Rajiv Dixit Lecture 25 June 2009


आजाद भारत में भी हमारी सारी व्यवस्थाओं में हमारी सारी नीतियों में हमारे पूरे दर्शन में यदि हमें गुलामी की निशानियां दिखाई देती हैं हम चौराहों को देखें सड़को को देखे भवनों को देखें सब जगह हमारी भूषा को देखें भीज को देखें भूमि को देखें तो चारों तरफ गुलामी की निशानियां यदि हमें दिखाई दे तो उससे हमारे भीतर एक आत्म गलानी का भाव पैदा होता है मुझे लगता है अब आजाद भारत में य गुलामी की सारी निशानियां मिटने चाहिए कोई भी आजाद देश अपनी गुलामी की निशानियां को संजो के नहीं रखता है अपितु उन गुलामी के उन जुल्म की निशानियां को मिटाने के लिए पूरी ताकत अपनी झोंक देता है तो हमें एक ऐसा भारत बनाना है जहां पर हम इन गुलामिया से बाहर निकल कर के आत्म ग्लाने से बाहर निकल कर के और इस आधी अधूरी आजादी से बाहर निकल कर के पूर्ण स्वतंत्रता पूरी आजादी और पूरी स्वाभिमान के साथ हम जी पाए यह आधी अधूरी आजादी हमें बहुत जगह कच उठती है काटती है अंदर से अंदर तक हमें दर्द देती है दुख देती है तो पूर्ण स्वतंत्रता पूर्ण आजादी हमको पानी है और आज एक संकल्प लेना है कि इन गुलामी की निशानियां को हमको मिटाना है तो इन्हीं भारत में फैले इन गुलामी की निशानियां इन जुल्म की निशानियां को हमें पहले पहचानना है जब हमें पता ही नहीं होगा कि हमारे आसपास में कौन कौन से ऐसी जुल्म की निशानिया कौन से ऐसी गुलामी की निशानिया कौन से ऐसे वो प्रतीक है कौन से ऐसे व नाम है कौन से ऐसे स्थान है जहां हमारी जो है आजादी कहीं जहां हमारा स्वाभिमान जहा हमारी स्वतंत्रता कहीं जो है व मिटती हुई दिखती है तो हम पहले उनको पहचानेंगे और बाद में उन गुलामी की निशानियां को अवश्य मिटाए भाई राजीव जी को आमंत्रित करता हूं इस उद्बोधन के लिए [प्रशंसा] परम पूजनीय स्वामी जी भारत स्वाभिमान के सभी नौजवान साथियों आज का जो विषय है वह भारत में गुलामी की निशानियां यह विषय स्वामी जी द्वारा निर्देशित है इस विषय पर मैं आपके सामने कुछ सूचनाएं कुछ तथ्य कुछ जानकारियां रखने की कोशिश करूंगा और आप सब से इस बात के लिए निवेदन करूंगा कि इस विषय पर लगातार आप चिंतन करें मनन करें और आज नहीं तो कल भारत स्वाभिमान की तरफ से कोई ऐसा कार्य करें कि यह गुलामी की निशानियां हमेशा के लिए मिट जाए कारण उसका बहुत साफ है कि दुनिया में कोई भी देश कभी भी अपनी गुलामी की निशानियां को सजो करर नहीं रखता बहुत सारे देश अनेक अनेक समय पर अनेक अनेक दूसरे देशों के गुलाम हुए हैं लेकिन जैसे ही वह देश आजाद हुए हैं उन्होंने सबसे पहले अपनी गुलामी की निशानियां को मिटाया है दुनिया में 50 से ज्यादा देश हैं जो अलग-अलग समय पर अंग्रेजों के गुलाम हुए और दुनिया में 50 से ज्यादा दूसरे देश हैं जो अंग्रेजों के अलावा दूसरे देशों के गुलाम हुए जैसे फ्रांस के गुलाम हुए जर्मनी के गुलाम हुए पुर्तगाल के गुलाम हुए स्पेन के गुलाम हुए तो यूरोप में एक तो इंग्लैंड है ब्रिटेन है उसकी गुलामी में दुनिया के 50 देश रहे हैं और इसके अलावा दूसरे 50 देश हैं जो जर्मनी फ्रांस स्पेन पुर्तगाल जैसे देशों की गुलामी में रहे हैं और अलग-अलग देशों की गुलामी अलग-अलग समय तक चली है अफ्रीका 450 साल तक गुलाम रहा है अंग्रेजों का इसी तरह से अफ्रीका के जो पड़ोसी देश हैं वह अंग्रेजों के 450 साल तक गुलाम रहे हैं कुछ एक देश 500 साल तक भी गुलाम रहे हैं इंग्लैंड के भारत लगभग 250 वर्षों तक गुलाम रहा इंग्लैंड का इसी तरह से स्पेन पुर्तगाल जर्मनी और फ्रांस की गुलामी में कोई देश 100 साल रहा कोई 150 साल रहा अल्जीरिया नाम का एक छोटा सा देश है वह फ्रांस की गुलामी में 350 साल रहा तो ऐसे अलग-अलग देशों ने अलग-अलग समय पर मिश्र नाम का एक देश है वह अंग्रेजों की गुलामी में सैकड़ों साल तक रहा है तो अलग-अलग देश अलग-अलग समय पर अंग्रेजों की गुलामी में दूसरे देशों की गुलामी में है पिछले 1000 साल का दुनिया का इतिहास आप पढ़ेंगे तो उनमें ऐसी ही बातें दिखाई देती हैं इस देश ने उसको गुलाम बनाया उसने उसको गुलाम बनाया यह यूरोप में सबसे ज्यादा रहा है अमेरिका खुद लगभग 250 साल तक इंग्लैंड का गुलाम रहा है इंग्लैंड के पहले स्पेन का गुलाम रहा है अमेरिका तो हर समय अलग-अलग देश अलग-अलग समय पर दूसरों के गुलाम होते रहे हैं लेकिन आजादी मिलने के बाद उन देशों ने सबसे पहला जो काम किया है अपनी गुलामी की निशानियां को मिटाने का किया है यही उनके आजाद होने का सबसे बड़ा सबूत होता है उनके स्वतंत्र होने का सबूत होता है जब आप स्वतंत्र हो हो गए आजाद हो गए तो आपका सबूत क्या है तो आपने गुलामी की सारी निशानियां मिटा दी मन से भी मिटा दी तन से भी मिटा दी वतन से भी मिटा दी तब जाकर हम मानते हैं कि हां हम स्वतंत्र हो गए आजाद हो गए सभी देश ऐसा करते रहे हैं मैं एक देश की छोटी सी बात बताऊं आपको इजिप्ट नाम का एक बहुत छोटा सा देश है जिसको मिश्र कहते हैं उसका असली नाम मिश्र है इजिप्ट नाम अंग्रेजों ने रखा क्योंकि अंग्रेजों को मिश्र का प्रोनंसिएशन नहीं आता था इसलिए उसका नाम बदल के उन्होंने मि इजिप्ट कर दिया मिश्र देश जब गुलाम हुआ अंग्रेजों का काफी लंबे समय तक तो मिश्र की भाषा बदल गई भूषा बदल गई भोजन बदल गया भेषज बदल गया सब बदल गया जैसे ही मिश्र आजाद हुआ तो आजादी के बाद सबसे पहला राष्ट्रपति वहां पर बना उनका नाम था कमाल पाशा जानते हैं उन्होंने सबसे पहला जो संवैधानिक कार्य किया अपने देश में वो यह कि अंग्रेजी भाषा को पूरे देश में से जड़ मूल से खत्म कर दिया उन्होंने पूरे देश में से जड़ मूल से खत्म कर दिया अंग्रेजी भाषा को और पूरी की पूरे मिश्र की अपनी जो मूल भाषा थी जो बहुत पुराने समय पर लोगों को मालूम थी और लोग भूल गए थे उसकी लिपि भूल गए थे भाषा के शब्द भूल गए थे भाषा का संस्कार चला गया था अपनी शैली भूल गए थे क्योंकि ज्यादा समय तक अंग्रेजी में डूबे रहे वह सारी की सारी पुरानी शैली को पुरानी भाषा को पुराने प्रोनंसिएशन को उच्चारण को सारा कुछ कमाल पाषा ने वापस लाया और आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि बहुत छोटा देश है मिश्र उस छोटे से देश पर इतना दबाव था आजादी के बाद उनको अपनी भाषा नहीं लानी चाहिए अंग्रेजी में ही काम चलाना चाहिए तो कमाल पाशा अक्सर यह कहा करते थे कि गुलाम देशों गुलाम देश में हम अंग्रेजी बोलते थे तब हमारी मजबूरी थी आजाद देश में हम अंग्रेजी बोले यह शर्मनाक है यह अफसोस की बात इसलिए हम आजाद देश में अपनी भाषा बोलेंगे और उन्होंने अपनी भाषा को लाया यह मैंने आपको मिश्र की एक छोटी सी बात बताई ऐसे ही जर्मनी में फ्रांस में आप कभी भी जाकर देखेंगे अपनी भाषा का गर्व इतना जबरदस्त है उन लोगों को एक समय में अंग्रेजों का फ्रांसी सियों से बहुत झगड़ा हुआ है अगर आप 1000 साल पुराना विश्व का इतिहास पढ़ेंगे तो 10वीं शताब्दी में करीब 300 साल तक अंग्रेज और फ्रांस एक दूसरे के दुश्मन नंबर एक रहे हैं जानी दुश्मन रहे कभी अंग्रेजों ने फ्रांसी सियों का नुकसान कर दिया कभी फ्रांसी सियों ने अंग्रेजों का नुकसान कर दिया एक बार फ्रांसीसी मजबूत हो गए तो अंग्रेजों पर कब्जा कर लिया फ्रांस का एक क्षेत्र है उसको नौर मादी कहते हैं तो वहां की एक जाति समूह के लोग चढ़ बैठे इंग्लैंड के ऊपर और कब्जा कर लिया पूरे इंग्लैंड पर और कभी करीब 150 पने साल नॉर्मन लोगों का कब्जा इंग्लैंड पे रहा फिर फ्रांस की दूसरी जातियों ने भी कब्जा किया यह झगड़े बाद में उल्टे हो गए इंग्लैंड ने कभी फ्रांस पर हमला कर दिया इसमें दोनों की दुश्मनी रही है और इस दुश्मनी में सबसे पहले उन्होंने अगर किसी बात को ध्यान दिया है तो अपनी भाषा को ध्यान दिया है जब अंग्रेजों का प्रभुत्व फ्रांस पर हुआ तो अंग्रेजी आ गई वहां पर लेकिन जैसे ही फ्रांस ने वापस विजय प्राप्त की अंग्रेजी को जड़ मूल से खत्म कर दिया आप फ्रांस में चले जाएंगे सिर्फ फ्रेंच और फ्रेंच और फ्रेंच ही बोली जाती है फ्रेंच और फ्रेंच और फ्रेंच ही पढ़ाई जाती है कोई अंग्रेजी के शब्द नहीं कोई आती है अंग्रेजी फिर भी नहीं बोलती हां अंग्रेजी का एक शब्द कोई आपसे बात नहीं करेगा अंग्रेजी का एक वाक्य कोई नहीं बोलेगा अगर आप फ्रांस के किसी हवाई अड्डे पर उतर जाएं पैरिस में उतर जाएं कहीं भी उतर जाएं तो टैक्सी वाले को अगर आपने अंग्रेजी में गलती से बोल दिया वह कभी भी लेकर नहीं जाएगा आपको झक मारकर आप कितना भी पैसा दे दीजिए उसको और टूटी फूटी फ्रेंच में आपने कुछ अगर बोल दिया तो हो सकता है पूरे पेरिस में मुफत की यात्रा वह आप को करा दे वह कभी आपसे पैसे भी नहीं मांगे भाषा का इतना गौरव है