ गई ब्रिटेन से कर्ज लिया तो वहां की आ गई जर्मनी से लिया तो वहां की आ गई इन देशों की कंपनियों ने ऐसा व्यापार फैलाया है पूरे देश में लाखों करोड़ों लूट के ले जा रहे कैसी लूट कर रही है यह कंपनियां कुछ नाम लेकर बताता हूं हमारे देश में एक कंपनी है कनाडा की उसका नाम है बाटा सुना है बाटा जूता बेचती है यह अमेरिका की कनाडा की कंपनी है भारत की नहीं नाम लि लिखा हुआ है बाटा इंडिया लिमिटेड तो आपको भ्रम हो जाएगा कि ये इंडिया की कंपनी है नहीं वो कनाडा की कंपनी जूते बेचती है जूते कैसे बेचती है वह जूते बनवाते हैं बनाते नहीं है बाटा की फैक्ट्रियां नहीं है इस देश में जूते बनाने की फैक्ट्रियां तो हमारे अपने देश की है जूते बनाने की आगरा में कानपुर में कलकत्ते में देखिए आगरा तो जूते की सबसे बड़ी मंडी है कानपुर जूते चप्पल की सबसे बड़ी तो जूते तो अपने ही लोग बनाते हैं यह बाटा कंपनी उनसे खरीद लेती है 00 में 50 में और यह कंपनी क्या करती है उस परे मोहर लगाती है 9995 पैसे 9995 पैसे 9995 पैसे आप कभी खरीदने जाओगे तो आपको लगेगा बड़े ईमानदार है यह तो 95 पैसे लेते हैं पूरा एक रुपया भी नहीं ले रहे और इतने बेईमान है 00 का जूता उस परे मोहर लग गई 9995 पैसे तो लूट कितनी हो गई जूता तो 00 का है और बेच दिया उन्होंने 699 95 का माने 00 में 00 लूट लिया एक जोड़े जूते पे तो चप्पल बेचते हैं जूते बेचते हैं और यह कंपनी 7 लाख रुपए से इसने व्यापार शुरू किया था हिंदुस्तान में मात्र 7 लाख से और आजय कंपनी करोड़ों करोड़ों रुपए लूट रही है इस देश करोड़ों एक साल की बैलेंस शीट इनकी बताती है 280 करोड़ रुपए नेट प्रॉफिट के ऐसे लूटते हैं ऐसे ही हमारे देश में एक कंपनी है यून यूनि लीवर इसने नाम बदल दिया हिंदुस्तान लीवर रख लिया यह बहुत बेईमान कंपनी है जिस देश में जाती है उसी देश का नाम अपने साथ लगा लेती है भारत में इसका नाम है हिंदुस्तान लीवर पाकिस्तान में उसका नाम है पाकिस्तान लीवर इंडोनेशिया में उसका नाम है इंडोनेशिया लीवर यह मूलतः ब्रिटेन और हॉलैंड के व्यापारियों की कंपनी भारत में घुस गई धंधा शुरू किया और इस कंपनी ने धंधा शुरू किया मात्र 24 लाख रुपए से मात्र 24 लाख रुपए से और आज यह कंपनी एक साल में 2000 करोड़ रुपए लूट करर ले जा रही है 2000 करोड़ एक साल 24 लाख से धंधा शुरू किया ऐसे एक अमेरिका की कंपनी है हमारे देश में उसका नाम है कॉल गट पामोलिव जानते हैं आप टूथपेस्ट बेचती है उसने हिंदुस्तान में 15 लाख रुपए से धंधा शुरू किया मात्र 15 लाख से और आज लगभग 300 करोड़ रुपए के आसपास वो लूट के ले जा रहे हैं और ऐसे ही मैं बताता जाऊ तो 5000 कंपनियां हैं दो चार मैंने आपको बताया बहुत जल्दी इस विषय पर एक पुस्तक छप रही है जो आपको मिलेगी उसमें सारा डिटेल है तो ऐसी यह सारी कंपनियां हिंदुस्तान में थोड़ी-थोड़ी पूंजी से धंधा शुरू करके हजारों करोड़ रुपए कमा रहे एक साल में हिंदुस्तान से यह सारी कंपनियां जो 5000 हैं कोई जूता बेच रही है कोई साबुन बेच रही है कोई मंजन बेच रही है जैसे कॉलगेट पामोलिव टूथपेस्ट और टूथ पाउडर बेचती है बाटा जूता बेचती है हिंदुस्तान लीवर लक्स लाइफ बॉय लिटल रेक्सोना यह साबुन बेचती है नहाने का कपड़ा धोने का ऐसे ही जॉनसन एंड जॉनसन है वह कुछ दवाएं बेचती है पार्क डेविस है व दवाएं बेचती है तो दवाएं बेचने वाली कॉस्मेटिक्स बेचने वाली टॉयलेट ट्रीज के आइटम बेचने वाली 5000 से ज्यादा कंपनियां हैं और एक साल में इस देश का 2 लाख 32000 करोड़ रुपए लूटते हैं कुल मिला के 2 लाख 32000 करोड़ मुझे तकलीफ इस बात की है कि पहले अंग्रेज हमको लूटते थे तो डकती करते थे घर में घुसते थे मारामारी करते थे बंदूक चलाते थे तलवार चलाते थे और लूट के ले जाते थे अब यह कंपनियां दूसरे तरह की डकैती करती यह बंदूक नहीं चलाती तलवार नहीं चलाती यह आपका दिमाग खराब करके लूट के ले जाती है और हम खुशी से लुटवानी आप पहले मजबूरी में लुटते थे अब मजे में लुट रहे हैं कैसे इन कंपनियों ने हिंदुस्तानियों की एक कमजोरी पकड़ लिए हमारी एक बड़ी भारी कमजोरी है वह पता है कमजोरी क्या है अगर कोई हमको बार-बार बार-बार बार-बार बार-बार झूठ बोलता रहे बोलता रहे बोलता रहे हम थोड़े दिन में उसको सच मानने लगते यह हमारी बहुत बड़ी कमजोरी यह विदेशी कंपनी वाले क्या करते हैं टीवी पर विज्ञापन दिखाते हैं स से शाम तक विज्ञापन दिखाते हैं एक बार दो बार 10 बार 20 बार 50 बार 100 बार 200 बार हज बार बार बार बार बार और आप देख देख के देख देख के इतने पागल हो जाते हैं कि चुपचाप वह चीज खरीद के ले आते हैं बिना सोचे समझे और विज्ञापन कैसे आता है आप टीवी का चैनल खोलो तो सबसे पहले विज्ञापन देखना पड़ेगा कोई भी चैनल खोल लो आपको अगर समाचार देखना है आज तक खोल लो स्टार न्यूज खोल लो जी न्यूज खोल लो कोई भी न्यूज खोल लो होता क्या है न्यूज आती है दो मिनट विज्ञापन आता है तीन मिनट दो मिनट न्यूज तीन मिनट विज्ञापन दो मिनट न्यूज तीन मिनट विज्ञापन दो मिनट न्यूज तीन मिनट विज्ञापन दो मिनट न्यूज तीन मिनट अब होता अंत में पता है क्या है न्यूज तो भूल जाती है विज्ञापन याद हो जाता है क्योंकि न्यूज तो बदलती रहती है ना हर दो घंटे तीन घंटे में तो वो तो भूल गए विज्ञापन सबको याद हो गया पर याद हो मैं बहुत लोगों से पूछता रहता हूं जो रोज न्यूज देखते हैं कि भाई कल क्या समाचार देखा तो कहते हैं याद नहीं फिर उनसे पूछो विज्ञापन क्या देखा तो वह याद है ठंडा मतलब कोका कोला तुरंत याद आ जाता है क्योंकि दिमाग में घुस गया बारबार बार बार बार बार तो हम हिंदुस्तानी क्या करते हैं इनका विज्ञापन देख देख के देख देख के माल खरीद लेते और विज्ञापन इस तरह से बनाते हैं जिसमें लोगों का विवेक शून्य हो जाता है एक विज्ञापन है विदेशी कंपनी है लाइफ बॉय साबुन बेचती है क्या विज्ञापन आता है लाइफ बॉय है जहां अच्छा अब आप सोचो कि लाइफ बॉय है जहां तंदुरुस्ती है वहां इसका माने तंदुरुस्ती लाइफ बॉय से आ रही है तो रोटी पानी क्यों कर रहे हो भाई खाना क्यों खा रहे हो लाइफ बॉय लगाओ रगड़ रगड़ के नहाओ तंदुरुस्ती आती रहेगी और आप बताओ तंदुरुस्ती का साबुन लाइफ बॉय हो सकता है तंदुरुस्ती का आधार दूध हो सकता है दही हो सकता है सब्जियां हो सकती है चावल हो सकता है आटा हो सकता है गेहूं हो सकता है लाइफ बॉय कब से हुआ अब अकल की बात तो यही है ना साबुन तंदुरुस्ती का आधार नहीं होता लेकिन हम जबरदस्ती लाइफ बॉय खरीदते हैं एक जमाना था कि कोई लाइफ बॉय नहीं खरीदता था आज इस कंपनी का सा करोड़ लाइफ बॉय साल में बिक जाता है और लोग रगड़ रगड़ के नहाते हैं इस उम्मीद में कि आज तंदुरुस्त हो जाएंगे कल हो जाएंगे परसों हो जाएंगे 20 दिन बाद हो जाएंगे और कैसे मूर्ख बनाती है यह कंपनी वह विज्ञापन में कहते हैं लाइफ बॉय मैल में छुपे कीटाणुओं को धो डालता है मैल को नहीं धोता मैल में छुपे हुए कीटाणुओं को धोता है और कीटाणुओं को मारता नहीं है धोता है सुना है ना ध्यान से लाइफ बॉय मेल में छुपे कीटाणुओं को धो डालता है तो मारता नहीं है धोता है इसका माने कीटाणुओं को धो पहुंचकर और तंदुरुस्त बना देता है अब यह मूर्खता है कि नहीं इस मूर्खता में सारा देश परेशान है और सारा देश क्या परेशान है लाइफ बॉय खरीद रहे हैं पैसे हिंदुस्तान लीवर विदेशी कंपनी को दे रहे हैं और कितने पैसे दे रहे हैं लाइफ बॉय आता है रप का कभी-कभी आता है रप का लाइफ बॉय दुनिया का सबसे घटिया साबुन है आपको मालूम है आप पूछोगे कैसे दुनिया में तीन तरह के साबुन होते हैं एक होते हैं बात सोप बात सोप का माने नहाने का साबुन स्नान करने का साबुन एक होते हैं टॉयलेट सोप टॉयलेट सोप माने हाथ धोने का साबुन संडास घर में से निकले तो हाथ धोने का साबुन टॉयलेट सोप और एक होता है कार्बोलिक सोप कार्बोलिक सोप का माने है जानवरों को नहलाने का साबुन लाइफ बॉय कार्बोलिक सोप है यह वह खुद कहते हैं कंपनी वाले कहते हैं मैं नहीं कहता कंपनी क्लियर करती है कि यह बात सोप नहीं है टॉयलेट सोप नहीं है यह कार्बोलिक सोप है और यूरोप के देश में लाइफ बॉय से कुत्ते नहाते हैं बिल्लियां नहाती है गधे नहाते हैं और उस लाइफ बॉय से हिंदुस्तान के सात करोड़ लोग रगड़ रगड़ के नहाते हैं ऐसा दिमाग खराब हमारा हुआ यह विज्ञापन दे और यह जो कार्बोलिक सोप है ना यह बनता कैसे है इसको भी जान लो बात सोप बनाते हैं यह हिंदुस्तान लीवर का बात सोप है जैसे लक्स जैसे लिरिल जैसे रेक्सोना इसी का एक साबुन है पियर्स तो वो सब बात सोप है उसको बनाने के बाद यह कुछ और साबुन बनाते हैं जैसे रिन उसी का है जैसे सर्फ तो कपड़ा धोने का साबुन बनाया नहाने का साबुन बनाया उन दोनों को बनाने के बाद जो कचरा बच गया उससे कार्बोलिक सोप बनाया लाइफ पॉ और वह सबसे ज्यादा बिकता है इस देश में जो सबसे घटिया साबुन है वह सबसे ज्यादा बिकता है इसके घटिया होने का प्रमाण क्या है साबुन में केमिकल जितना ज्यादा साबुन उतना ही घटिया और केमिकल उसमें जो सबसे खराब केमिकल है जो आपकी त्वचा को खराब करता है मैं आपको उसका प्रमाण देता हूं आप लाइफ बॉय से नहाए नहाने के बाद जब शरीर सूख जाए ना तो नाखून से ऐसे लाइन खींचिए सफेद रंग की लाइन खींच जाएगी कैसे खींची लाइफ बॉय के केमिकल कचरे ने आपकी त्वचा के तेल को पूरी तरह से सुखा दिया तो त्वचा एकदम रूखी और सूखी हो गई और जिनकी त्वचा रूखी और सूखी होती है और बार-बार बारबार आप उस पर साबुन रगड़ तो एक दिन आपको एग्जिमा होने ही वाला है सोराइसिस होने ही वाला है चमड़े के रोग होने ही वाले हैं आपको तो लाइफ बॉय लगा लगा के त्वचा को रूखा बना रहे हैं फिर चमड़े के रोग आ रहे हैं चमड़ के रोग आ रहे हैं तो फिर उनको ठीक करने के लिए डॉक्टरों के पास जा रहे हैं फिर उनकी दवाएं खा रहे हैं फिर उन दवाओं से शरीर पर साइड इफेक्ट आ रहा है फिर उसके लिए इलाज करा रहे हैं क्या घन चक्कर में फंस गए हम और मैंने इस कंपनी की बैलेंस शीट में से एक दिन हिसाब निकाला एक लाइफ बॉय बनाने में इस कंपनी का मुश्किल से दो रुपया खर्च होता है और उसको यह 10 12 में बेच लेती है मुनाफा इस कंपनी का सैकड़ों नहीं हजारों प्रतिशत में ऐसे यह काम करते इस कंपनी का एक साबुन है ना पियर्स वो तो 23 रप का छ सवा रुपए में बनता है 25 30 में यह कंपनी बेच लेती है इस कंपनी का एक वाशिंग पाउडर है ना 19 20 रप किलो में बनता है और उसको यह कंपनी 50 रप किलो तक बेच लेती है वाशिंग पाउडर ऐसे लूट रही है यह कंपनी और हर साल मैंने बताया ना दो करोड़ रुपए जा रहे हैं आपके मेरे खून पसीने की कमाई के तो क्या करना चाहिए तो वही करना चाहिए जो कभी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने किया था वही करना चाहिए जो लाला लाजपत राय ने किया था वही करना चाहिए जो विपिन चंद्रपाल ने किया था इसलिए परम पूजनीय स्वामी रामदेव जी ने कहा कि इन कंपनियों की लूट को अगर बंद करना है तो एक ही हथियार अपने पास है बहिष्कार करो और इनका बनाया हुआ माल खरीदना बंद करो करेंगे ना तो आज के बाद भारत स्वाभिमान का कोई भी सेनानी आज के बाद भारत स्वाभिमान का कोई भी कार्यकर्ता आज के बाद भारत स्वाभिमान का कोई भी सहयोगी कोई भी समर्थक हिंदुस्तान लीबर कंपनी का एक भी सामान नहीं खरीदेगा यही हमारा संकल्प है अब आप बोलेंगे पता कैसे चलेगा हिंदुस्तान लीवर का कौन-कौन सा सामान है वह अपनी पुस्तक है ना जीवन दर्शन उसमें पीछे पूरी सूची छपी है लक्स हां आपके पास है लक्स लाइफ बॉय लिरिल रेक्सोना पियर्स केमे पामोलिव डव यह सब विदेशी साबुन है खरीदना नहीं है इनको पूरा बहिष्कार करना अब आप बोलेंगे फिर करना क्या है देसी साबुन खरीदो देशी साबुन सब जगह मिलते हैं अपने पतंजलि योगपीठ का भी बनता है अब तो देशी साबुन वह आपको मिल जाएगा स्वदेशी साबुन आपके गांव-गांव शहर शहर में बहुत सारे स्वदेशी साबुन हैं उनको आप खरीद सकते हैं सूची में सबका नाम दिया है निर्मा है नीमा है मैसूर संदल है चंद्रिका है मेडी मिक्स है कुटीर है बहुत सारे स्वदेशी साबुन है अपना पतंजलि योग पीठ का साबुन है कांति नाम है उसका तेजस नाम है उसका तो अपने हैं और अपने गांव में भी है तो सारे स्वदेशी साबुन उपलब्ध है आप उनको खरीदो और मेरी बात मानो तो और एक कदम आगे बढ़ो बिना साबुन के ही नहाओ साबुन लगाने की जरूरत ही नहीं आप बोलोगे कैसे नहाए जब स्नान करते हो ना तो शरीर को खूब अच्छे से रगड़ लो मैल सब निकल जाता है पानी से नहा लो और एक तरीका है तौलिया होती है ना तौलिया गीला करके उससे रगड़ लो पानी से नहा लो साबुन की जरूरत नहीं और एक अच्छा तरीका है थोड़ा बेसन ले लो बेसन चने का आटा उसमें दूध मिला लो उसका पेस्ट बना लो उसको रगड़ के नहा लो साबुन की जरूरत नहीं एक बहुत अच्छी मुल्तानी मिट्टी आती है गांव-गांव मिलती है मुल्तानी मिट्टी को पानी में भिगो दो सवे तक नरम हो जाएगी रगड़ के नहा लो साबुन की जरूरत नहीं नहीं तो दूध से नहा लो अच्छा यह बताओ हम जब किसी बड़े बुजुर्ग के पांव छूते हैं तो वह क्या कहते हैं दूध नहाओ आशीर्वाद देते हैं कि नहीं कभी किसी ने यह कहा दूधो नहाओ या लाइफ बॉय लगाओ पूतो फलो लक्ष लगाओ पुत्रियां फलो नहीं कहा ना सब बोलते हैं दूध नहाओ तो फलो तो दूध से नहाओ बुजुर्गों की इतनी तो मानो तो आप बोलोगे जी दूध बड़ा महंगा है साबुन से सस्ता है साबुन आता है 100 ग्राम ₹ का तो एक किलो कितने का हुआ 50 का एक किलो दूध आता है 0 का साबुन से सस्ता है और नहाने में दूध जो है ना एक चम्मच खर्च होता है हां एक बार के नहाने में एक ही चम्मच दूध लगता है मैं तरीका बताता हूं आपको कल नहा लेना या घर जाकर नहा लेना एक दो चम्मच दूध लेना बिना गर्म किया हुआ कच्चा दूध लेना उसको शरीर में लगाना जैसे तेल लगाते हैं ना तेल लगाकर हल्की हल्की मालिश करना तो दूध की सबसे बड़ी विशेषता है जैसे ही लगाओगे तो सारे मैल और गंदगी को बाहर निकाल देता है आपको मालूम है बड़े-बड़े सुनो बड़े बड़े जो ब्यूटी पार्लर्स है ना फाइव स्टार वहां पर लोग जा मिल्क क्लींजिंग कराने के लिए मिल्क क्लींजिंग समझते हैं दूध से चेहरे की सफाई करवाना अगर वह दूध से चेहरे को साफ करा सकते हैं तो आप दूध से शरीर साफ क्यों नहीं कर सकते बस अंतर इतना है कि फाइव स्टार ब्यूटी पार्लर में मिल्क क्लींजिंग 00 रप में होती है मैं फोकट में बता रहा हूं आपको नहा के देखो दूध से थोड़ा दो चम्मच दूध ले लो मैं बहुत बार नहाता हूं दो चम्मच दूध ले लो लगा लो तेल की तरह से तो सारा मेल गंदगी निकल जाएगा फिर पानी से डाल दो तो सारा मेल और गंदगी आपकी आंखों से जाता हुआ दिखाई देगा आप देख लो गंदगी निकालने के लिए स्नान किया जाता है और गंदगी निकालने की सबसे ज्यादा ताकत दुनिया में अगर किसी एक चीज में है तो वह दूध है इसलिए हमारे देश में दूध से नहाया जाता है और दूध से नहलाया जाता है तो आप भी नहाओ अब इसका फायदा क्या होगा साबुन विदेशी नहीं बिकेंगे और या नहाना है तो देशी साबुन से नहाओ तो पैसा देश के बाहर नहीं जाएगा मैंने हिसाब निकाला था कि सब लोग साबुन लगाना बंद करें और उतने रुपए से दूध खरीद के नहाना शुरू