उनको और पता है फ्रांसी सियों ने क्या किया चुन चुनकर डिक्शनरी में से ऐसे सारे शब्द निकाल दिए जो अंग्रेजी भाषा से कभी गलती से फ्रेंच में आ गए थे क्योंकि आप जानते हैं जब भी कोई देश गुलाम होता है तो उसके कब्जे से सब चीजें चली जाती हैं अभी एक चीज को आप हमेशा याद रखिएगा जिस देश की आजादी चली जाती है उस देश का सब कुछ चला जाता है तो आजादी गई तो भाषा चली जाती है तो फ्रांस में भी ऐसा कभी हो गया उन्होंने चुनचुन के एक-एक अंग्रेजी का शब्द निकाल दिया अपनी डिक्शनरी से अपने परंपरा में से अपनी मान्यता में से अपने रोज के जीवन में से सारा उन्होंने अंग्रेजी निकाल दिया है इसी तरह जर्मनी का है आप जानते हैं जर्मनी और इंग्लैंड एक दूसरे के जानी दुश्मन रहे हैं जैसे फ्रांस और इंग्लैंड का एक दूसरे से झगड़ा रहा वैसे ही जर्मनी का इंग्लैंड से काफी झगड़ा रहा है और दूसरा विश्व युद्ध तो इसी झगड़े के कारण हुआ आपने अगर सेकंड वर्ल्ड वॉर की हिस्ट्री पढ़ी होगी तो जर्मनी का हिटलर और यह इंग्लैंड का क्लेमेंट आर एटली और विंस्टन चर्चिल दो बड़े नेता उस जमाने के इनके आपसी अहंकार के टक्कर में दो दो युद्ध हो गए दूसरा विश्व युद्ध हो गया और उस दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में एक ही बात हुई क्योंकि इंग्लैंड ने जर्मन का काफी नुकसान किया बाद में जर्मनी ने भी काफी नुकसान इंग्लैंड का कर दिया लेकिन जर्मन लोगों ने कसम खाई कि उनके देश में से इंग्लैंड की गुलामी की कोई भी निशानी वह रहने नहीं देंगे तो जर्मन भाषा में से अंग्रेजी का एक-एक शब्द उन्होंने निकाल के फेंक दिया जर्मनी की मान्यता और परंपरा में गलती से कोई अंग्रेजी मुहावरा आ गया उस मुहावरे को उन्होंने निकाल के फेंक दिया और बहुत सारी भाषा में उन्होंने परिवर्तन लाया ऊपर से नीचे तक यह सभी देशों में होता रहा है लेकिन दुर्भाग्य हम अपने देश की बात करना चाहते हैं वो यह कि भारत इंग्लैंड का गुलाम हो गया 250 साल तक हम लगभग उनकी गुलामी में रहे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी रही बाद में अंग्रेज सरकार की गुलामी आ गई ब्रिटिश पार्लियामेंट की गुलामी हमारे ऊपर आ गई और अंग्रेजी यहां अंग्रेजों के कारण आई यह भी आप जानते हैं अंग्रेजी भारत की मूल भाषा नहीं है तो अंग्रेज जिस भाषा को लेकर आए थे और जिस भाषा में वह राजका चलाते थे जिस भाषा में भारत के लोगों के ऊपर अत्याचार किया जाता था जिस भाषा की मदद से भारत के लोगों को लूटमार किया जाता था जिस भाषा की मदद से भारत के लोगों को मूर्ख बनाया जाता था जिस भाषा की मदद से भारत के राज्य छीने गए थे उस भाषा को आजादी मिलने के बाद तत्काल हटा देने की जरूरत थी लेकिन हमने जर्मनी जैसा साहस नहीं दिखाया फ्रांस जैसा साहस नहीं दिखाया मिश्र जैसा साहस नहीं दिखाया छोटे-छोटे देशों ने जिस तरह का साहस दिखाकर अपनी मातृभाषा को राष्ट्र भाषा बनाया हम वैसा साहस नहीं दिखा सके और आजादी के बाद भी इस अंग्रेजी को लगातार हम ढोते चले आ रहे हैं सवेरे आपसे परम पूजनीय स्वामी जी बात कर रहे थे कि हमारे संविधान में यह तय हुआ था कि आजादी मिलने के बाद 15 वर्ष के अंदर भारत की भाषा बदल जाएगी संविधान में लिखा गया और संविधान में लिखने वाले कोई साधारण पुरुष नहीं थे इस देश के बड़े-बड़े नेताओं ने संविधान लिखा है बाबा साहब अंबेडकर संविधान सभा की जो ड्राफ्टिंग कमेटी थी उसके चेयरमैन थे डॉक राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे सच्चिदानंद सिन्हा संविधान सभा के बहुत बड़े नेताओं में से हुआ करते थे अनुग्रह नारायण सिन्हा संविधान के बहुत बड़े नेताओं में गिनती होती थी सरदार वल्लभ भाई पटेल संविधान सभा के सर्वोच्च पद पर बिठाया विराजमान हुआ करते थे ऐसे 319 बड़े नेताओं ने हिंदुस्तान का संविधान लिखा और वह सारे के सारे बड़े नेता इस देश के मूर्धन्य लोग थे विद्वान लोग थे चोटी के लोग थे समाज के लोगों ने उनको संविधान सभा के लिए चुनकर भेजा था आपको मालूम है हमारे देश के यह 319 नेता को भारत के लोगों ने चुनकर संविधान सभा में भेजा था और यह देश के उस समय के सबसे बड़े नेताओं में गिनती होती थी इन्होंने लगातार चिंतन किया मनन किया और आपस में बहस की है और बहस करके यह तय किया कि जल्दी से जल्दी हमें अंग्रेजी से छुटकारा पा लेना चाहिए तो संविधान सभा में यह बात हुई एक दल के नेता ऐसे थे संविधान सभा में जो यह कहा करते थे कि अंग्रेजी से तो हमें आज ही छुटकारा पा लेना चाहिए क्योंकि यह गुलामी की भाषा है हमारी नहीं है लेकिन दूसरे दल के ऐसे नेता थे वो यह कहा करते थे कि धीरे-धीरे छुटकारा पा लेना चाहिए आपको मालूम है भारत की आजादी के इतिहास में हमेशा दो तरह के नेता रहे हैं एक नरम दल एक गर्म दल गर्म दल वाले नेता हमेशा से सरदार वल्लभ भाई पटेल जो थे वह गर्म दल के नेता थे संविधान सभा में वो हमेशा यह कहा करते थे आज और अभी कल क्यों हमें गुलामी की कोई निशानी रखनी क्यों है आज और अभी तय करना है और कल से जब संविधान लागू होगा तो अंग्रेजी को समाप्त कर देना है हमारी मातृभाषा हिंदी गुजराती तमिल तेलुगु कन्नड़ मलयालम आदि में हमें हमारा काम चलाना है लेकिन दूसरे नरम दल के नेता थे वह कहा करते थे नहीं नहीं इतनी जल्दी मत करो हमें इसमें जल्दबाजी करने की कोई जरूरत नहीं है धीरे-धीरे करके अंग्रेजी हट जाएगी दुर्भाग्य से उस समय क्या हुआ संविधान सभा में भी नरम दल वाले नेताओं की थोड़ा बहुमत हो गया गर्म दल वाले नेताओं का अल्पमत रह गया तो बीच का रास्ता निकाला गया गर्म दल वाले कहते थे तुरंत अंग्रेजी हटाओ नरम दल वाले कहते थे धीरे-धीरे हटाओ तो बीच का रास्ता निकाला गया कि चलो ठीक है 15 साल एक समय तय कर लेते हैं 15 साल में हम अंग्रेजी को पूरी तरह से विदा कर देंगे यह तय हो गया लिख गया जब तय हो गया और लिख गया और संविधान की सभा का प्रस्ताव बन गया और उसके बाद वह दस्तावेज बन गया तो उसके बाद आजादी के 62 साल होने को आए हैं अभी भी अंग्रेजी को क्यों नहीं हटाया गया क्यों नहीं उसको विदा किया गया जिस तरह से हमने अंग्रेजों को भगाया था अंग्रेजी को ऐसे ही भगाया जाना चाहिए था लेकिन वह नहीं हो पाया यह बहुत शर्म की बात है बहुत अफसोस की बात है और जिन लोगों ने अंग्रेजी को हटने नहीं दिया इस देश में से उन लोग ों के तर्क क्या है कुतर्क क्या है वह हमें जानना चाहिए क्योंकि जब आप समाज में जाएंगे और आप यह बात करेंगे ना कि हमारा भारत स्वाभिमान का संविधान क्या है हमारे भारत स्वाभिमान की नीतियां क्या है तो सबसे पहली और प्रमुख नीतियों में से एक है भाषा की नीति हमारी हम यह चाहते हैं कि भारत के सारे विद्यार्थियों को सभी तरह की उच्च शिक्षा मातृभाषा में ही उपलब्ध होनी चाहिए हमारे भारत के सभी न्यायालयों में उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय में जिलान न्यायालय में तहसील न्यायालय में हर व्यक्ति को न्याय की उम्मीद उसकी मातृभाषा में ही होनी चाहिए और न्याय का निष्पादन भी उसकी मातृभाषा में होना चाहिए न्याय हिंदी में मिले तमिल में मिले तेलुगु में मिले मलयालम में मिले और न्याय करने वाले तमिल तेलुगु मलयालम हिंदी आदि का उपयोग करें न्याय करवाने वाले इनका उपयोग करें यह हमारे भारत स्वाभिमान की बहुत स्पष्ट नीति है जब आप इस नीति को लेकर लोगों के बीच में जाएंगे तो यह बातें आपको ध्यान रखनी है लोग आपसे कुतर्क करेंगे और वह कुतर्क हैं उन लोगों के जिन्होंने अंग्रेजी को हटने नहीं दिया इस देश में से संविधान सभा में अंग्रेजी का सबसे ज्यादा समर्थन अगर किसी ने किया तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने पूरे समय इस बात की वकालत करते रहे कि अंग्रेजी अगर हम नहीं जानेंगे तो विकास नहीं कर सकते अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो आगे नहीं बढ़ सकते अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो हमको विज्ञान और तकनीकी नहीं आ सकती अ अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो हम में वैज्ञानिकता नहीं आ सकती अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो हम पोंगा पंडित रहेंगे अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो हम प्रगतिशील नहीं बनेंगे बी सियों तरह के कुतर्क वो दिया करते थे सबसे बड़ा उनका कुतर्क था कि अंग्रेजी विश्व भाषा है मैं आपको जानकारी के लिए कहना चाहता हूं आप खुद इस बात को कोशिश करिए वेरीफाई करने की प्रमाणित करने की दुनिया में 200 देश है उनमें से सात देश की राष्ट्र भाषा अंग्रेजी और सात और देशों में बोलने की भाषा अंग्रेजी कुल मिलाकर 14 अब 200 देशों में से सिर्फ 14 देशों में अंग्रेजी अगर बोली जा रही है तो कितने प्रतिशत देशों में अंग्रेजी बोली जा रही है 10 प्र भी नहीं हुआ 10 प्र भी गिने गे तो 20 देश हो जाते हैं 7 7 प्र अब 7 प्र देशों में अंग्रेजी भाषा के रूप में इस्तेमाल हो रही है बाकी 933 प्र देशों में अंग्रेजी का कोई नाम लेवा नहीं है उसके गाने गाने वाला कोई नहीं है उसकी बात करने वाला कोई नहीं है तो विश्व भाषा कैसे हो गई बताइए विश्व भाषा तो यह तब होगी जब 50 प्र से ज्यादा लोग अंग्रेजी में बोले अंग्रेजी में रोए अंग्रेजी में गाएं अंग्रेजी में सोचे अंग्रेजी में सब काम करें रोना गाना हंसना बोलना चलना फिरना सब उनका अंग्रेजी में हो 50 प्र से ज्यादा दुनिया के देश के लोगों का तब तो हम मानेंगे कि हां यह विश्व भाषा होने लायक है 7 प्र लोग दुनिया में अंग्रेजी बोलते हैं गाते हैं पढ़ते हैं पढ़ाते हैं उस पर विश्व भाषा कैसे हो सकती है बाकी सभी देशों की अपनी भाषाएं हैं अगर जनसंख्या के हिसाब से भाषा को गिनती करना शुरू करें ना जनसंख्या के हिसाब से दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा चाइनीज है वह नंबर एक है और फिर सीधे नंबर आता है हिंदी है वो नंबर दो पर है दुनिया में जनसंख्या के हिसाब से चीन इस समय सबसे आगे है लगभग 148 करोड़ की जनसंख्या है तो दुनिया में लगभग 148 करोड़ लोग हिंदी सॉरी चीनी बोलते हैं चीनी जानते हैं चीनी समझते हैं और चीनी का व्यवहार करते हैं उसके बाद दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा जो भाषा का व्यवहार होता है जिसको लोग जानते हैं समझते हैं बात करते हैं वह हिंदी है हिंदी को जानने वाले समझने वाले लोगों की संख्या कम से कम 100 करोड़ के आसपास है पूरी दुनिया में हिंदी को जानने और समझने वाले और हिंदी को बोलने वालों की संख्या इस देश में इस देश में और दुनिया में 87 करोड़ है सीधे चीनी भाषा के बाद दूसरे नंबर पर जो भाषा आती है वह हिंदी आती है जब दुनिया में दूसरे नंबर पर हिंदी है लेकिन अपने देश में पहले नंबर पर तो होनी चाहिए वह नहीं हो पाई आज तक पहले नंबर पर इस देश में अभी भी अंग्रेजी का राज है अंग्रेजी महारानी की तरह से है और हिंदी उसकी दासी की तरह से इस देश में व्यवहार में लाई जाती है बहुत शर्म की बात है बहुत अफसोस की बात है दुनिया में यह कुतर्क फैलाया गया कि अंग्रेजी बहुत वैज्ञानिक है आपने अगर थोड़ी भी अंग्रेजी पढ़ी होगी तो एक दो सवाल आपसे कर लेता हूं पीटी पुट तो ब्यूटी बुट यही होना चाहिए और अगर ब्यूटी बट तो प्यूटी पट होना चाहिए होना चाहिए कि नहीं ब्यूटी बट है तो प्यूटी पट होना चाहिए बयूटी पुट है तो ब्यूटी बुट होना चाहिए क्या वैज्ञानिकता है एक जगह बट है एक जगह पुट है या एक जगह पुट है दूसरी जगह बट है प्रोनंसिएशन उच्चारण तो एक ही होना चाहिए ना वैज्ञानिक भाषा में तो एक ही होना चाहिए एक और उदाहरण देता हूं केमिस्ट्री क्या स्पेलिंग है सी एच ई एम आई एस टी आर वाई केमिस्ट्री बोलते हैं ना तो केमिस्ट्री बोलते हैं तो केमिस्ट्री के हिसाब से कोपड़ होना चाहिए सीओ पीए आर एक जाति होती है ना चोपड़ा तो चोपड़ा को कोपड़ बोलना चाहिए बोलना चाहिए कि नहीं और अगर चोपड़ा को चोपड़ा बोल रहे हो तो केमिस्ट्री को केमिस्ट्री बोलना चाहिए सीएई एमई एसटी आर तो अगर वहां केमिस्ट्री नहीं होता तो यहां चोपड़ा कैसे हो गया और यहां चोपड़ा है तो वहां केमिस्ट्री कैसे हो गई किसी भी भाषा की वैज्ञानिक को अगर आप परखना चाहे तो उसमें बोलने के लिए जो शब्द का उच्चारण का महत्व है वह हर समय एक जैसा ही होता है वह समय समय पर बदलता नहीं है कभी सी का हो जाता है कभी सी सा हो जाता है सी के साथ ए लग गया तो कई बार का का उच्चारण देने लगता है सी के साथ आई लग गया ई लग गया तो वो सा का हो जाता है तो यह क्या चक्कर है भाई भाषा में इतने ज्यादा इसमें विसंगतियां है अगर अंग्रेजी की विसंगतियों पर मैं व्याख्यान करूं तो तीन घंटे यही विषय पर मैं आपसे बात कर सकता हूं आपका सिर्फ ध्यान आकर्षित कर रहा हूं कि विसंगतियां इतनी ज्यादा है अंग्रेजी में अंग्रेजी के जो बड़े विद्वान है वह भी उनका निराकरण नहीं कर पाते तो वैज्ञानिकता कैसी है और सबसे खराब बात है जो अंग्रेजी की वह यह है कि आप अंग्रेजी में सोच नहीं सकते चिंतन नहीं कर सकते अगर आपको सोचना पड़ेगा चिंतन करना पड़ेगा तो आपकी मातृभाषा में ही संभव है आप मूल भाषा मातृभाषा में ही चिंतन कर सकते हैं उसी में सोच सकते हैं उसी में विचार कर सकते आप अपने घर में व्यवहार करते हैं तो मातृभाषा में ही कर सकते हैं घर के लोगों से हंसी मजाक करते हैं तो मातृभाषा में ही कर सकते हैं अगर आप बहुत दुखी हो जाएं और आप अवसाद की स्थिति में चले जाए तो भी मातृभाषा में ही शब्द आपके मुंह से निकलेंगे हे राम हाय राम क्या कर दिया हे गॉड नहीं निकलेगा ओ गॉड नहीं निकलेगा क्योंकि भाषा आपके खून में घुसी हुई है संस्कार में पूरी तरह से बसी हुई है रची हुई है तो आप जिस भाषा में रोएंगे गाएंगे जिस भाषा में हसेंगे हसाएंगे जिस भाषा में बात करेंगे व्यवहार करेंगे वो भाषा आपके लिए अनुकूल होगी और शब्दों का भंडार आपके पास पर्याप्त होगा लेकिन अंग्रेजी भाषा में चूंकि आप मूल काम कोई कर नहीं पाएंगे तो हर बार अंग्रेजी में आपको कुछ करना पड़ेगा तो भाषांतर करना पड़ेगा और भाषांतर करने में छह गुना ज्यादा समय खर्च होगा आप चाहे तो करके देख लीजिए आपको कोई एक वाक्य स्वामी जी कहे भारत स्वाभिमान की मूल नीति मातृ भाषा की नीति है मान लीजिए यह एक वाक्य आपको कहा गया अब आपको कहेंगे अंग्रेजी में बोलो तो जितनी देर आपको सोचने में लगेगी उससे छह गुने कम समय में आप हिंदी में पट से बोल देंगे उसको किसी छोटे बच्चे के साथ परी क्ण करके देख लो किसी छोटे बच्चे को कोई कहानी सुनाओ बहुत अच्छे से ध्यान से मातृभाषा में सुनेगा वही कहानी उसको अंग्रेजी में सुनाओ छ दिन लग जाएंगे तब तो ठीक से सुनने की स्थिति में आएगा और छ दिन लग जाएंगे तो याद करने की स्थिति में आएगा याद नहीं कर पाएगा तो रटे और रटने के बाद अगले छ दिन बाद कुछ बोल के सुनाएगा वह भी टूटी फूटी होगी बीच में उसमें व्याकरण की गलती होगी भाषा की अशुद्धियां होंगी क्यों संस्कार में नहीं है ना तो जिस भाषा में आप हर काम करके आसानी से सहजता के साथ बढ़ सकते हैं आगे उसी भाषा में अगर आपको शिक्षा नहीं मिल रही है तो यह आपके साथ बहुत बड़ा षड्यंत्र है बहुत बड़ी साजिश है यह षड्यंत्र क्या है भारत के मूल निवासी कौन है हिंदी तमिल तेलुगु कन्नड़ मलयालम उड़िया आदि आदि यह सब मूल निवासी हैं जो मूलत यहीं के हैं और अंग्रेजी भाषा को बोलने वाले यह मूल निवासी तो हैं लेकिन अंग्रेज में रचे बसे हुए हैं जन्म उनका गलती से भारत में हो गया है उनको तो मौका मिले तो वह तो अमेरिका जाने को तैयार बैठे हैं वीजा नहीं मिलता वरना लाइन लगा के खड़े रहते पता कौन लोग पैदा हो गए जो अंग्रेज हिंदुस्तान में मरे ना वय पैदा समझे आप स्वामी जी की बात सुनी आपने जो अंग्रेज मर गए उनकी आत्मा इनमें प्रवेश कर गई है जो अंग्रेजी बोलते हैं आज वो भूत बन के पैदा हुए मर गए ना हिंदुस्तान में और इनका ना संस्कार भारत का है ना इनकी मान्यता परंपरा भारत की है अंग्रेजी में सब काम करते हैं बोलते चालते हैं क्योंकि उनका प्रभुत्व बना रहे क्योंकि अंग्रेजी के आधार पर अंग्रेजों का प्रभुत्व था तो भारत के मूल नागरिक कभी सत्ता व्यवस्था में ना आ जाएं भारत के मूल नागरिक कभी व्यवस्था को संभालने की स्थिति में ना आ जाएं भारत के मूल नागरिक कभी इस देश को चलाने की स्थिति में ना आ जाए इसके लिए जानबूझकर अ अंग्रेजी को आजादी के 62 साल के बाद भी ढोया जा रहा है और मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं जो आप खुद महसूस कर सकते देख सकते हैं अंग्रेजी भाषा के जो स्कूल चलते हैं ना अलग-अलग जगह पब्लिक स्कूल चलते हैं कुछ कॉन्वेंट स्कूल चलते हैं मैंने बहुत बार करके देखा है उनका मूल ज्ञान बहुत ही कम है वहां के विद्यार्थियों का और जो हिंदी मातृभाषा के स्कूल चलते हैं ना या कन्नड़ तमिल तेलुगु उड़िया आदि के मूल स्कूल चलते हैं उनके बच्चों का मूल ज्ञान बहुत ज्यादा है मूल ज्ञान समझते हैं जो जिस पर आप सारी इमारत खड़ी करते हैं अपनी जिंदगी की वो मूल ज्ञान जो मातृभाषा के विद्यार्थी हैं उनका सबसे ऊंचा है और जो अंग्रेजी भाषा के विद्यार्थी हैं उनका सबसे नीचा है अगर आप मूल ज्ञान की स्थिति का अगर तुलनात्मक अध्ययन करेंगे तो मातृभाषा के विद्यार्थी गणित में बहुत ऊंचे हैं मातृभाषा के विद्यार्थी भौतिक शास्त्र में बहुत ऊंचे