करें तो करोड़ों किसानों को फायदा होने लगेगा दूध की बिक्री बढ़ जाएगी अब दूध की बिक्री बढ़ेगी तो दूध की मांग बढ़ेगी दूध की मांग बढ़ेगी तो ज्यादा गाय पालनी पड़ेगी ज्यादा भैंस रखनी पड़ेगी ज्यादा गाय भैंस पा लेंगे तो पशुधन बढ़ेगा पशुधन बढ़ेगा तो उनका गोबर ज्यादा मिलेगा गोबर ज्यादा मिलेगा तो खाद ज्यादा बनेगी खाद ज्यादा बनेगी तो खेतों में पड़ेगी और खेतों में पड़ेगी तो सोना उपजे तो बात समझ में आई आप नहाओ दूध से घर वालों को नहला हो दूध से अब तक तो दूध पीने की बात थी अब दूध से नहाना है और नहीं तो तो साबुन ही लगाना है तो मैंने आपसे कहा देशी साबुन उपयोग करो हमें हिंदुस्तान लीवर का 2000 करोड़ रुपए का सालना का जो बाजार है मुनाफे का इसको पूरी तरह से खत्म कर देना है ध्वस्त कर देना है समाप्त कर देना भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ता सैनिक गांव-गांव जाकर जब यह कहानी सुना देंगे तो कोई आदमी लाइफ बॉय लक्स लिरल नहीं खरीदेगा हिंदुस्तान लीवर का पूरा मुनाफा शून्य हो जाएगा और यह कंपनी बोरिया बिस्तर उठाकर अपने आप भाग जाएगी इसके लिए कोई दूसरा आंदोलन नहीं करना पड़ ऐसे ही दूसरी बात है कि हिंदुस्तान लीवर जैसी ही एक बहुत खराब विदेशी कंपनी है जिसका नाम है कॉल गट पाम लिव यह अमेरिका की है यह टूथपेस्ट बेच रही है कॉल गट का टूथपेस्ट इसी का है अब ये टूथपेस्ट बिकता है 77 30 का 100 ग्राम अब ₹ का 100 ग्राम तो समझ लो 00 किलो हिसाब जोड़ो 00 किलो और 00 तो काजू बादाम बिकता है इस देश में उनका टूथपेस्ट 00 किलो बिकता बादाम का क्या भाव है अरे वो तो बहुत अच्छी क्वालिटी है महाराज कम क्वालिटी का ले लो तो 00 किलो मारा मारा फिर रहा है तो बादाम मिलता है 300 किलो और यहां टूथपेस्ट मिल रहा है 00 किलो और पढ़े लिखे मूर्ख लोग क्या कर रहे हैं 00 किलो का पेस्ट दांतों में रगड़ के थूक रहे हैं वश वेसन में और कहते हैं हम बड़े स्मार्ट हैं 00 किलो की चीज थूक रहे हैं 50 र किलो का देसी घी रोटी पर लगा के खा रहे हैं 00 किलो का पेस्ट थूक रहे हैं वश फशन में और कहते हम बड़े स्मार्ट है तो मैं उनसे कहता हूं और स्मार्ट बनो भाई तू कहते क्या करें मैं कहता हूं यह 00 किलो का पेस्ट थूकते क्यों हो भाई रोटी पर लगा लगा के खा लो इसको क्योंकि घी से महंगा है आप यह मूर्खता मत करना यह 00 किलो का पेस्ट मुंह में क्यों लगाना बंद करो इसको खत्म करो कॉल गट क्लोज अप पेप्सोडेंट सिबा का फॉरन हजारों करोड़ रुपए देश का नुकसान है तो आप बोलोगे फिर दांत कैसे साफ करें दांत साफ करने के लिए स्वदेशी टूथपेस्ट है कि नहीं अपना दंत कांति है पतंजलि योगपीठ का तो और नहीं तो दंतमंजन है दिव्य दंतमंजन है और नहीं तो और स्थानीय दंतमंजन है लाल दंतमंजन काला दंतमंजन यह दंतमंजन वो बी सयो तरह के दंतमंजन गांव गांव में है और उससे भी अच्छी नीम की दात है टैक्स फ्री कॉस्ट फ्री साइड इफेक्ट नहीं है एक्सपायरी डेट कुछ भी नहीं है है क्या जिस गांव में है वहीं तोड़ के कर लो बबूल की कर लो कीकर की कर लो आम की दातुन होती है पाकड़ की दातुन होती है अमरूद की दातुन होती है 12 तरह के वृक्षों से दातुन होती है तो दातुन कर लो दंतमंजन कर लो अपना दंत कांति कर लो यह विदेशी पेस्ट कॉलगेट क्लोज अप सब बंद हजारों करोड़ रुपए बचाना देश का उससे दांत अच्छे भी रहेंगे स्वस्थ भी रहेंगे आपको मालूम है दांत साफ करने के पीछे दो उद्देश्य है एक तो दांतों में जो अनन कण फसे हैं ना ये निकल जाएं दूसरा मसूड़ों की मालिश हो मसूड़ों की मालिश होती है तो मसूड़ों में खून का प्रवाह तेज होता है और खून का प्रवाह तेज होगा तो मसूड़े मजबूत होंगे और मसूड़े मजबूत हो तभी दांत मजबूत हो सकते हैं अन्यथा दांत मजबूत होने का रास्ता नहीं है तो मसूड़े मजबूत करने का तो एक ही तरीका है उंगली से दांत घिस तो दंत मंजन करो तो दंत मंजन से दांत तो साफ होंगे मसूड़े मजबूत होंगे टू इन वन है एक काम करो दो का फायदा तो अपना तो दिव्य दंत मंजन सब अच्छा है उसका उपयोग करो और दिव्य दंत मंजन आप खरीद रहे हो तो पैसा भारत स्वाभिमान या पतंजलि योग पीठ में ही आएगा और वह पूरे देश के संपूर्ण स्वदेशी अभियान में लग जाएगा आप कॉलगेट क्लोज अप खरीद रहे हो तो पैसा विदेश जाएगा और किसी विदेशी कंपनी को अमीर बनाएगा तो साबुन नहाने का कपड़ा धोने का स्वदेशी और कपड़ा धोने का साबुन मैं विशेष रूप से आपसे कहना चाहता हूं जब देश कपड़ा धोने का साबुन खरीदो ना तो वह साबुन खरीदना जिससे कपड़ा धोने में कम से कम पानी खर्च होता है क्योंकि पानी की एक-एक बूंद कीमती है आपको मालूम है अभी हम डिटर्जेंट पाउडर ले आते हैं वाशिंग पाउडर ले आते हैं इसमें कपड़े को धोते जाओ धोते जाओ झाग निकलना बंद ही नहीं होता कभी और आपको मालूम है झाग निकला हुआ पानी जब हम नाली में डाल देते हैं नाली से यह पानी कहीं खेतों में पहुंच जाता है पूरी मिट्टी को खराब करता है क्योंकि इसमें इतने केमिकल हैं जो मिट्टी को खत्म कर देते इसलिए कपड़ा धोने के लिए डिटर्जेंट पाउडर वाशिंग पाउडर ज्यादा इस्तेमाल मत करना कौन सा साबुन इस्तेमाल करना वह बट्टे वाला साबुन आता है ना पीला पीला सफेद सफेद ऑयल केक दिल्ली में खूब बनता है मेरठ में खूब बनता है जगह-जगह बनता है वह इस्तेमाल करना क्योंकि उससे कम से कम पानी में कपड़े धोए जा सकते हैं और उस वो ऑयल केक में फायदा पता है क्या है उसमें तेल है तेल वाला पानी जब आप फेंको ग तो यह पानी खेत में जाएगा यह कोई नुकसान नहीं करेगा क्योंकि तेल सरसों में से निकला है या नारियल में से निकला है या सोयाबीन में से निकला आया तो मिट्टी से ही है ना तो बायोडिग्रेडेबल है इसलिए कपड़ा धोने के साबुन को इस्तेमाल करना बट्टे वाला डिटर्जेंट पाउडर डिटर्जेंट के कम और इसी तरह से आप और अपने घर में थोड़ा परिवर्तन लाना विदेशी जो क्रीम पाउडर लिपस्टिक है नेल पॉलिश है कॉस्मेटिक्स है यह सब निकालो बाहर फेयर एंड लवली क्लियर सिल क्लियर टोन रेसमिक इमामी पंस ये सब हटाओ सब विदेशी बहुत महंगी है लूट हो रही है इसमें फेयर एंड लवली का भाव मालूम है 25 ग्राम है 0 50 ग्राम 80 100 ग्राम 0 एक किलो 00 अब 00 किलो की क्रीम लगाओ मुंह पे उससे अच्छा 4 किलो बादाम खरीद के खाओ अकल लगाओ ना अपनी अब 00 किलो की क्रीम लगाओ जिससे कुछ नहीं होने वाला उससे अच्छा चार किलो बादाम खरीद के खाओ क्योंकि यह फेयर एंड लवली लगाकर कोई गोरा नहीं हुआ आज तक अगर हो जाता तो अफ्रीका वाले क्यों काले हैं मैंने लगा के देखा था एक भैंस को चार साल फेयर एंड लवली अभी भी काली की काली ही है दुनिया में कोई आदमी फेर लवली लगा के गोरा हुआ नहीं और होने की दूर-दूर तक संभावना नहीं क्योंकि जो आदमी काला और गोरा होता है ना उसका सिद्धांतही अलग है हमारे खून में एक केमिकल होता उसका नाम है मिलेनिन जब मिलेनिन की मात्रा बढ़ जाती है तो शरीर काला पड़ जाता है जब मिलेनिन की मात्रा कम हो जाती है शरीर गोरा हो जाता है और जब मिलेनिन की मात्रा ना बढ़ती है ना घटती है सामान्य रहती है तो शरीर सांवला होता है हम सब हिंदुस्तानी सांवले हैं क्योंकि मिलेनिन नाना ज्यादा है ना कम है और आदर्श स्थिति यही होती है और ज्यादा गोरा होने के चक्कर में मत फसो मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं हमारे देश के एक राष्ट्रपति थे डॉक्टर राधा कृष्णन सुना जब वह राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार लंदन गए तो अंग्रेज पत्रकारों ने उनको चिड़ाने के लिए एक सवाल पूछ लिया सवाल क्या पूछा डॉक्टर राधा कृष्णन से पूछा गया लंदन प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या आप हिंदुस्तानी लोग काले क्यों होते हैं राधाकृष्ण जी ने इतना सुंदर जवाब दिया वह आप सबको देना उन्होंने कहा हम हिंदुस्तानी काले नहीं होते कुछ और होते हैं तो उसने कहा क्या होते हैं तो उन्होंने एक कहानी सुनाई उन्होंने कहा भगवान ने रोटी बनाई भगवान जी ने रोटी बनाई तो रोटी कच्ची रह गई वो खाके तुम सब अंग्रेज पैदा हो गए भगवान जी ने फिर एक रोटी बनाई और वो जल गई उसको खाकर यह सब अफ्रीकी पैदा हो गए और फिर भगवान जी ने एक तीसरी रोटी बनाई जो ना कच्ची रही ना जली बराबर स उसको खाकर हम हिंदुस्तानी पैदा हुए तो हम काले नहीं है सांवले हैं और मैं आपको बताऊं विज्ञान ने यह स्वीकार कर लिया है आज कि सांवले रंग की त्वचा को कैंसर होने की संभावना सबसे कम कम होती है कारण क्या है खून में मिलेनिन की मात्रा सबसे परफेक्ट हमारी ही है इसलिए अपने सांवले होने पर गर्व करो इसको हीन भावना से मत देखो और बार-बार ध्यान करो कि शंकर जी सांवले भगवान राम सांवले श्री कृष्ण सांवले तो हम गोरे होकर करेंगे क्या हम तो सांवले ही अच्छे हैं जब यह बात मन में बैठ जाए कि सांवले अच्छे हैं तो फेयर एंड लवली की जरूरत क्या फिर क्योंकि वोह तो गोरा बनाने वाली क्रीम है हटाओ उसको 00 किलो की फालतू में तो ये फेयर एंड लवली क्लियर सिल क्लियर टो रेसम कि मामी पं से सब हटाओ घर में से फिर आप बोलोगे जी कौन सी क्रीम लाए कोई मत लाओ आप जैसे हो बहुत अच्छे हो लगा नहीं है तो देसी गाय का घी चपड़ लिया करो सबसे अच्छा हां उससे अच्छी कोई चीज और नहीं तो जैसे हैं वैसे अच्छे हैं आप इस बात का ध्यान रखो कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की परीक्षा उसके शरीर के रंग से नहीं होती उसके काम से होती है उसके गुण से होती है उसके स्वभाव से होती है हर व्यक्ति का व्यक्तित्व नापा जाता है गुण कर्म स्वभाव से वो इस बात से नहीं नापा जाता हाय कितना गोरा है कोई नहीं कहता अब कोई मर जाता है हमारे देश में तो उसके बारे में आपस में चर्चा करते हैं तो कहते कितना दयालु था कितना देशभक्त था कितना काम करता था समाज का कभी यह सुना कोई कहता ओ क्या गोरा चिट्टा था मर गया बेचारा कोई नहीं कहता त्वचा का रंग याद नहीं करते गुण कर्म स्वभाव याद किए जाते हैं तो गुण कर्म स्वभाव अपने अच्छे बनाओ यह फेयर एंड लवली वगैरह की जरूरत नहीं और माताओं बहनों को जरूर समझाओ यह बात उनके दिमाग में यह बात लाओ मुझे इतना दुख है यह बात कहते हुए कि जब यह विज्ञापन आता है ना फेयर एंड लवली गोरेपन की क्रीम एक दिन समय आने पर भारत स्वाभिमान की तरफ से इस विज्ञापन के खिलाफ मुकदमा करना है सुप्रीम कोर्ट में क्या मुकदमा करना है जब बारबार वो टीवी पर दिखाते हैं ना फेयर एंड लवली गोरेपन की क्रीम एक हफ्ते में गोरापन आएगा 15 दिन में आएगा 21 दिन में आएगा आप ट्यूब लाइट की तरह से जलने लगेंगे इतने गोरे हो जाएंगे जब यह विज्ञापन बार-बार आता है ना तो करोड़ों इस देश की काली मां बहन बेटियों के छाती पर आरी चलती है यह आप महसूस करने की कोशिश करो हमारा हिंदुस्तान तो आप जानते हैं 115 करोड़ का है 50 करोड़ माताएं बहने हैं इस देश में और उस 50 करोड़ माताओं बहनों में लगभग 40 से 45 करोड़ सांवली हैं या काली हैं उनके दिलों पर कटार चलती है आरी चलती है जब वह यह विज्ञापन देखती हैं कि हाय रे हाय गोरेपन की क्रीम फेयर एंड लवली और उन माताओं बहनों को क्या लगता है कि गोरे होने से ही फिर जिंदगी संती है और मुझे इससे भी ज्यादा तकलीफ है मैंने पेपर न्यूजपेपर की कटिंग काट के रखी है कई बहन बेटियों ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि उनकी शादी नहीं हुई कालेपन के कारण सांवले पन के कारण तो फांसी लगाकर मर गए हमारे हिंदुस्तान में मां बहन बेटियों के व्यक्तित्व को रंग से नहीं नापा गया कभी भी हमने उनके गुण कर्म स्वभाव से नापा है लेकिन यह विज्ञापन जो आता है रोज फेयर एंड लवली गोरेपन का यह करोड़ों माताओं की छाती पर आरी चलाता उनके दिल को चोट पहुंचाता है उनकी तरफ से हमें मुकदमा करना है एक बार और इस कंपनी को कटघरे में खड़ा करना है कि तुम सिद्ध करो तुम्हारी क्रीम में ऐसा क्या है जो किसी को गोरा बना सकता है कुछ नहीं इसलिए दिमाग से निकाल दो यह सारी बकवास बात है तो सारे घर को देखो सफाई करो सब कचरा निकालो घर में से कॉल गट का क्या है प्रोक्टर एंड गमल का क्या है जॉनसन एंड जॉनसन का क्या सूची आपको दी गई है उसको ढूंढ ढूंढ के देख देख देख के सामान खरीद के लाओ मेरा तो आप सबको निवेदन है कि अपने जीवन दर्शन में से यह सूची को फोटोकॉपी करा लो और एनलार्जमेंट दो जा क्योंकि रसोई घर है जहां बार-बार नजर जाती है हमारी हमारी मां बहन हमारी बेटी बार-बार रसोई घर में काम करती हैं उनको ध्यान में आएगा यह स्वदेशी यह विदेशी यह स्वदेशी यह विदेशी यह स्वदेशी अगर यह दिमाग में आने लगा ध्यान में आने लगा तो फिर बाजार से खरीदना भी इन चीजों का शुरू होगा फिर परिणाम क्या होंगे सारे हिंदुस्तान से स्वदेशी माल खरीदने की मांग खड़ी हो जाए सारी विदेशी कंपनियों का माल बिकना एकदम से पूरे देश में खत्म हो जाए तो फिर से वह स्वदेशी आंदोलन खड़ा हो जाए जो 1905 में हुआ था और 1905 के स्वदेशी आंदोलन ने ईस्ट इंडिया कंपनी को यहां से भगाया 2009 के स्वदेशी आंदोलन से यह 5000 विदेशी कंपनियां भागी यहां से अब यह कंपनियां भागी तो परिणाम क्या होगा साल का 2 32000 करोड़ रुपए बचत होगी व 2 32000 करोड़ रुपए से हम कितने कारखाने लगा सकते आप सोचो एक छोटी फैक्ट्री लगाएं जिसमें 10 आदमी को रोजगार मिले तो एक करोड़ रुपए में बन जाती है 2 32000 करोड़ रुपए में हर साल 2 32000 छोटी फैक्ट्रियां बन सकती हैं जिसमें 101 आदमी को काम मिले तो 20 लाख सवा लाख लोगों को हम रोजगार दे सकते हैं एक साल में उतने ही पैसे दूसरा फायदा क्या होगा अगर यह पैसा बचता है विदेशी माल बहिष्कार करके स्वदेशी माल उपयोग करके तो इस बचे हुए पैसे को अगर हम देश के विकास के लिए उपयोग करें तो कर्ज लेने की जरूरत ना पड़े किसी देश से आपको मैं एक देश का बहुत बड़ा दर्द बताना चाहता हूं जितना पैसा हर साल इस देश का विदेश में जाता है विदेशी कंपनियों की लूट से लगभग उतना ही पैसा हर साल हमको कर्जे में लेना पड़ता है दूसरे देशों से ढाई लाख करोड़ 3 लाख करोड़ का हर साल कर्ज लेना पड़ता है अगर हम यह बचा ले तो कर्ज नहीं लेना पड़ेगा और ध्यान दीजिए अगर हम कर्ज लेना बंद करते हैं तो हमारा रुपया अमेरिका के डॉलर के बराबर हो जाएगा आज एक डॉलर में 50 है फिर एक रुपए में एक डॉलर हो सकता है एक रुपए में एक स्टर्लिंग पाउंड हो सकता है एक रुपए में एक ड्यूश मार्क हो सकता है अब जरा थोड़ा आगे लेकर चलता हूं कि मान लो रुपया और डॉलर बराबर हुआ तो फिर क्या होगा तो फिर यह होगा कि जो चीज अभी हम बेच कर जो चीज आज हम बेचकर एक डॉलर कमा रहे हैं फिर उतनी ही चीज बेचकर 50 डॉलर कमाएंगे सोचो आप अभी हम एक डॉलर की वस्तु बेचते हैं और एक डॉलर में 50 रुपया है फिर एक डॉलर एक रुप के बराबर हो जाए अगर हम कर्ज लेना बंद कर दें क्योंकि रुपए में कर्ज लेना आप बंद कर देंगे डॉलर का डीवैल्युएशन शुरू हो जाएगा आप डॉलर में कर्ज ले रहे हैं ना तो डॉलर की डिमांड बढ़ रही है जिस चीज की मांग बढ़ती है कीमत उसी की बढ़ती है और जिस चीज की मांग घटती है कीमत उसकी घटती है तो डॉलर में कर्ज लेते हैं डॉलर की डिमांड बढ़ती है तो डॉलर की