हैं मातृभाषा के विद्यार्थी रसायन शास्त्र में बहुत ऊंचे हैं मातृभाषा के विद्यार्थी समाजशास्त्र में बहुत ऊंचे हैं मातृभाषा के विद्यार्थी सिर्फ अंग्रेजी में कमजोर हैं इसलिए वह जिंदगी के हर क्षेत्र में कमजोर हो गए हैं और कहीं भी आगे बढ़ने के लिए उनके सारे रास्ते बंद हैं वह अंग्रेजी में फेल हो जाते हैं बाकी सभी विषयों में उनके 100 में से 999 नंबर आते हैं 100 में से 98 नंबर आते हैं 100 में से 95 नंबर आते हैं बाकी सभी विषयों में बस अंग्रेजी में उनके 100 में से 40 आते हैं या 45 आते हैं इस कारण से वो आईएएस नहीं बन पाते सिविल सर्विसेस में नहीं जा पाते वो आईपीएस नहीं बन पाते सिविल सर्विसेस में नहीं जा पाते वो आईसीएस आईएफएस नहीं बन पाते आईआरएस नहीं बन पाते ऑल इंडिया सर्विसेस में ऑल इंडिया कैडर में नहीं जा पाते कितना बड़ा उनके साथ अन्याय हो रहा है आप सोचिए मूल विषय का सारा ज्ञान उनको है बस एक भाषा का ज्ञान उनको नहीं है और वो भी ऐसी भाषा जो विदेशी भाषा उसमें उनको ज्ञान नहीं है तो उनको सबको पीछे रह जाना पड़ता है और जिनको सिर्फ विदेशी भाषा आती है और विषय का ज्ञान कुछ खास नहीं होता है वह सब उच्च पदों पर पहुंच जाते हैं और इसी कारण से देश की व्यवस्थाओं को ठीक तरह से चला नहीं पाते हैं और देश की सारी व्यवस्था को गुड़ गोबर करके और पूरे समाज का सत्यानाश और सर्वनाश कर देते हैं यह बहुत बड़ी बात है विदेश में रहने वाला ड्राइवर झाड़ू लगाने वाला लैटिन साफ करने वाला भी अंग्रेजी जानता है तो अंग्रेजी जानने से बड़ा नहीं हो जाता वो झाड़ू लगाता है वो लटन साफ करता है तो अंग्रेजी जिसको आती है हम मानते वह बहुत कुछ जानता है अरे विदेशों में रहने वाला ड्राइवर चपरासी लटन साफ करने वाला जूते पॉलिश करने वाला मालिश करने वाला सारे के सारे लोग अंग्रेजी बोलते हैं लेकिन ये एक बहुत बड़ा षड्यंत्र है कि ज भी राजीव भाई ने कहा कि भारत की सत्ता में भारत की शासन व्यवस्था में भारत की शिक्षा उच्च शिक्षा व्यवस्था में भारत के तकनीकी व्यवस्था में किसी को इंजीनियर आदि बनना हो आईआईटी करना हो तो अंग्रेजी नहीं आता है तो नहीं जाएगा उधर तकनीकी व्यवस्था में प्रबंध कीय व्यवस्था में किसी को भी एमबी आद करना हो और किसी बहुत मैनेजमेंट के बड़े-बड़े जो है चीजों को चलाना हो इन सारी उच्च व्यवस्थाओं में आम आदमी का प्रवेश ना हो माने गरीब मजदूर किसान के बच्चों का प्रवेश ना हो जो इस देश के आम नागरिक हैं उनका प्रवेश रोकने के लिए इन षड्यंत्रकारी लोग वहां पर फन फैलाए यह जहरीले नाग बैठे हुए हैं और इन सबके हमें फन नोचने हैं इनके फन तोड़ने हैं और इस देश के आम आदमी को इस इन जहरीले नागों के फन दबोच करके हमें आम आदमी को हक दिलाना यह बहुत बड़ी बात है इस देश के अंग्रेजी के कारण से 99 प्र लोगों के साथ में अन्याय हो रहा है और यह बात हमें इस देश के लोगों को समझाने है जैसे आपको अभी भाई राजीव जी बता रहे हैं इस तरह से इस देश के जब 100 करोड़ से ज्यादा 114 करोड़ भारतीयों को बताएंगे कि राष्ट्र भाषा हिंदी में और अन्य भारतीय भाषाओं में हम शिक्षण हमारा शासन हमारी न्याय व्यवस्था हमारी उच्च शिक्षा हमारे सारे काम हम भारतीय भाषाओं में करना चाहते हैं तो फिर इस देश के 114 करोड़ लोगों की आवाज को कोई दबा नहीं स काम अभी कितना दुख और अफसोस है हमें अपने देश में इस परिस्थिति पर कि मुझे न्याय चाहिए आपको न्याय चाहिए हमको किसी अदालत में जाना पड़े हाई कोर्ट में जाना पड़े सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़े तो मुझे मेरे न्याय की बात मेरी मातृभाषा में करने की अनुमति नहीं है वकील को सारी बात हम अपनी मातृभाषा में समझाएंगे फिर वकील उसको अंग्रेजी में भाषांतर करेगा फिर उसके आधार पर पिटीशन ड्राफ्ट होगी फिर वकील उसको अंग्रेजी में जज को समझाएगा फिर जज वकील के साथ अंग्रेजी में सब कुछ वार्तालाप करेगा उसके बाद फैसला आएगा वह अंग्रेजी में लिखा जाएगा न्याय पाने वाले को अंग्रेजी का कुछ आप ए बी सीडी नहीं आता लेकिन न्याय की पूरी पत्रिका उसको अंग्रेजी में दी जाएगी तो वह क्या करे उसको निचोड़े कि नहाए कि खाए कि बनाए क्या करें आग लगाए उसमें करे क्या उसको मालूम नहीं है अंग्रेजी का ए बी सीडी नहीं आता वह बेचारा सीधा साधा भोला भाला आदमी है और वह अदालत में जाकर उच्च न्यायालय में सर्वोच्च न्यायालय में अगर फरियाद करता है तो फरियाद हिंदी में ना सुनी जाकर अंग्रेजी में ही सुनी जाएगी और फैसला भी अंग्रेजी में दिया जाएगा इसका मतलब हमारी न्याय व्यवस्था साधारण आदमी को न्याय से वंचित रख रही है और उसको अन्याय की तरफ धकेल रही है और ऐसा अन्याय जब बार-बार बार-बार बार-बार बारबार किसी के ऊपर होगा तो फिर वह विद्रोही हो जाएगा और शासन व्यवस्था के खिलाफ वह विद्रोह करेगा तो किसी दिन हथियार उठाएगा नक्सली हो जाएगा आतंकवादी उग्रवादी हो जाएगा फिर हमारी शासन व्यवस्था चिल्लाएगी कि इतने सारे लोग नक्सली हो रहे हैं आतंकवादी उग्रवादी हो रहे हैं जब न्याय नहीं मिलता है किसी आदमी को और अन्याय बार-बार बारबार उसके ऊपर होता ही चला जाता है तब आदमी प्रवश होकर विवश होकर हथियार उठाने के लिए मजबूर हो जाता है हमारे देश में न्याय ना मिले हमें शिक्षा ना मिले हमारी बात ना सुनी जाए हमारी प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का अधिकार हमसे छीन लिया जाए आपको मालूम है कई प्रतियोगी परीक्षाएं ऐसी हैं जिसमें अंग्रेजी का प्रश्न पत्र पहले आपको पास करना ही पड़ेगा तभी आप आगे बढ़ पाएंगे अगर अंग्रेजी के प्रश्न पत्र में आप फेल हो गए और बाकी सब में आपके 100 में से 100 नंबर आ जाए तो आप बिल्कुल बेकार हैं इस व्यवस्था के लिए शासन के लिए माने विषय का ज्ञान आपको बहुत है भाषा का ज्ञान नहीं है इतने मात्र से आपको यह व्यवस्था नकार देती है तो ऐसी व्यवस्था को हमें नकारना पड़ेगा और उसके खिलाफ कोई बड़ा शंख फूंकना पड़ेगा विद्रोह करना पड़ेगा तो भारत स्वाभिमान की तरफ से भाषा के प्रश्न को हमको संवेदनशीलता के साथ और पूरी ताकत के साथ उठा कि आजादी के 15 साल के लिए अंग्रेजी आई थी संविधान में लिखा गया अब यह 62 साल से अंग्रेजी क्यों चल रही है और हम इसको अपने कंधे पर क्यों ढो रहे हैं य संविधान का जो अनुच्छेद 343 और 344 आप लोगों को बता सकते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 343 और 344 इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि संघ की भाषा राष्ट्र की भाषा हिंदी होगी और अन्य भारतीय भाषाओं में अलग-अलग प्रांतों में अन्य भारतीय भाषाओं में अपनी मातृभाषा में हमारे शासन हमारी शिक्षा हमारी न्याय व्यवस्था होगी लेकिन यह तो सीधा सधा संविधान का उल्लंघन है लेकिन अब यदि इसके हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में हमें रिट भी दायर करनी पड़े तो अंग्रेजी में करनी पड़ेगी क्यों कि सुप्रीम कोर्ट में और हाई कोर्ट में आप हिंदी में रिट नहीं कर सकते आप मने ये कितने बड़ा न्याय मने एक तरफ देश का संविधान को हम बड़ा माने या देश देश को बड़ा माने देशवासियों को बड़ा माने ये बहुत बड़ी विद्रूपता है तो संविधान के हमारे इंडियन कांस्टिट्यूशन के जो 343 भारतीय संविधान की और 344 धाराओं के अनुरूप यह हम कहीं असंवैधानिक बात नहीं कर रहे अवज्ञा निक बात नहीं कर रहे अभी भाई राजीव जी आपको तर्क देंगे उस विषय में भी कि यह अवज्ञा निक भाषा और दूसरा बोल रहे थे ना लोग बोते विकास होगा विज्ञान और तकनीकी की भाषा है बताओ जापान का विकास कम है पूरी दुनिया में पूरी दुनिया में सबसे अच्छी टेक्नोलॉजी अभी तक भी हमारे भारत में तो कम से कम जापान की मानते हैं और जापान का एक भी आदमी जान करके वहां के प्रधानमंत्री से लेकर के चपरासी तक एक भी आदमी अंग्रेजी में नहीं बात करता है खाली अपनी जापानीज में बात करते हैं तो हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं हो सकता तो यह बहुत बड़ा मुद्दा है और जो अभी राजीव भाई ने कहा ना कि कुछ जहरीले नाग बैठे इनके फन कुचली बना बात बनेगी नहीं कुछ चंडाल चौकड़ी बैठ गई है ऊपर वो चाहती है कि हमारे और हमारे बच्चों के अला क्योंकि उनके परिवारों में अंग्रेजी का माहौल है उनको कोशिश की जाती बारबार पढ़ाया जाता सिखाया जाता है कि हमारे और हमारे परिवार के बच्चों के अलावा इस देश के उच्च आसनों पर उच्च पदों पर उच्च व्यवस्थाओं में उच्च शिक्षा में तकनीकी में प्रबंधन में उद्योग में व्यापार में किसी का प्रवेश ना हो तो 99 प्र लोगों के साथ में बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है मैं आपको जापान के साथ ही एक दूसरा उदाहरण देता हूं जर्मनी का दुनिया की सारी तकनीकी में सर्वश्रेष्ठ तकनीकी मानी जाती है जर्मनी की फिर जापान की मैकेनिकल इंजीनियरिंग में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में टेक्सटाइल इंजीनियरिंग में जितनी भी इंजीनियरिंग के क्षेत्र हैं जहां से तकनीकी निकलती है प्रौद्योगिकी निकलती है बड़बड़ी मशीने बनाते हां सारी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ तकनीकी है जर्मनी की और फिर है जापान की लेकिन आपको मालूम है जर्मनी की मातृभाषा जर्मन है वहां के सारे विद्यार्थी पहली कक्षा से लेकर आखिरी कक्षा तक जर्मन में पढ़ते हैं इंजीनियरिंग जर्मन में करते हैं मैनेजमेंट की पढ़ाई जर्मन में होती है सारी प्रौद्योगिकी की पढ़ाई जर्मन में होती है मेडिकल की पढ़ाई जर्मन में होती है और जर्मनी सात करोड़ से कम आबादी का देश है मालूम है आबादी सा करोड़ से कम है अभी सात करोड़ भी पूरी नहीं है हमारे हिंदुस्तान में जर्मनी से बड़े कई राज्य हैं हमारा यह उत्तर प्रदेश जर्मनी से बड़ा है हमारा बिहार जर्मनी से बड़ा है बंगाल जर्मनी से बड़ा है आंध्र प्रदेश जर्मनी से बड़ा है महाराष्ट्र जर्मनी से बड़ा है भारत के तो 10 11 राज्य जर्मनी से बड़े हैं जर्मनी 7 करोड़ से कम का देश है और वहां अगर सारे इंजीनियरिंग की पढ़ाई जर्मन में हो सकती है 7 करोड़ की आबादी का देश अगर यह कर सकता है तो 115 करोड़ की आबादी का देश इंजीनियरिंग में पढ़ाई क्यों नहीं कर सकता और आप को मालूम है फ्रांस की आबादी तो जर्मनी से भी कम है 5 करोड़ 80 लाख की आबादी है इस समय और 5 करोड़ 80 लाख की आबादी का फ्रांस अपनी पूरी पढ़ाई फ्रेंच में कर सकता है इंजीनियरिंग की डॉक्टरी की मैनेजमेंट की सारी पढ़ाई वो फ्रेंच में कर सकते हैं तो हम 115 करोड़ वाले अपनी सारी की सारी पढ़ाई तमिल तेलुगु कन्नड़ मलयालम हिंदी में क्यों नहीं कर सकते ऐसे ही पुर्तगाल तो दो करोड़ की आबादी का देश है पुर्तगाल की आबादी तो और भी दो करोड़ है पुर्तगाल की पूरी शिक्षा व्यवस्था चलती है तो पोर्तुगीज में चलती है और पोर्तुगीज में शिक्षा लेकर वह इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट बन सकते हैं और उनके यहां नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक पैदा हो सकते हैं और सारी दुनिया में वह व्यापार कर रहे हैं पोर्तुगीज के आधार पर तो हम 115 करोड़ के लोग क्यों नहीं कर सकते दुनिया में हमसे ज्यादा छोटे-छोटे देश हमसे ज्यादा कमजोर देश कमजोर से मतलब संसाधनों में कमजोर भगवान का दिया हुआ प्राकृतिक संपदा जिनके पास सबसे कम है अगर वह अपनी मातृभाषा में सब कुछ कर सकते हैं तो हम भी हिंदी में सब कुछ कर सकते हैं हिंदी में कुछ नहीं हो सकता उसका सबसे पहला कुतर काया हमारी सरकार की तरफ से वो यह कि हमारे पास वैज्ञानिक शब्दों की कमी है अभी थोड़े दिन से केंद्रीय हिंदी संस्थान नाम की एक बहुत बड़ी संस्था है आगरा में जिनका मुख्य कार्यालय है उन्होंने पूरा शब्दकोश तैयार कर दिया एक दो नहीं हजारों नहीं लाखों लाखों शब्द हैं जो विज्ञान के लिए काम के उपयोग के आ सकते हैं तो अब तो यह तर्क भी खत्म हो गया संस्कृत उसका स्रोत और संविधान में लिखा हुआ है कि जहां आवश्यकता पड़ेगी भाषा में वो शब्द जो है मूल मुख्यता स्पष्ट किया हु है संविधान में संस्कृत से लिए जाएंगे और दूसरे अन्य भारतीय भाषाओं से लिए जा सकते हैं तो संस्कृत में एक अकेली संस्कृत है जिसमें करोड़ों नहीं अरबों शब्दों की उत्पत्ति का सामर्थ्य है क्योंकि मैंने पाच साल व्याकरण ग्रामर पढ़ा है एक दो नहीं लाखों नहीं करोड़ों नहीं अरबों खरबों शब्द उत्पन्न करने का का सामर्थ्य है जिसमें 4000 पाणिनी के सूत्र हैं 2000 धातुएं हैं कुछ उसमें गण सूत्र है उनाद कोष है और जो है उधर निघंटू यह इतना बड़ा व्याकरण का शास्त्र है पाच साल मैंने उसको स्वयं पढ़ा है और मैं तो कहता हूं भारत नहीं हम पूरी दुनिया को चलाने के लिए शब्दों की उत्पत्ति भारत से करके दे सकते हैं इतनी इतना ज्यादा शब्द सामर्थ्य है और आपको यह भी मालूम है कि आज की दुनिया के सब सर्वश्रेष्ठ जो वैज्ञानिक माने जाते हैं ना कंपू कंप्यूटर के कंप्यूटर चलने और चलाने के लिए जिस मूल चीज की आवश्यकता होती है उसको वह लोग अंग्रेजी में एल्गोरिदम कहते हैं पहले एल्गोरिदम बनती है इसमें हिंदी में हम उसको प्रमेय कहते हैं तो पहले एल्गोरिदम तैयार होती है उसके आधार पर कंप्यूटर के चलने की सारी भाषाएं विकसित होती है आपको सुनकर यह ताज्जुब होगा और हैरानी होगी कि अमेरिका जर्मनी फ्रांस जापान दुनिया भर के सारे देशों के वैज्ञानिक अभी इस एक निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ एल्गोरिदम तैयार हो सकती है तो संस्कृत में ही हो सकती है दूसरी किसी भाषा में हो ही नहीं सकती और एक एक इसमें भी क्या षड्यंत्र चलता है देखो अभी पिछले कई वर्षों से हरियाणा में संस्कृत अनिवार्य थी लेकिन वहां से उसकी अनिवार्यता खत्म करने के लिए अब षड्यंत्र शुरू हो गया माने इतने ज्यादा षड्यंत्र हो रहे हैं भाषा के स्तर पर तो और भाषा ही हमारी अभिव्यक्ति का हमारी व्यवस्थाओं का हमारे समस्त व्यवहार का जो सबसे बड़ा स्रोत है वह भाषा है और उसके ऊपर इतना आक्रमण हो रहा है देख के कई बार कौन खोलता है तो यह हमें तय कर लेना है अब अपने स्तर पर कि हम हमारे व्यक्तिगत और वैयक्तिक जीवन में अंग्रेज की और अंग्रेजी भाषा की गुलामी से बाहर आएंगे हमें सरकार को बाहर लाना है इस गुलामी से क्योंकि अंग्रेजी भाषा हमारी मातृभाषा नहीं है अंग्रेजों द्वारा थोपी गई भाषा है जबरदस्ती हमारे ऊपर ला दी गई भाषा है जिसने हमारी पूरी वैज्ञानिकता को ढक दिया हमारे बुद्धि विकास को पूरी तरह से रोक दिया है आप दो बच्चों के ऊपर परीक्षण करके देख लीजिए एक बच्चे को बचपन से अंग्रेजी सिखाना और पढ़ाना शुरू कर दीजिए और दूसरे को मातृभाषा में सिखाना और पढ़ाना शुरू कर दीजिए जितनी कुशाग्र बुद्धि मातृभाषा वाले की होगी अंग्रेजी वाले की नहीं होगी एक आईक्यू टेस्ट होता है ना इंटेलिजेंट क्वेस्ट का टेस्ट इंटेलिजेंस क्वेस्ट और इंटेलिजेंट कोश जब इंटेलिजेंस का नापा जाता है वह सबसे ज्यादा मातृभाषा भाष वाले विद्यार्थियों का ही निकलता है अंग्रेजी भाषा के विद्यार्थियों का कभी नहीं निकलता और मैंने हिंदुस्तान में एक सूची बनाई है कि जिन्होंने अंग्रेजी भाषा में पढ़ा है वह कहां पहुंचे हैं और जो मातृभाषा से पढ़कर आए हैं वह कहां पहुंचे हैं इस देश के जो अर्थव्यवस्था के चोटी पर बैठे हुए लोग हैं ना जैसे धीरू भाई अंबानी जैसे धीरू भाई अंबानी बिरला परिवार नसली वाडिया परिवार ऐसे 72 परिवार हैं इस देश में इन 72 परिवारों में से तीन को छोड़कर 69 परिवारों की शीर्ष पर जो लोग बैठे हुए हैं वह सब मातृभाषा के पढ़े हुए लोग हैं कोई गुजराती में पढ़ा है कोई तमिल में पढ़ा है कोई तेलुगु में पढ़ा है कोई कन्नड़ में पढ़ा है कोई हिंदी में पढ़ा है कोई पंजाबी गुरुमुखी में पढ़ा है और शीर्ष पर पहुंचा है और आपको सुनकर हंसी आएगी कि अंग्रेजी भाषा में जो पढ़े हुए लोग हैं वह इन मातृभाषा वालों के नीचे 101 हजार रु पिल्ली की नौकरी कर कर रहे हैं 1515 हज रुली के नौकर है जो अंग्रेजी से पढ़कर निकले हार्वर्ड से पढ़कर आए ह्यूस्टन से पढ़कर आए ऑक्सफोर्ड से पढ़कर आए कैंब्रिज से पढ़कर आए वह इनके नीचे नौकरी पर हैं 10000 की 15000 की 200 हज की 25 हज की मालिक जो हैं कंपनियों के जिन्होंने एंपायर खड़ा किया है साम्राज्य खड़ा किया है वह तो सब मातृभाषा वाले लोग हैं इसी तरह वैज्ञानिकों की सूची बनाई है मैंने आप हैरान हो जा ंगे चोटी के सारे वैज्ञानिक इस देश में 1 प्रतित अपवाद को छोड़कर सारे चोटी के वैज्ञानिक इस देश में मातृभाषा के स्कूलों में पढ़कर निकले इस देश में आपको तो सबसे बड़ा उदाहरण देता हूं हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जिन्होंने मिसाइल बनाने के क्षेत्र में इस देश को आत्मनिर्भर बनाया और जिन्होंने इस देश में परमाणु बम का परीक्षण करवाया श्री अटल बिहारी वाजपेई के जमाने में उनकी बुद्धि का कमाल देखो कि पर परमाणु बम का परीक्षण हो गया और अमेरिका जैसे देश को पता ही नहीं चला अमेरिका के जासूसी करने वाले सेटेलाइट हैं हमारे स्पेस के ऊपर अमेरिकन सेटेलाइट एक एक मिनट की जासूसी करते हैं हम यहां बैठे हैं और इतना बड़ा समूह है इसकी जासूसी वह कर लेते हैं वह अमेरिकी वैज्ञानिकों को डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की बुद्धि ने ऐसा चकराया कि वह कहीं और व्यस्त थे और यहां परमाण अ बम के परीक्षण पर परीक्षण