कीमत बढ़ती है कर्ज लेना बंद कर दें डॉलर की डिमांड अपने आप कम हो जाएगी डॉलर की कीमत कम हो जाएगी रुपए की कीमत अपने आप बढ़ जाएगी रुपए की कीमत बढ़ते ही एक डॉलर का जो माल हम बेचेंगे उससे $50 हमको कमाई मिलेगी माने आज हम जित ना एक्सपोर्ट करते हैं 200 अरब डॉलर यह एक्सपोर्ट 200 गुना 50 अरब डॉलर हो जाएगा सीधे-सीधे अभी हम ले रहे हैं 200 अरब डॉलर फिर हो जाएगा 10000 अरब डॉलर इतने डॉलर्स इस देश में आएंगे कि रख नहीं पाएंगे हम इस स्वदेशी आंदोलन से कितना बड़ा परिवर्तन होगा देश में आप सोचो एक तो विदेशी कंपनी का माल बिकना बंद हुआ वो दूसरा देश के रुपए में बढ़ोत्तरी आएगी डॉलर में कमी आएगी एक्सपोर्ट ज्यादा होगा इंपोर्ट कम होगा आयात का खर्चा कम निर्यात की आमनी ज्यादा तो सरप्लस हो जाएगा और सरप्लस हो गया अगर इस हिंदुस्तान में तो दुनिया का कोई देश हमको रोक नहीं पाएगा हम अमेरिका के भी आगे जाएंगे और यूरोप के भी आगे एक छोटी सी बात और कहक मैं खत्म करूंगा आप में से जो कार्यकर्ता भाई ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं जो गांव से आए हैं उनको भी स्वदेशी आंदोलन चलाना है उनको स्वदेशी आंदोलन क्या चलाना है अपने गांव में विदेशी कंपनियों की सबसे ज्यादा बिकने वाली जो चीज है वह है रासायनिक खाद जिसको हम यूरिया कहते हैं डीएपी कहते हैं सुपर फॉस्फेट कहते हैं और रासायनिक कीटनाशक जिसको एंडोसल्फान कहते हैं मेलाथियान कहते हैं पैराथू हेक्सा क्लोराइड कहते हैं तो यह विदेशी कंपनियों के कीटनाशक और रासायनिक खाद यह किसानों के बीच में सबसे ज्यादा खरीदी जाती है और एक साल में 48 हजार करोड़ रुपए की खरीदी जाती है रासायनिक खाद और कीटनाशक माने हमारे किसान हर साल रासायनिक खाद और कीटनाशक खरीदकर विदेशी कंपनियों को 4800 हज करोड़ रुपए दे रहे हैं यह भी हमको बचाना है तो क्या करना है किसानों को समझाना है जाकर गांव-गांव में कि भैया यह रासायनिक खाद विदेशी है यह मत डालो तो किसान पूछेगा क्या डाले तो उससे कहो गोबर की खाद डालो ये रासायनिक खाद मत डालो तो किसान पूछेगा जी गोबर की खाद में फायदा कम है रासायनिक खाद में फायदा ज्यादा है तो उसको बड़े प्रेम से समझाना है कि गोबर की खाद में ही फायदा ज्यादा है रासायनिक खाद में फायदा तो बहुत कम है क्योंकि रासायनिक खाद बहुत महंगी मिलती है है पहले एक कट्टा रासायनिक खाद मिलती थी ₹ में अब एक कट्टा रासायनिक खाद मिलती है 00 में 00 में 50 में और कभी-कभी ब्लैक हो जाए तो 00 में यूरिया और हर साल कीमत बढ़ती जाती है क्यों क्योंकि यह रासायनिक खाद बनती है उन वस्तुओं से जिनको पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स कहा जाता है और सारे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स जिसको नेफ्टा कहते हैं वो विदेशों से आता है इसका पैसा पूरा विदेश में जाता है किसानों को समझाइए ये कि बहुत महंगी पड़ती है और इसकी महंगाई पता है दूसरी क्या है एक बार आपने खेत में एक कट्टा यूरिया डाल दिया तो अगली बार दो कट्टा डालना पड़ेगा दो बोरे डालना पड़ेगा और एक बार दो बोरे पड़ गया तो अगली बार तीन बोरे डालना पड़ेगा एक बार तीन पड़ गया तो फिर चार डालना पड़ेगा हर बार बढ़ता ही जाता है बढ़ता ही जाता है बढ़ता ही जाता है खर्चा बढ़ता जाता है और मालूम है रासायनिक खाद बहुत गर्म होता है गर्म रासायनिक खाद यूरिया डीएपी आप डालते हैं मिट्टी पूरी चटक जाती है गर्मी के कारण तो पानी ज्यादा देना पड़ता है गोबर की खाद लगाकर खेती करें तो गेहूं की फसल लेने में तीन पानी लगता है यूरिया डीएपी डालकर अगर गेहूं की खेती करें तो पांच छह बार पानी लगाना पड़ता है पानी का खर्चा बढ़ जाता है और पानी का खर्चा बढ़ेगा तो पानी तो जमीन में से ही निकालना पड़ता है जमीन से ज्यादा पानी निकाल के आप खेतों में डालते रहेंगे तो पानी का तल नीचे नीचे नीचे नीचे होता चला जाता है पहले पानी 253 फुट पर मिलता था अब पानी 900 फुट तक नहीं मिलता खेतों में तो किसानों को समझाइए कि यूरिया डालने से बड़ा भारी नुकसान है एक तो हर साल खाद की मात्रा बढ़ानी पड़ती है खर्चा बढ़ता है दूसरा हर साल पानी की मात्रा बढ़ानी पड़ती है वह खर्चा बढ़ता है और जहां पानी निकालने के लिए बिजली नहीं है वहां डीजल पंप चलाना पड़ता है तो डीजल का बढ़ता है और डीजल कभी भी महंगा होता रहता है एक जमाने में ₹ लीटर मिलता था डीजल अब ₹ लीटर दो चार दिन के बाद यह ₹ लीटर होने जा रहा है फिर हो सकता है साल डेढ़ साल में ₹1 लीटर हो जाए किसान कहां जाएगा मर जाएगा वो तो डीजल का खर्चा करते करते और फिर एक और नुकसान होता है कि ये यूरिया डीएपी जब हम खेत में डालते हैं तो मिट्टी में यह केमिकल घुल जाते हैं और मिट्टी में घुल गए तो पौधे की जड़ में आ जाते हैं पौधे की जड़ से पौधे के तने में आ जाते हैं पौधे के तने से पौधे के फल में आ जाते हैं पौधे के फल में आ जाते हैं तो फिर वही फल हम खाते हैं हमारे शरीर में आ जाते हैं और हमारे शरीर में अगर यह जहर आ गया तो हमारी माताएं तो पूतना हो जाती है आपने पूतना की कहानी सुनी कृष्ण भगवान को जहर पिलाने के लिए आई थी आज हमारी माताओं के दूध में जहर आ चुका है अपने अपने बच्चों के लिए वह पूतना की स्थिति में है आज हमारे देश की कई संस्थाओं ने माताओं के दूध का परीक्षण करवाया है तो माताओं के दूध में वह सारे केमिकल हैं जो यूरिया में है माताओं के दूध में वह सब केमिकल है जो कीटनाशक दवाओं में है क्योंकि भोजन हम कर रहे हैं भोजन के साथ वह शरीर में जा रहे और यही केमिकल है जो आपको कैंसर पैदा करवा रहे हैं जो आप में डायबिटीज दे रहे हैं जो आप में हाई ब्लड प्रेशर दे रहे हैं हाइपरटेंशन दे रहे हैं 148 किस्म की बीमारियां इन जहर से पैदा होती है इसलिए किसानों को समझाओ कि यूरिया डीएपी का जहर एक तो विदेशी है यह बंद करो दूसरा यह शरीर को नुकसान देता है इसलिए बंद करो तीसरा यह पैसे का नुकसान करता है इसलिए बंद करो तो किसान पूछेंगे भाई क्या करें तो उनसे कहो गोबर का खाट डालो अब किसान क्या पूछेगा आपको सबसे पहले वो कहेगा गोबर के खाद से तो उत्पादन नहीं होता तो उससे कहो गोबर के से भी उत्पादन बहुत अच्छा होता है यूरिया डीएपी से जितना नहीं होता उससे तो ज्यादा गोबर के खाद से होता है मैं तो पिछले 12 1 साल किसानों के बीच में काम करता रहा महाराष्ट्र और कर्नाटक में आप आइए वहां देखिए हजारों हजारों किसानों ने यूरिया डीएपी बंद करके गोबर का खाट डालना शुरू किया है और जिस किसान के यूरिया डीएपी के खेत में एक एकड़ में 20 से 25 मेट्रिक टन गन्ना होता था आज उस किसान के खेत में गोबर का खाट डालने से 90 से 100 मीट्रिक टन गन्ना हो रहा है कम नहीं होता है जिन किसानों के खेत में यूरिया डीएपी डालने से एक एकड़ में 12 क्विंटल गेहूं होता था आज उनके खेत में गोबर का खाट डालने से 20 से 22 क्विंटल गेहूं हो रहा है जिन किसानों के खेत में यूरिया डीएपी डालने से एक एकड़ में ढाई क्विंटल कपास होती थी आज उन किसानों के खेत में गोबर का खाट डालने से 7 क्विंटल एकड़ का कपास हो रही है ऐसे एक नहीं हजारों किसान है महाराष्ट्र में कर्नाटक में थोड़ा अगर चलेंगे तो छत्तीसगढ़ में बहुत किसान है 12 साल मैंने बहुत काम किया किसानों के बीच जा जाकर उनको यह सब सिखाया गोबर की खाद से उत्पादन ज्यादा मिलता है यूरिया डीएपी की तुलना क्यों मिलता है वह जानना चाहिए बहुत बहुत बढ़िया बात है जो आप जान लो तो आप किसानों को समझा सकते गोबर की खाद जब हम खेत में डालते हैं तो होता क्या है गोबर जो है ना कई तरह के जीव जंतुओं का भोजन है यूरिया जो है वह भोजन नहीं जहर है आपके खेत में एक जीव होता है जिसको केंचुआ कहते हैं केंचुआ को किसी दिन पकड़ना और हाथ पर रखना और उसके ऊपर यूरिया डाल देना दो चार दाने यूरिया डालोगे वह तड़पना शुरू हो जाएगा और एक मिनट में मर जाएगा हम जब खेत में टनो टन यूरिया डालते हैं ना करोड़ों केंचुए मार डाले हमने यूरिया डाल डाल के और केंचुए क्या करते हैं केंचुए मिट्टी को नरम बनाते हैं पोला बनाते हैं और उपजाऊ बनाते हैं केंचुए का काम क्या है ऊपर से नीचे जाना नीचे से ऊपर जाना पूरे दिन में वोह तीन चक्कर नीचे ऊपर के लगाता है नीचे जाएगा फिर ऊपर आएगा फिर नीचे जाएगा फिर ऊपर आएगा अब केचुआ जिंदा है तो नीचे जाएगा फिर ऊपर आएगा केचुआ जब नीचे जाता है तो एक रास्ता बनाते हुए जाता है ऊपर आता है तो दूसरा रास्ता बनाते हुए आता है तो परिणाम क्या होता है कि यह छोटे-छोटे छिद्र जब मिट्टी में वो केंचुए तैयार कर देता है तो बारिश का पानी इन्हीं छिद्रों में से नीचे एक-एक बूंद नीचे रिसते हुए तल में जमा होता है माने वाटर रिचार्जिंग का दुनिया में सबसे जबरदस्त काम कोई करता है तो केंचुआ करता है और यूरिया के कारण यह मर जाता है इसलिए यूरिया डालना माने किसान के लिए आत्महत्या करने के बराबर है जिस किसान के खेत में यूरिया डले का केंचुआ मर जाए केचुआ मरा तो मिट्टी में ऊपर नीचे कोई जाएगा नहीं तो मिट्टी कठोर होती जाएगी कड़क होती जाएगी मिट्टी और रोटी के बारे में एक सत्य है कि इसको फेरते रहो नहीं तो खत्म हो जाती है रोटी को फेरना बंद करो जल जाती है मिट्टी को फेरना बंद करो पत्थर जैसी हो जाती है मिट्टी को फेरने का मतलब समझते हैं ऊपर की मिट्टी नीचे नीचे की मिट्टी ऊपर ऊपर की नीचे नीचे की ऊपर यह केंचुआ ही करता और कोई नहीं कर सकता केंचुआ तो किसान का सबसे बड़ा दोस्त है मैंने इसका हिसाब निकाला था एक केंचुआ साल भर अगर जिंदा रहे तो 36 मीट्रिक टन मिट्टी को उठक पटक कर देता है ऊपर से नीचे नीचे से ऊपर एक केचुआ साल भर में और उतनी ही मिट्टी को ट्रैक्टर से उलट पलट करना पड़े तो कम से कम 100 लीटर डीजल खर्च होता है और 100 लीटर डीजल 3600 का आता है माने एक केचुआ हर आदमी का 3600 बचा रहा है ऐसे करोड़ों कचुए हैं पता सोचो कितने हजार करोड़ रुपए बच रहे हैं इस देश के इसलिए गोबर का खाट डालने से फायदा क्या होता है रासायनिक खाट डालो केंचुआ मर जाता है गोबर का खाट डालो केंचुआ जिंदा हो जाता है क्योंकि गोबर केंचुए का भोजन है कचुए को भोजन मिले तो वह अपनी जनसंख्या बढ़ाता है और इतनी तेज बढ़ाता है कि कोई नहीं बढ़ा सकता भारत सरकार कहती है हम दो हमारे दो केचुआ नहीं मानता उस बात को एक एक केचुआ 50 हजार बच्चे पैदा करके मरता है 50 हजार एक जाति का केंचुआ तो मैंने देखा एक लाख पैदा करता है बच्चे तब मरता है तो वह एक जिंदा है उसने एक लाख पैदा कर दिए अब वह एक एक लाख एक एक लाख पैदा करेंगे करोड़ों कचुए हो जाएंगे अगर गोबर डालना शुरू किया और केंचुए ज्यादा होंगे तो मिट्टी फिर उलट पलट होने लगेगी मिट्टी में छिद्र बनने लगेंगे तो बारिश का जितना भी पानी गिरेगा सब मिट्टी में आ जाएगा और पानी मिट्टी में गया तो नदियों में बेकार नहीं बहेगा तो बाढ़ नहीं आएगी तो समुद्र में फालतू पानी नहीं जाएगा इस देश का करोड़ों करोड़ों रुपए का फायदा हो जाएगा इसलिए आप किसानों को समझाओ गोबर की खाट डालो फिर कुछ किसान कहेंगे जी उत्पादन होगा क्या उनसे कहना गारंटी मेरी गारंटी भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की थोड़े दिन में भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की तरफ से हम किसानों को कहेंगे कि आप बिंदास गोबर की खाट डालो गारंटी हमारी एक ग्राम भी उत्पादन कम नहीं होगा कैसे कम नहीं होगा डालने का तरीका है डालने का तरीका क्या है अभी किसान गोबर कैसे डालते हैं गोबर डालते हैं वह घुरा है घुरा गांव में कचरा डालने का वहां गोबर इकट्ठा करते हैं छ महीने आठ महीने साल भर वह सूखता रहता है और सूख सूख के उसकी सारी ताकत निकल जाती है फिर वह सूखा हुआ गोबर हम डालते हैं इससे उत्पादन ज्यादा नहीं आता गोबर को हमेशा गीला डालना चाहिए ताजा डालना चाहिए गोबर को अगर पानी में घोल के डालो ना तो वही तीन गुना ज्यादा फायदा करता है तो किसानों को यह समझाओ कि गोबर को सुखा के खेत में ना डाले उसको पानी में घोल के डाले तो कैसे घोलेंग पानी में उसका फार्मूला लिख लो आप और जो जो गांव में जाने वाले कार्यकर्ता है यह सब किसानों को आप बोलो कितना गोबर डालना है कितना पानी उसमें मिलाना है कितने बीघे के लिए काम में लाना है उसको अब आपको मैं एक मोटी सी बात बता देता हूं एक एकड़ एक एकड़ माने ढाई बीघा पाच बगा नहीं ढाई बीगा तो एकड़ ढाई बीगा का हिसाब जोड़कर बताता हूं एक किसान को एक बार में एक एकड़ फसल के लिए कितना गोबर डालना पड़ेगा गीला करके डालेंगे तो 10 किलो गोबर बस 10 किलो गोबर 10 किलो गोबर फिर से सुन लो 10 किलो ज्यादा नहीं बोल रहा हूं 100 किलो नहीं 10 किलो गोबर एक एकड़ के लिए डालना कैसे लिख लो 10 किलो गोबर फिर इसमें चाहिए 10 लीटर मूत्र जिस जानवर का गोबर उसी का मूत्र गाय का गोबर तो गाय का मूत्र भैंस का गोबर तो भैंस का मूत्र बैल का गोबर तो बैल का मूत्र अब आप बोलोगे गोबर तो इकट्ठा कर लेंगे मूत्र कैसे इकट्ठा करें जानवर जो मूत्र देते हैं ना जहां पर आप जानवरों को रखते हो वहां पर पत्थर पत्थर लगाकर एक छोटी सी नाली बना लो और उसमें ढाल लगा दो जितना भी वह पेशाब करेंगे वह नाली में आ जाएगा नाली के आगे खड्डा खोद दो वह सारा उसमें जमा हो जाएगा फिर वह ले लो और मैं आपको एक अच्छी बात बताता हूं जानवरों के मूत्र की कोई एक्सपायरी डेट नहीं है एक साल दो साल 3 साल 5 साल 10 साल 20 साल 50 साल खराब ही नहीं होता तो चिंता करने की बात ही नहीं है तो इकट्ठा होता रहेगा खड्डे में डालते रहो तो 10 किलो गोबर 10 लीटर मूत्र ठीक है फिर इसमें मिलाना है लगभग एक किलो गुड़ आधे से 1 किलो गुड़ गुड़ गुड़ तो आप सब जानते हो एक तो गुड़ होता है जिसको आप खा लेते हो एक तो गुड़ ऐसा होता है जिसको जानवर खा लेते हैं और एक गुड़ ऐसा होता है जिसको कोई नहीं खा सकता गीला गीला पुराना पुराना काला काला वो गुड़ खेत के बहुत काम का है जो सबसे घटिया गुड़ है जिसको ना जानवर खा सकते हैं ना आपका वह खेत के लिए बहुत काम का है तो वह गुड़ ले लो आधे से एक किलो गोबर हो गया मूत्र हो गया गुड़ हो गया अब इसमें लगभग एक किलो डालना है दाल का आटा दाल है ना दाल अरेर की दाल मूंग की दाल उड़द की दाल चने की दाल सोयाबीन की दाल खेसरी खेसारी की दाल कोई भी दाल एक किलो उसका आटा चार चीजें हो गई गोबर गोमूत्र गुड़ दाल का आटा और इसमें डालनी है एक मुट्ठी मिट्टी एक मुट्ठी में आधा किलो या पौन किलो तक मिट्टी आती है मिट्टी कहां से लानी है आपके खेत के आसपास अगर पीपल का कोई पेड़ है बरगद का कोई पेड़ है तो उसके नीचे से खोद लो मिट्टी पीपल के पेड़ के नीचे की या बरगद के पेड़ के नीचे की पीपल और बरगद के पेड़ के नीचे की ही मिट्टी क्यों खोदना आपको मालूम है पीपल और बरगद के पेड़ हर समय ऑक्सीजन देने वाले पेड़ हैं और ज्यादा ऑक्सीजन देने वाले पेड़ के नीचे जीवाणुओं की संख्या बहुत होती है तो पीपल और बर्गत के पेड़ के मिट्टी में जीवाणु सबसे ज्यादा होते हैं यही जीवाणु खेत को चाहिए तो मिट्टी ले ली पांच चीजें हो गई गोबर 10 किलो मूत्र 10 लीटर गुड़ लगभग 1 किलो दाल