हो गए और अमेरिका वाले हैरान परेशान कि भारत के लोग इतने होशियार कैसे हो गए यह होशियारी पता है कहां से आई अब्दुल कलाम की तमिल बुद्धि में से यह होशियारी निकली यह अंग्रेजी बुद्धि में से नहीं निकल सकते दूसरा बड़ा नाम बताता हूं इस देश में सबसे पहला सुपर कंप्यूटर जिस वैज्ञानिक ने बनाया डॉक्टर विजय भटकर व पूरी तरह से मराठी भाषा से पढ़कर निकले हुए वैज्ञानिक है आपको मालूम एक जमाना था कि हमारे पास सुपर कंप्यूटर नहीं था हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी अमेरिका गए थे सुपर कंप्यूटर मांगने के लिए अमेरिका ने मना कर दिया कि हम सुपर कंप्यूटर किसी को नहीं बेचते क्योंकि हम हमारी लेटेस्ट टेक्नोलॉजी किसी को नहीं दे सकते राजीव गांधी अपना सा मुंह लेकर वापस चले आए डॉक्टर विजय भटकर और उनकी टीम ने राजीव गांधी को कहा कि आप हमको थोड़ा समय दीजिए और थोड़ा सा पैसा दीजिए हम आपको सुपर कंप्यूटर अमेरिका से भी बेहतर बना कर देंगे तो पहले तो राजीव गांधी को भरोसा नहीं हुआ कि ऐसा हो सकता है लेकिन मरता क्या ना करता कोई चारा नहीं था सुपर कंप्यूटर बनाना ही था कोई देने को हमको तैयार नहीं था तो उन्होंने डॉक्टर विजय भटकर और उनकी टीम को काम पर लगाया उनको प्रोजेक्ट सक्शन करके दिया पैसे दिए और डॉक्टर विजय भटकर ने तय समय से आधे समय में दुनिया का सर्व से सुपर कंप्यूटर बना के दुनिया को दिखाया और वह सुपर कंप्यूटर अमेरिका के सबसे बेहतरीन सुपर कंप्यूटर से ज्यादा गति पर काम करता है और बहुत सस्ता है और भारत ने उसी सुपर कंप्यूटर के मॉडल पर आज तक 50 से ज्यादा सुपर कंप्यूटर बनाए और दुनिया के दूसरे देशों को बांट दिए जो वहां के यहां उन देशों में काम कर रहे हैं कनाडा का पूरा मौसम विज्ञान का विभाग भारतीय सुपर कंप्यूटर पर चलता है आपको मालूम है यह बात कनाडा जैसा आधुनिक देश कनाडा जैसे दुनिया के बसं देशों में भारत के सुपर कंप्यूटर लगे हैं और ध्यान दीजिएगा डॉ विजय भटकर मूलतः मराठी भाषा के विद्यार्थी हैं और मराठी के साधारण स्कूल से पढ़कर निकले हैं साधारण स्कूल समझते हैं म्युनिसिपल का जिनमें हमारे नेताओं के बच्चे कभी झांकने को नहीं जाते अधिकारियों के बच्चे कभी झांकने को नहीं जाते साधारण म्युनिसिपल के स्कूल में पढ़कर निकला हुआ कोई बच्चा देश में सर्व से सुपर कंप्यूटर का निर्माता हो सकता है साधारण तमिल स्कूल में पढ़कर निकला हुआ बच्चा इस देश में कोई सर्व मिसाइल बनाने की तकनीकी का निर्माता हो सकता है परमाणु बम बनाने की तकनीकी का निर्माता हो सकता है हमारे देश के एक और बड़े वैज्ञानिक हैं प्रोफेसर एम जी के मेनन उनकी पूरी शिक्षा व्यवस्था मलयालम में हुई 12वीं तक पूरा मलयालम में पढ़े हैं और इस देश के सर्वश्रेष्ठ चोटी के वैज्ञानिकों में उनकी गिनती है प्रोफेसर स्वामीनाथन जिनका नाम सारी दुनिया जानती है कृषि के क्षेत्र में वह मूलत अपनी मातृभाषा के तमिल के स्कूल में पढ़कर निकले हुए व्यक्ति हैं और आज सारी दुनिया उनके विद्युत का लोहा मानती है हमारे देश में एक लंबी लिस्ट है वैज्ञानिकों की जो मूल मातृ भाषा से पढ़कर निकले तो चोटी के वैज्ञानिक बने और मैं आपको अफसोस की बात बताता हूं जो कॉन्वेंट में से और पब्लिक स्कूलों से अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हुए जो बच्चे निकले ना वह वैज्ञानिक नहीं बने वह साइंटिस्ट नहीं बने साइंटिफिक मैनेजर बन गए समझ गए आप साइंटिस्ट होना एक अलग बात है और साइंटिफिक मैनेजर होना दूसरी बिल्कुल अलग बात है साइंटिस्ट वो है जो मूल शोध में लगता है और शोध को आगे बढ़ाता है साइंटिफिक मैनेजर वो होता है जो शोध को आगे बढ़ाने में सहयोग करता है जैसे स्वामी जी कुछ लिख रहे हैं लिखने के लिए कागज चाहिए तो कागज किसी ने लाकर दे दिया वह साइंटिफिक मैनेजर है लिखने वाला साइंटिस्ट है तो साइंटिफिक मैनेजर बनके ही रह जाते हैं सारे कॉन्वेंट और पब्लिक स्कूल के बच्चे अंग्रेजी में पढ़कर निकलते हैं क्योंकि मूल बुद्धि चलती ही नहीं है क्योंकि अ अजी में आप सोच नहीं सकते हैं क्योंकि मातृभाषा आपकी अंग्रेजी नहीं है जो आप मूल भाषा में सोच सकते हैं वही भाषा में आप कर सकते हैं इसलिए भारत के सर्वश्रेष्ट वैज्ञानिक निकले तो मातृभाषा में से सर्वश्रेष्ठ उद्योग कर्मी निकले तो मातृभाषा में से सर्वश्रेष्ठ व्यापारी निकले तो मातृभाषा में से सर्वश्रेष्ठ संस्कृत विद्वान तो मातृभाषा में से हर जगह विद्वान को आप ढूंढोगे देखोगे परखो ग तो पता चलेगा उनकी की बैकग्राउंड वही है मातृभाषा की और इतना ही नहीं ना ये जो देश चलाने का ठेका जिनको मिला हुआ है नेता भी अधिकांश हिंदी में पढ़े हिंदी मीडियम से पढ़े लेकिन देश के ऊपर लाद के रखते हैं आप इस देश के नेताओं के बारे में भी तो बता थोड़ी सी जानकारी हमारे सारे नेताओं में 1 प्रतिशत को छोड़कर 545 लोकसभा में बैठते हैं और 50 राज्यसभा में और 5000 से ज्यादा विधानसभाओं में बैठते हैं इन सब नेताओं में आधा प्रतिशत को छोड़ दो बाकी 99.5 प्र नेता भी मातृभाषा के स्कूलों में ही पढ़कर निकले हैं जब वह भाषण देते हैं पब्लिक मीटिंग करते हैं वोट मांगते हैं आपके बीच में आते हैं और गधे को भी बाप बनाते हैं उस समय वह सब मातृभाषा में ही बात करते हैं वोट मांगते हैं मातृभाषा में हिंदी भाषा में गुजराती मराठी तमिल तेलुगु मलयालम बगला में वोट मांगते हैं भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा में गुजराती मराठी में और राज किसम करते हैं अंग्रेजी में मतलब नेता बनते ही फिर गड़बड़ हो जाती है और मैं तो कई नेताओं को जानता हूं आप भी जानते हैं नाम लेकर कहने की जरूरत नहीं है जिंदगी भर हर जगह पब्लिकली माने सार्वजनिक रूप से हिंदी हिंदी हिंदी हिंदी हिंदी और संसद में भाषण शुरू करते ही अंग्रेजी चालू हो जाती है संसद में खड़े होते ही अंग्रेजी चालू हो जाती है यह चक्कर क्या है संसद में जाते ही अंग्रेजी हो जाती है शुरू और संसद के बाहर अपने क्षेत्रों में होते हैं तो हिंदी उसके लिए मुझे एक कहानी कहनी है एक मिनट की वो यह कि यह जो संसद भवन बनी हुई है ना यह अंग्रेजों की बनाई हुई है आपको मालूम है यह भवन पूरा अंग्रेजों का बना हुआ 1927 में यह बनकर तैयार हुआ संसद का भवन जो गोल गोल गुंबज है ना ऊपर से देखो तो शून्य जैसा रहता है इसमें से शून्य ही निकलता है और कुछ नहीं निकलता तो यह संसद भवन अंग्रेजों की बनाई हुई है अंग्रेजी वास्तुकार आए थे अंग्रेजी आर्किटेक्ट आए थे उन्होंने डिजाइन किया था उन्होंने बनाया और बनते समय कई वहां मर भी गए उन्हीं की आत्मा इनमें प्रवेश कर जाती है जैसे ही यह संसद में घुस जाते हैं एक अंग्रेज था उसका नाम था लुटियन दिल्ली वाले जानते हैं दिल्ली में एक इलाका कहलाता है जिसको कहते हैं लुटियन स्टोम लुटियन टीला हिंदी में कहेंगे तो लुटियन का टीला टीला समझते हैं एक छोटे से पहाड़ नुमा इलाके को टीला कहते तो लुटियन टीला पर बनी हुई है पूरी संसद तो लुटियन की आत्मा वहीं पर है वही लुटिया डुबो हां तो वही लुटिया डुबो है इस देश की जैसे ही ये घुस जाते हैं संसद भवन में फर्राटे दार अंग्रेजी में बात करना शुरू कर देते हैं भवन से बाहर निकलते हिंदी में आ जाते हैं या गुजराती मराठी तमिल में आ जाते तो इनकी जिंदगी का यह जो दोहरा पन है इस दोहरे पन को हमें खत्म करना है और हमें समाप्त कराना है क्योंकि यह खंडित व्यक्तित्व जो है वह कभी भी खंडित देश बनाता है अगर आपका व्यक्तित्व निजी जीवन में अलग है और सार्वजनिक जीवन में अलग है एक जगह आप अंग्रेज हैं और दूसरी जगह हिंदी वाले हैं यह दोहरा चरित्र दोहरा व्यक्तित्व यह समाज को कोई अच्छी दिशा नहीं दे सकता तो भारत के नेताओं का भारत के दूसरे समाज के ऐसे लोगों का जो सत्ता शीर्ष पर बैठे हुए हैं इनका हमें परिवर्तन करना पड़े कि आपको या तो मातृभाषा में आना ही पड़ेगा नहीं तो भारत छोड़कर जाना पड़ेगा जहां की भाषा बोल रहे हो वहां जाओ जहां की भाषा बोल रहे हो वहां जाओ उस देश से उस देश की भाषा से इतनी मोहब्बत है तो इस देश में क्यों रहते हो यदि इतना घटिया देश है हमारी कि हमारी भाषा बोलने में भी तुमको शर्म आती है तो वही जाओ अब एक दूसरे प्रश्न पर मैं आना चाहता हूं भाषा की गुलामी से हमको भी बाहर आना है हमारे अपने निजी जीवन में और सार्व जीवन में भारत स्वाभिमान का कोई भी कार्यकर्ता ऐसा काम ना करे जिससे आपके ऊपर कोई उंगली उठा सके तो आप आज से ही मन में यह संकल्प ले लीजिए कि भाषा के प्रति हमारे मन में इतनी संवेदना तो होनी चाहिए कि अपने जीवन के हर काम को करते समय हम हमारी मातृभाषा का उपयोग करें राष्ट्र भाषा का राष्ट्र