का आटा 1 किलो और मिट्टी लगभग एक किलो यह पांचों चीजों मिला दो घोल दो हाथ से घोल लेना खराब नहीं होंगे हाथ नहीं तो डंडे से घोल देना एक ड्रम में घोल लेना प्लास्टिक की ड्रम में घोल लेना नहीं तो लोहे की ड्रम में घोल लेना प्लास्टिक का होगा तो अच्छा लोहे वाला क्षरण ज्यादा होता है अब इसको घोल के 15 दिन रख देना 15 दिन रख देना घोलने में तकलीफ आए तो थोड़ा पानी मिला देना ज्यादा मत मिलाना थोड़ा ही मिलाना घोल के 15 दिन रख देना 15 दिन के बाद यह खाद तैयार हो जाएगा इस खाद में क्या होगा करोड़ों करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु पैदा हो जाएंगे वह जो मिट्टी डाली ना मिट्टी के जीवाणु अगर 1 लाख हैं तो 15 दिन में वह 100 करोड़ से ज्यादा हो जाएंगे ढक के रख लो तो अच्छा है छाव में रखना सबसे अच्छा धूप में बिल्कुल मत रखना पेड़ के नीचे की छाव में रखना नहीं तो कोई ऐसी जगह रखना जहां सूर्य का प्रकाश ना आता हो और इस पर कपड़ा बांध दो ढक्कन लगा दो जैसे है ढक लो अब यह 15 दिन में तैयार हो गया इसमें करोड़ों जीवाणु तैयार हो गए अब यह जीवाणु घोल इसको जीवाणु घोल कहते हैं इसको खेत में डालना है डालने से पहले इसमें पानी मिलाना है और पानी कितना मिलाना है जितना गोबर था उसका 10 गुना पानी 10 गुना कम से कम 100 लीटर पानी 10 किलो गोबर तो 100 लीटर पानी और ज्यादा से ज्यादा पानी मिला सकते हैं तो 200 लीटर तो 100 से 200 लीटर पानी मिला लिया अब ये पूरा परफेक्ट गोल हो गया इसको एक एकड़ के खेत में छिड़कना है जैसे पानी छिड़क हैं ना मिट्टी दबाने के लिए ऐसे ही छिड़कना है बस आप इसको छिड़क देंगे तो यह करोड़ों जीवाणु मिट्टी में पहुंच जाएंगे तो मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या बढ़ती जाएगी और मिट्टी में सारा खेल खेलने का काम जीवाणु करते हैं आपको मालूम है जीवाणु क्या करते हैं जीवाणु सारा काम करते हैं पौधे की जड़ को नाइट्रोजन की जरूरत है तो यह जीवाणु उपलब्ध कराते हैं पौधे की जड़ को कैल्शियम चाहिए तो यह जीवाणु उपलब्ध कराते हैं पौधे की जड़ को आयरन चाहिए तो यह जीवाणु माने पौधे को बड़ा होने के लिए जितने भी सूक्ष्म पोषक तत्व चाहिए और फिर वह हमारे शरीर में वास्तव में चाहिए वो सब इन जीवाणुओं की करामात से ही मिलता है तो पौधे की जड़ को भरपूर सूक्ष्म पोषक तत्व मिलने लगेंगे पौधे की बढ़त बहुत तेज होगी और जिस पौधे की बढ़त अच्छी होगी उसका फल अच्छा होगा जिसका फल अच्छा होगा उसका उत्पादन अच्छा होगा अब इसमें समय लिख लो कितनी बार डालना कब डालना सबसे अच्छा तरीका यह होता है कि खेत को जब जोतने की तैयारी करें ना जोत बीज डालने से पहले खेत जुताई होती है ना खेत जुताई करते ही एक दिन डाल दो आज जुताई किया कल डाल दो जुताई करके डाल दो यह पहली बार ठीक है फिर इसके डालने के दो-तीन दिन बाद या चार दिन बाद या पाच दिन बाद बुआई कर दो कितना डाल सकते हैं बताए ना एक एकड़ में जितना तैयार हुआ 200 लीटर वो तो आपने इसको जोत के एक दो दिन में डाल दिया फिर बीज बो दो बीज बोने के 21वें दिन में फिर डाल देना आज बीज बोया तो ठीक 21 दिन बाद एक बार फिर डाल देना क्या होता है ना बीज में से अंकुरण होता है और अंकुरण होने के 21वें दिन तक वह मिट्टी की ताकत से बढ़ता है फिर 21 दिन के बाद वह सूर्य की ताकत से बढ़ना शुरू हो जाता है फोटोसिंथेसिस जिसको कहते हैं प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सूर्य ताप से खाना बनाना शुरू कर देता तो बढ़त तेज हो जाती तो और आप मोटी सी एक बात याद रखो कि हर 21वें दिन पर डाल देना आज डाला 21 दिन बाद डाला फिर 21 दिन बाद डाला फिर 21 दिन बाद डाला तो एक फसल अगर आप समझ लो चार महीने की है तो लगभग पांच बार डालना पड़ेगा कोई फसल छ महीने की है तो सात आठ बार डालना पड़ेगा आठ महीने की है तो 10 एक बार डालना पड़ेगा अब इसमें खर्चा क्या है जानवर अगर घर के हैं तो गोबर फोकट का मूत्र फोकट का गुड़ में कह रहा हूं सबसे सड़ा हुआ जिसको फेंक देते हैं वो भी फोकट में मिल जाएगा पानी तो फोकट का है ही थोड़ा दाल वाल लेना पड़ेगा तो उसका खर्चा आएगा लेकिन किसान अगर दाल पैदा करता है तो वह भी घर की हो जाएगी माने खाद बनाने का खर्चा लगभग शून्य आएगा मेहनत लगेगी पूंजी में पैसा कम से कम खर्च होगा और यह खाद जो तैयार होगी इसमें जबरदस्त क्वालिटी है क्योंकि इसमें कैल्शियम भरपूर आयरन भरपूर फास्फोरस भरपूर क्या-क्या इसमें है गोबर है गोबर में कैल्शियम है आयरन है सल्फर है सिलिकॉन है कोबाल्ट है मैग्नीशियम है मैगनीज है 18 सूक्ष्म पोषक तत्व है जो चाहिए मिट्टी को फिर गुड़ है गुड़ में जबरदस्त फास्फोरस है गुण में जबरदस्त कैल्शियम है फिर मूत्र में यह सब है तो जो सूक्ष्म पोषक तत्व हमें चाहिए वही मिट्टी को चाहिए वो सब इस खाद में भरपूर है यूरिया में नहीं है डीएपी में नहीं है यूरिया में कैल्शियम नहीं है डीएपी में कैल्शियम नहीं है और कैल्शियम सबसे प्रमुख आधार है मिट्टी के लिए क्योंकि खेत में कैल्शियम होगा तो पौधे में होगा पौधे में होगा तो फल में होगा फल में होगा तो भोजन में होगा भोजन में होगा तो शरीर में होगा शरीर में होगा तो हड्डियां मजबूत हड्डियां मजबूत तो शरीर मजबूत यह सारा साइकिल इसी कैल्शियम के उस पर तो यह तो गोबर की खाद से ही मिलेगा यूरिया डीएपी से मिलने ही वाला नहीं है तो किसान को यह समझाइए आप अब आपको समझ में आ गया हर 21 दिन में डालना है जबरदस्त फसल आएगी पहली जब आप डालोगे ना तो किसान थोड़ा झिझक करेगा उसको भरोसा नहीं है विश्वास नहीं है तो उसको कहना कि भाई तुम डालो नुकसान तुम्हारा नहीं होगा मैंने बहुत किसानों का हिसाब निकाला है खराब से खराब खेत में जब गोबर का खाट डालते हैं ना तो गेहूं का उत्पादन पहले साल की तुलना में थोड़ा ही कमा आता है लेकिन उत्पादन जितना कमाता उससे ज्यादा खर्चा बच जाता है तो वह बराबर मामला बैठता है हम यूरिया डीएपी में खर्चा करते हैं हजारों का तब उत्पादन लेते हैं यहां खर्चा ही नहीं है थोड़ा उत्पादन कम भी हुआ तो फायदा ही है नुकसान कुछ नहीं इसलिए किसी किसान का नुकसान नहीं और दो तीन साल लगातार आपने डाल दिया तो उत्पादन बढ़ना शुरू हो जाता है लगातार बढ़ता है और 10 12 साल में तो कई खेत ऐसे हैं जहां उत्पादन सीधे डबल हो जाता है 100% की बढ़ोत्तरी हो जाती है नहीं नहीं छानने की जरूरत नहीं ऐसे ही डालो उसमें जितना कचरा है सब खेत में जाने दो क्योंकि क में जीवाणुओं की संख्या और तेजी से बढ़ेगी छानने की जरूरत नहीं है अब आप डालोगे कैसे यह प्रश्न है तो उसके लिए चार विधि है पहली विधि यह है कि सीधे डब्बा लो और छिड़काव करो खेत पर भरो और छिड़क दो भरो और छिड़क दो अब कहोगे जी खेत बहुत बड़ा है यह तो नहीं चल सकता तो दूसरा तरीका बताता हूं खेत में पानी लगाते हैं ना पानी में डाल दो नाली में से पानी जा रहा है ना एक टंकी में भर के यह खाद रख दो उसमें नल लगा खोल दो टपक टपक पानी में गिरता रहेगा खेत में चला जाएगा यह दूसरा तरी तीसरा तरीका यह है कि अगर किसी के घर में जानवरों की संख्या ज्यादा है तो गोबर ज्यादा होगा उसके पास तो थोड़ा सा गोबर तो इसमें इस्तेमाल हुआ बचे हुए गोबर का क्या करेंगे तो बचा हुआ गोबर अगर सूखा है तो उसको इसी में डाल देना 15 दिन के बाद 200 लीटर पानी मिला केर तो वह गोबर भी गीला हो जाएगा गीले गोबर के लड्डू बना लो और लड्डुओं को खेत में फेंक दो तो खाद पहुंच जाएगा और एक तरीका है खेत में से मिट्टी खोद लो मिट्टी खोद लो मिट्टी में ये पूरा