भाषा का मातृभाषा का यह आपके जीवन में आना चाहिए तो कहां से शुरू होगा सबसे पहले अपने घर से शुरू करिए आपके घर में देखिए आपने अपने भाई बहनों के नाम बे बेटियों के नाम कुछ अंग्रेजी वाले तो नहीं रखे हुए हैं टिंकू डब्लू बबलू पिंटू बबली डबली ट्विंकल डिंपल अर्थ मालूम है इनके बता दे जबरदस्ती नाम रख के बैठे हुए ये जो टिंकू है ना टिंकू एक बार मैं डिक्शनरी लेकर बैठा कि इन शब्दों के अर्थ ढूंढे जाए तो 17वी शताब्दी की बपस डिक्शनरी में इनके अर्थ मिले टिंकू का अर्थ होता है आवारा लड़का आवारा तो समझते हैं बाप की ना सुने मां की ना सुने घर में कभी ना रहे घर का कोई काम ना करे कुछ भी बोलो तो हमेशा उसको टाल रहे उल्टा करे उसको अंग्रेजी में टिंकू कहते और हम मूर्ख भारतवासियों ने अपने होनहार उच्चा आदर्शों वाले बच्चों का नाम टिंकू रखा हुआ मुझे बहुत गुस्सा आता है किसी घर में मैं चला जाऊं पिताजी का नाम है राम दल माता जी का नाम है गायत्री देवी बेटा टिंकू आ गया उनका अब राम दयाल और गायत्री देवी का टिंकू कहां से आया यह जरा खोज का विषय है और शोध का विषय है उसका बदलवा देंगे तो आप जो है जिसका किसी का नाम ऐसा हो तो उसका बदलवा दे उसका राम दयाल का रामस हाथ जोड़कर विनती है हाथ जोड़कर विनती है कि आपके परिवार के भाई बहनों के बेटे बेटियों के नाम अगर इस तरह के हैं तुरंत इनको बदल दीजिए अपने पास हिंदी नामों की कोई कमी नहीं है संस्कृत नामों की कोई कमी नहीं गुजराती मराठी तमिल तेलुगु नामों की कमी नहीं है तो यहां से शुरू करिए अपने जीवन में यहां से शुरू करिए दूसरा काम आप एक और करिए अपने निजी जीवन में भाषा की गुलामी से बाहर आने के लिए आप अगर बैंक में अपना खाता खोलते हैं तो हस्ताक्षर कभी भी अंग्रेजी में मत करिए सारे के सारे बैंक के खातों में आप हिंदी में हस्ताक्षर करिए आय अपनी मातृभाषा मातृभाषा में आप शुरू कर लिपियां अलग-अलग हो सकती है लिपि भारतीय हो अगर अगर आपकी भाषा गुजराती है तो गुजराती में करिए तमिल है तमिल में करिए कन्नड़ है कन्नड़ में करिए मलयालम में करिए जो भाषा है उसमें करिए अंग्रेजी के हस्ताक्षर हटा दीजिए फिर आप कहेंगे जी अकाउंट तो खुल गया है तो बदल दीजिए आपको मालूम है बैंक में ऐसी सुविधा है जब चाहेंगे आपके हस्ताक्षर का नमूना बदलने के लिए बैंक तैयार है आपको उसका एक सूचना बैंक को देनी है बैंक आप आपकी सुविधा से कर देगा तीसरा अपने जीवन में वहां से शुरू करिए कि कोई चेक लिख रहे हैं तो उसको कभी भी अंग्रेजी में मत लिखिए हिंदी में ही लिखिए चेक हिंदी में लिखने की सुविधा है और हिंदी में लिखे गए चेक को स्वीकार करने की भी सुविधा है गुजराती मराठी सभी भाषाओं में चेक लिखने की सुविधा है चेक को स्वीकार करने की सुविधा है तो सारे चेक आपके मातृ भाषाओं में लिखे जाएं राष्ट्र भाषा में लिखे जाएं चेक पर हस्ताक्षर आपकी मातृभाषा में हो राष्ट्र भाषा में हो और व्यक्तिगत बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग कम से कम करिए क्योंकि आपको बहुत सारे अंग्रेजी शब्दों का अर्थ नहीं मालूम है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है हर शब्द का अपना एक इतिहास होता है ऐसे ही अंग्रेजी शब्दों का अपना एक इतिहास है लेकिन उस इतिहास को जानकर अगर आप शब्द इस्तेमाल करते हैं तब तो आपको छूट है बिना जाने अनजाने में आप बोलते रहते हैं वो बहुत खतरनाक है एक शब्द है जिसको हम कहते हैं मैडम बहुत खतरनाक है अगर इसको आप जान लेंगे तो आज के बाद किसी को मैडम कहने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे आप हम किसी को भी राह चलती बहन को मां को बेटी को मैडम कह देते हैं और हमारे देश का भला हो बहनों का वह भी मैडम कहलवान में गौरव महसूस करती है हमको मैडम कहो मैडम का अर्थ जान लीजिए एम ए डी ए एम ई ये शब्द है मैडम मूलत ये फ्रेंच का शब्द है फ्रेंच में एक शब्द होता है उसका नाम है मां दाम एम ए माने मां और दाम डी ए एमई दाम मां माने मेरा दाम माने महिला मेरी महिला मेरी स्त्री मेरी औरत वो है मादाम फिर वह अंग्रेजी में चला गया क्योंकि अंग्रेजी वालों ने सारी दुनिया से उधार लिए हुए शब्द सबसे ज्यादा है अंग्रेजी के मूल शब्द सबसे कम है दुनिया भर की भाषाओं से उधार लेकर खिचड़ी बना रखी है उन्होंने तो यह मादाम शब्द फ्रेंच से ले लिया अंग्रेजी में आ गया जिसका मूल अर्थ है मेरी स्त्री मेरी महिला मेरी औरत उसको आप कह सकते हैं मैडम अब सारी महिलाएं आपकी हैं सारी स्त्रियां आपकी हैं सारी औरतें आपकी हैं हैं तो बहन के रूप में है तो मां के रूप में पत्नी के रूप में नहीं हो सकती सारी स्त्रियां सारी महिलाएं तो गलती से भी कल से किसी को मैडम मत कहिए मां बोलिए बहन बोलिए मां कहिए बहन कहिए बेटी कहिए अगर छोटी है बराबर की है तो आप बहन कहिए जो कहना है कहिए भारतीय शब्दों में रिश्ते बिल्कुल स्पष्ट हैं बहन का रिश्ता एकदम स्पष्ट है मां का रिश्ता एकदम स्पष्ट है बेटी का रिश्ता एकदम स्पष्ट है पत्नी का रिश्ता एकदम स्पष्ट है इतने स्पष्ट रिश्ते दुनिया के किसी शब्द में नहीं मिलेंगे जो भारत में मैडम का रि ही स्पष्ट नहीं है आपको और हो गया तो कहने की हिम्मत नहीं करेंगे तो हाथ जोड़कर विनती करता हूं मैडम कहना बंद कर दीजिए और जो आपके नजदीक में मैडम कहलाने वाली बहने हैं उनको भी जरा यह बता दीजिए कि आप किसकिस की हो सकती है किसकी नहीं हो सकती है तो यह मैडम बंद कर और एक बहुत खराब शब्द है सर सर सर ऐसी गुलामी घुसी हुई है हमारे यहां मैं कार्यालयों में जा हूं तो एक ही शब्द सुनता हूं यस सर ओके सर राइट सर वेरी गुड सर फाइन सर सर सर मालूम है सर क्या है यह जो एस आई आर सर शब्द है यह अंग्रेजी का शब्द है मूलते अंग्रेजी का है और यह शब्द आया है पदवी से एक पदवी होती है जिसको सर कहा जाता है इंग्लैंड में जैसे हमारे यहां आचार्य जी है ना वो एक पदवी है ना वैसे ही सर एक पदवी है लेकिन कोई अच्छी पदवी हो तो बोलने में मजा भी आएगा अच्छा भी ल यह पदवी क्या है वो जान लो यूरोप में पूरे यूरोप में सभी भाषाओं में यह सर शब्द है अंग्रेजी में मूल रूप से आया फिर दूसरी भाषाओं में गया पूरे यूरोप में एक मूल परंपरा है जिसको आप सुनेंगे तो हैरान हो जाएंगे दूसरों को गुलाम बनाकर रखने की परंपरा हजारों साल तक यूरोप में रही है दूसरों को गुलाम बनाकर रखने की परंपरा यूरोप में बहुत लंबे समय तक रही है हजारों साल तक रही है तो होता क्या है यूरोप में जो व्यक्ति जितने ज्यादा लोगों को गुलाम बनाकर रख सकता है वह उतनी ही ऊंची पदवी का अधिकारी होता है उसकी पदवी उतनी ऊंची होती है गुलाम बनाकर जो रख सकता है उसकी पदवी उतनी ही ऊंची हो सकती है महिलाओं को गुलाम बना के रख सके पुरुषों को गुलाम बना के रख सके गुलामी की प्रथा पूरे अमेरिका पूरे यूरोप का सबसे शर्मनाक और काला अध्याय है जिसको वह कभी मिटा नहीं पाएंगे दुनिया के सामने उस गुलामी की परंपरा में से निकला है सर जिनके गुलाम सबसे ज्यादा हैं वह सर की उपाधि से विभूषित किए जाते हैं भारत दुनिया में एक ऐसा अद्भुत देश है जहां कोई किसी को गुलाम नहीं बना सकता कारण क्या है यहां सब स्वतंत्र हैं क्योंकि आत्मा सबकी समान है और सब ईश्वर के पुत्र हैं सब बराबर हैं कोई ऊंचा नहीं है कोई नीचा नहीं है चीटी भी आपकी गुलाम नहीं है मक्खी मच्छर भी आपके गुलाम नहीं है वो भी स्वतंत्र जी है आप भी स्वतंत्र जीव है उनको जिंदा रहने का उतना ही अधिकार है जितना आपको तो हम तो चीटी मक्खी मच्छर को गुलाम नहीं बना सकते आदमी को गुलाम बनाना तो दूर की ही बात इस देश में संभव नहीं तो यहां गुलामी की परंपरा हो नहीं सकती और वहां गुलामी के अलावा दूसरी कोई परंपरा नहीं हो सकती तो वह सर के शब्द का इस्तेमाल करते हैं उस गुलामी की परंपरा को बताने के लिए और समझाने के लिए हम हमारे देश में कम से कम इस गलत शब्द का उपयोग ना करें आपको सर बिल्कुल हटा देना चाहिए अपने जीवन में से और अगर किसी अननोन अनजान आदमी को आप संबोधित कर रहे तो श्रीमान कहिए ना कितना सुंदर शब्द है श्रीमान श्रीमन कहिए श्रीमान कहिए महाशय कहिए महोदय कहिए कोई भी शब्द ले लीजिए हिंदी का संस्कृत का शब्दों की कोई कमी नहीं और अपने शब्दों में दम कितना है थोड़ी देर पहले मैं मैडम बता रहा था ना और भारत का एक शब्द है श्रीमती श्री माने लक्ष्मी मति माने बुद्धि लक्ष्मी और बुद्धि लक्ष्मी और सरस्वती जहां एक साथ निवास करे वह श्रीमती वह मैडम नहीं है मैडम अलग है श्रीमती अलग है हम कई बार भाषांतर कर देते हैं ना मैडम का श्रीमती कर दिया सर का श्रीमान कर दिया यह बड़ा खतरनाक खेल है और एक शब्द कभी भी अपनी जिंदगी