घोल मिला दो मिट्टी गीली हो गई मिट्टी के लड्डू बना लो लड्डुओं को खेत में फेंक दो तो खाद पहुंच जाएगा तो पानी के साथ दे सकते हैं छिड़क के डाल सकते हैं गोबर या मिट्टी को लड्डू बना के डाल सकते हैं और एक आखिरी तरीका है स्प्रे मशीन अगर अपने पास है तो उसका आगे से नोजल निकाल दो नोजल निकाल दो फिर उससे स्प्रे कर दो अब इसमें ध्यान यह रखना है कि यह फसल पर स्प्रे नहीं होगा यह जमीन पर होगा मिट्टी पर होगा फसल पर डालने से फायदा नहीं मिलेगा मिट्टी में डालना है इसको तो अगर फसल ऊंची है तब कैसे डालेंगे तब तो पानी लगाओगे तभी डालना सबसे अच्छा है इसमें एक तरीका यह है कि खेत का मुहाना होता है ना जहां से पानी घुसता है वहां एक आदमी को बिठा दो डब्बा लेकर पट पटकता रहेगा उसमें पानी के साथ जाता रहेगा और पानी के साथ पूरे खेत में बराबर मात्रा में जाता है और रिजल्ट उसका सबसे अच्छा आता है और एक तरीका है इसको डालने का अगर आपके घर में गोबर का वो बनाते हैं ना क्या कहते हैं उसको कंडा कहते हैं उपला कहते हैं क्या कहते हैं कंडा उपला जो भी कहते हैं उसको जलाते हैं जलाने के बाद राख निकलती है ना वो राख इकट्ठी कर लो और यह घोल और राख मिला दो और फिर लड्डू बन जाएंगे फिर खेत में छिड़क दो तो इसका तो जबरदस्त उत्पादन आता क्योंकि जो राख है ना इसमें कई केमिकल अतिरिक्त हैं जो गोबर और गोमूत्र से भी ज्यादा है तो यह तरीका समझ में आ गया हर 21 दिन पर डालेंगे चार महीने की फसल है तो पांच छह बार डालना पड़ेगा छ महीने हैं तो सात आठ बार इसी तरह से पूरी खेती होती रहेगी गोबर किसी भी जानवर का गाय का हो भैंस का हो बैल का हो बकरी बकरे का हो गधे घोड़े का हो हाथी ऊंट का हो कोई भी हो सब चलेगा मूत्र भी किसी जानवर का ठीक है और आधा आधा मिले तो वह भी चलेगा गाय का आधा ले लिया भैंस का आधा किसी के पास गाय नहीं हो किसी के पास भैंस नहीं हो एक एक गाय एक एक भैंस और खेत बड़ा है तो आधा आधा सब मिक्सिंग करके चलेगा बस एक ही सावधानी रखना कि जो जो गाय का गोबर लो तो वह देसी गाय हो तो अच्छा होगा जर्सी का फायदा पूरा नहीं करेगा और जर्सी का ही गोबर है तो उसमें देसी का मिला लेना नहीं तो कोई फायदा नहीं करेगा जरसी गाय है उसका गोबर है उसमें देसी गाय का एक दो किलो गोबर मिला लेना वह वैसे ही काम करता है जैसे 100 किलो दूध में एक चम्मच दही डालो तो पूरा दूध दही हो जाता है वैसे ही 100 किलो जर्सी गाय के गोवर में एक किलो देसी का डाल दो तो देसी गाय के जीवाणु अपनी संख्या अपने आप बढ़ा लेते हैं और धीरे-धीरे मेरी बात मानो तो जर्सी गाय बेचते जाना देसी लेते जाना क्योंकि यह जर्सी गाय के दूध में दम नहीं है आपको मालूम नहीं है दुनिया में भारत को छोड़कर जर्सी गाय का दूध कोई देश नहीं पीता डेनमार्क में सबसे ज्यादा जर्सी गाय है डेनमार्क वाले दूध ही नहीं पीते क्यों नहीं पीते कैंसर होने की संभावना है जर्सी गाय के दूध से घुटनों का दर्द तो तुरंत हो जाता है बड़ी बड़ी बीमारियां होती हैं और जर्सी गाय को एक खतरनाक बीमारी होती है मेड काउ डिसीज उस बीमारी के चक्कर में दूध भी उसका प्रदूषित होता है इसलिए जर्सी का दूध दुनिया में कोई नहीं पीता डेनमार्क की सरकार तो दूध ज्यादा होने पर समुद्र में फवा देती है आपको सुनकर हैरानी होगी डेनमार्क में दूध बहुत है चाय बिना दूध की पीते हैं सबके सब क्योंकि वह दूध उनको खराब लगता है तो जर्सी गाय बेच के देसी लेते जाना भैंस हो तो उसका तो चल जाएगा बैल का चल जाए अब एक आखिरी चीज और बता दूं उसको आप लिख लो यह तो हुआ खाद अब किसान का कीड़ा लग गया तो कीड़ा लग सकता है ना तो उसका भी एक फार्मूला लिख लो कीड़ा अगर लगता है कीट लगता है तो उसकी दवा भी हम खुद बनाकर छिड़क सकते हैं पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं कीड़ा मारने की दवा कैसे बनेगी 20 लीटर जानवरों का पेशाब ले लो गाय का बैल का भैंस का 20 लीटर ठीक है यह एक एकड़ के लिए बता रहा हूं फिर इसमें ढाई तीन किलो नीम के पत्ते की चटनी डाल देना नीम के पत्ते की चटनी नीम का पत्ता है पीस के चटनी बनाकर डाल देना ढाई तीन किलो और आकड़ा देखा है आकड़ा आकड़ा के पेड़ के पत्ते की भी चटनी डाल देना ढाई तीन किलो आकड़ा आख कहते हैं आख कुछ लोग अकौआ कह कहते उसको आक आकड़ा अकौआ हां वही जो हनुमान जी पर चढ़ाते हैं जिसमें सफेद सफेद दूध निकलता है और एक तीसरा पत्ता है सुनो सुनो भाई एक तीसरा पत्ता है बेशर्म बेशर्म जो है ना अक्सर गांव में घुसते हैं ना तो दोनों तरफ किनारे किनारे लगा रहता पान के जैसा प बैगनी रंग का फूल आता है उसमें ना खुशबू होती है ना कुछ होता है बिना पानी के बिना बीज के होता है इसलिए बेशर्म कहते हैं तो दो ढाई किलो ले लो और एक पत्ता है आपके गांव में अगर मिले तो सीताफल का पत्ता शरीफा जिसको कहते हैं सीताफल शरीफा उसका पत्ता दो ढाई किलो ले लो और अगर गांव में मिल जाए ना तो वो घास आती है ना कांग्रेस घास उसको चटनी बनाकर डाल दो दो ढाई किलो और इसमें थोड़ा सा खूब तीखी लाल मिर्च हो हरी मिर्च हो तो वह पीस के डाल दो 2 300 ग्राम लहसुन पीस के डाल दो आधा किलो के करीब गाजर घास वही वही और मैं आपको एक मोटी सी बात बताता हूं वो याद रखो जिन जिन पत्तों को गाय नहीं खाती फिर से सुनो जिन जिन पत्तों को गाय नहीं खाती और आपके गांव में उपलब्ध है वह सब पत्ते पीस के डाल दो इसमें गाय को खिला के देख लो खा रही है तो नहीं डालना नहीं खा रही है तो पीस के डाल देना मोटी बात याद रखो तो तीन चार तरह के पत्ते डाल दिए थोड़ा लहसुन डाल दिया थोड़ा मिर्ची डाल दी 20 लीटर मूत्र में डाल के इसको उबालना है गर्म करना उबाल के ठंडा कर लो ठंडा करके 200 लीटर पानी मिला दो अब ये दवा तैयार हो गई कीटनाशक इसको स्प्रे कर दो किसी भी फसल पर तो 48 घंटे माने दो से तीन दिन में सारे कीट खत्म कर देता है एक पैसे का खर्चा नहीं होता बाजार से कुछ नहीं लाना पड़ता यह हर फसल में काम आता है गेहूं में चावल में चने में दाल में मटर में गन्ने में हर तरह की फसल में यह उपयोग हो सकता है तो कीटनाशक दवा बनाने का आपको मालूम खाद बनाने का आपको मालूम अब यूरिया डीएपी और एंडोसल्फान गांव गांव से हमें बंद कराना है 480000 करोड़ रुपए किसानों का बचाना है 2 32000 करोड़ रुपए शहर वालों का ब बचाना है यह दोनों मिला दें तो करीब सात आ लाख करोड़ रुपए देश का हम बचा सकते हैं स्वदेशी आंदोलन की ताकत से और बाहर से जो इंपोर्ट हो रहा है करीब 7 लाख करोड़ का अगर पक्के स्वदेशी वाले लोग हो जाए तो इंपोर्टेड चीजें भी बंद हो सकती है 14 लाख करोड़ का फायदा माने इतना बड़ा फायदा हम पूरे देश को दे सकते हैं अपने स्वदेशी आंदोलन और अभियान से इसलिए स्वदेशी आंदोलन और अभियान को गांव-गांव जाकर चलाना है और आपको इसके लिए उस जमाने में लोकमान्य तिलक ने जैसा परिश्रम किया महात्मा गांधी ने जैसा परिश्रम किया विपिन चंद्रपाल ने जैसा परिश्रम किया और क्रांतिवीर ने जैसे परिश्रम किया वैसा ही परिश्रम आपको करना है ताकि क्या होगा जैसे आज हम लोकमान्य तिलक का नाम याद रखते हैं अपने देश के लिए अपनी सभ्यता के लिए अपनी आजादी के लिए वैसे ही आपका नाम आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी इस देश के दूसरे स्वदेशी आंदोलन के लिए ऐसा कहकर मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं बहुत-बहुत आपको धन्यवाद देता हूं 
Rajiv Dixit Lecture
Rajiv Dixit 
pallavi priya prakashan
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