में अंग्रेजी का मत लाइए मिस्टर मिस्टर ये मिस्टर ये मिस्टर ये मिस्टर ये अक्सर बोलते रहते हैं ना मिस्टर का इतिहास अगर जान लेंगे तो फिर कभी भी बोल नहीं पाएंगे मिस्टर कौन होता है और मिसेस कौन होता है हमारे यहां मिसेस श्रीमती नहीं है इंग्लैंड यूरोप में मिसेस और मिस्टर जो शब्द है वो क्या है इंग्लैंड की एक पुरानी परंपरा है वो यह है एक से ज्यादा स्त्रियों को अपने साथ रखना एक से ज्यादा पुरुषों को अपने साथ रखना कोई महिला है रानी है वोह कई पुरुषों को अपने लिए इस्तेमाल कर सकती है अपने शरीर की वासना को शांत करने के लिए और कोई राजा है वह बहुत सारी स्त्रियों को इस्तेमाल कर सकता है अपने शरीर की वासना को शांत करने के लिए और राजा के नीचे के जो लोग हैं वह भी उसी परंपरा में चलते रहते हैं जो अधिकारी वर्ग के लोग होते हैं तो वहां बहुत सारी महिलाओं से बहुत सारे पुरुषों के रिश्ते होते हैं बहुत सारे पुरुषों के बहुत सारी महिलाओं से रिश्ते होते हैं एक खराब शब्द है ना विवाह के अतिरिक्त संबंध जिसको एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स कहते हैं वह पूरे यूरोप में सामान्य है मैं यूरोप के ऐसे बहुत बड़े लोगों को जानता हूं जिनकी 20-20 शादियां हुई 25-25 शादियां हुई 50-50 3535 40 40 सबके तलाक हुए अंत में कोई उनके साथ नहीं रहा पत्नी भी अलग मरी पति भी अलग मरा ऐसे लोग हैं और उनके यहां बहुत सारी शादियां होती हैं और बहुत सारी स्त्रियों को शादियों के बिना भी साथ में रखा जाता है इस तरह का उनके यहां चलन है वो अपने देश में नहीं रहा और हमारे यहां गलती से किसी राजा ने यह कोशिश की तो जनता ने कभी उसको स्वीकार नहीं किया यह आप जान लीजिए हमारे यहां ऐसे कुछ राजा हुए जिन्होंने यह गलती की उनको इस देश की जनता ने स्वीकार नहीं किया हटाया उनको गद्दी से उतारा उनके खिलाफ बगावत की और उनके खिलाफ विद्रोह किया तो हमारे यहां यह चलन और परंपरा है नहीं हम थोड़ी सुचिता वाले लोग हैं ब्रह्मचारी की बात करने वाले लोग हैं राजा के लिए ब्रह्मचारी होना बहुत बड़ी जरूरत माना जाता रहा यूरोप में ऐसा नहीं है तो वहां क्या होता है कि एक सारी एक एक ही पुरुष की बहुत सारी स्त्रियां हो सकती हैं एक स्त्री के बहुत सारे पुरुष हो सकते हैं तो उनको अलग अलग करने के लिए तय किया जाता मिस्टर एंड मिसेस कौन सी मिसेस यह वाली कौन से मिस्टर यह वाले कौन से मिस्टर व वाले कौन से तो अब मैं मूल अर्थ बता रहा हूं मिस्टर का अर्थ होता है पति को छोड़कर कोई भी पुरुष वह मिस्टर है और मिसेस माने धर्म पत्नी को छोड़कर कोई भी स्त्री आप सोचिए आपके लिए यह संभव है पति को छोड़कर कोई भी पुरुष मिस्टर हो सकता है और पत्नी को छोड़कर कोई भी स्त्री मिसेस हो सकती है तो आप अपनी जिंदगी में मेहरबानी करके यह मिस्टर मिसेस शब्दों का इस्तेमाल बंद करिए कभी लिखिए मत किसी को बोलिए मत किसी को परिचय करवाते हैं ना राजीव भाई यह हमारे मिस्टर है यह हमारी मिसेस बहुत खराब हम धर्म पति हैं या धर्म पत्नियां है मिस्टर मिसेस नहीं है यहां क्योंकि हमने अग्नि के साक्षी में सात फेरे लिए हैं पूरे समाज के गवाह बनाकर हम ऐसे ही पति-पत्नी नहीं होते हैं इस देश में यहां बड़ी बहुत पुरानी परंपरा है पति-पत्नी होने की यूरोप में तो ऐसे ही हो जाते हैं बैड पार्टनर है तो आप हो सकते हैं भले आप कहीं जाएं या ना जाए और बिना पति-पत्नी हुए भी सालों साल साथ रह सकते हैं क्योंकि उनके य एक परंपरा है लिव इन रिलेशनशिप आप नहीं है पत्नी नहीं है साथ में रह रहे हैं बच्चे पैदा हो गए तो किसी अनाथ आश्रम को दे दिए वहां पर वह बड़े होंगे वहीं पर पले गे फिर उनके साथ समस्या आती है कि नाम किसका दिया जाए क्योंकि उनके बाप का पता नहीं क्योंकि उनकी मां का पता नहीं तो चर्च फिर उनका नाम तय करता है और उनको चर्च का नाम दिया जाता है तो उनके यहां की ये पुरानी परंपराएं हैं अब वो खराब है अच्छी हैं वो वो जाने हम उस परे टिप्पणी नहीं करते हम यह नहीं कह सकते कि वह बहुत खराब है हम यह भी नहीं कहते बहुत अच्छी है हम तुलनात्मक रूप रूप से कह सकते हैं कि अपने देश की परंपरा से वह भिन्न है तो भिन्न परंपराओं में भिन्न शब्द होते हैं भिन्न व्यवस्थाओं में भिन्न शब्द होते हैं हमारी व्यवस्था और हमारी परंपरा मिस्टर और मिसेस वाली नहीं है तो अपनी धर्म पत्नी के लिए गलती से भी यह मिसेस शब्द इस्तेमाल ना करें और आपकी धर्मपत्नी को समझा के रखें कि आपके लिए कभी मिस्टर शब्द इस्तेमाल ना करें क्योंकि अक्सर स्वामी जी जो कह रहे हैं वो मैंने भी महसूस किया है कोई भी परिचय करा देता तो यही कह देता यह मेरे मिस्टर है और यह मेरी मिसेस है और बहुत खराब एक अंग्रेजी का शब्द हम लोगों ने इस्तेमाल करना शुरू किया है यह मेरी बेटर हाफ है वह और भी तकलीफ देने वाला शब्द बेटर हाफ वहां हो सकती है यहां नहीं होती है कोई भी यह तो आपकी पूरे जीवन की संगिनी है हाफ और फुल का कोई चक्कर ही नहीं है और इस जन्म में नहीं है सात जन्म तक है तो यहां हाफ और फुल का चक्कर ही नहीं है इसलिए यह अन ने से सरी बिना किसी कारण के अपनी इंप्रेशन को बढ़ाने के लिए दूसरे पर दबदबा सापित करने के लिए अंग्रेजी शब्दों का उपयोग अपने जीवन में आप तो कम से कम करिए तो यह मेरी आपसे प्रार्थना है तो भाषा की गुलामी से आप थोल अंकल अंटी भी जदा भाषा की गुलामी से थोड़ा बाहर निकलिए एक और बहुत खराब शब्द है अंकल और दूसरा है आंटी अब यूरोप में कोई रिश्ता नहीं है चाचा नहीं है मामा नहीं है मौसा नहीं है फूपा नहीं है मौसा का मौसा नहीं मामा का मामा नहीं फूपा का फू नहीं वहां तो सब अंकल है क्यों नहीं है क्योंकि परिवार नहीं है परिवार होते हैं तो रिश्ते होते हैं परिवार है ही नहीं आपको सुनकर हैरानी होगी 1950 तक यूरोप में परिवार नाम की संस्था नहीं होती थी मुश्किल से दो-तीन प्रतिशत लोगों के परिवार हुआ करते थे 1950 तक अभी थोड़े दिन से उनके यहां ये थोड़ी परंपरा आई है वो भी भारत और पूर्वी देशों से उन्होंने सीखी है तो जहां परिवार नहीं होगा वहां पारिवारिक रिश्ते नहीं है तो सारे रिश्तों को वह एक जगह इकट्ठा करके उन्होंने अंकल कह दिया उन्होंने आंटी कह दिया तो आपके जीवन से यह अंकल आंटी फिर यह मिस्टर मिसेस मैडम सर यह फालतू के जो अंग्रेजी शब्द हम लोग बेकार में इस्तेमाल कर रहे हैं इनको निकालिए भाषा की गुलामी से आप बाहर निकलिए तो दूसरों को निकालने में सुविधा होगी और ऐसे ही एक दूसरा विषय है भूषा अंग्रेजों की भूषा हम हमारे जीवन में क्यों अपनाए आप तो नौजवान है इस बात पर जरा ध्यान दीजिए कि अंग्रेज कोर्ट पहनेंगे सूट पहनेंगे पेंट पहनेंगे टाई पहनेंगे पेंट वो क्यों पहनते हैं पेंट का आपको मालूम है जो परिभाषा है पांव में नीचे से छोटी होगी और पूरी जगह चुस्त रहेगी अब यह पेंट इंग्लैंड में पहनने की परंपरा 14वीं 15वीं शताब्दी से आई और वह 14वीं 15वीं शताब्दी के पहले बड़े दुखों में रहते थे क्योंकि पेंट इजाद नहीं हुई थी तो वह चर्म खाल लपेट के रहा करते थे फिर पेंट आई क्यों आई ठंड बहुत पड़ती है साल में छ महीने आठ महीने सूरज नहीं निकलता बर्फीली हवाएं चलती हैं तो बर्फीली हवाएं पैर के अंदर से घुस जाए तो सारा ठंडा हो जाता है बर्फीली हवाएं गले के अंदर चली जाए तो गले को तकलीफ हो जाती है तो उन्होंने पोशाक ऐसी बनाई कि गला पूरी तरह से बंद रहे और बंद गले में भी हवा ना घुसे तो इस पर से टाई लगाकर टाइट करके रखे उसको और इतना टाइट करके रखे कि गर्दन भी ना घूमे आपकी तो उन्होंने अपनी परंपरा लाई और यूरोप में एक बड़ी पुरानी परंपरा है टाई लगाने की और वह आई इसलिए मैंने इस पर थोड़ा खोज किया पुराने उनके दस्तावेज देखे हैं तो मुझे इतनी हंसी आती है कहने में कि बहुत ज्यादा ठंड होती है ना तो सर्दी जुकाम बहुत होता है तो नाक बहती रहती है हमेशा तो उनके यहां पुरानी परंपरा यह थी कि कागज रखते थे जेब में पोच पोच के हर समय नाक सड़क सड़क सड़क सड़क तो पोछा रख लिया पोछा रख लिया त अभी भी रखते हां अब उन्होंने फिर क्या किया कि एक कपड़ा ही लटका लो बार-बार उसको जेब में रखने का खर्चा बच जाए वहां से यह टाई की परंपरा निकली अब वोह स्टेटस सिंबल बन गई और उसको हम अपने गले में लटका के घूम रहे हैं क्या मूर्खता कर रहे हैं यहां गर्मी बहुत है गर्मी वाले देश के कपड़े खुले होने चाहिए गला खुला होना चाहिए पांव खुला होना चाहिए पांव खुला रहे गला खुला रहे इसलिए हमारे यहां इस तरह के वस्त्रों की परंपरा रही है हम लुंगी पहनते हैं पहनते हैं कभी भी हवा आपकी अंदर जा सकती है और कभी भी जा सकती है कि नहीं अब आपने पेंट चढ़ा ली और ऊपर से टाइट जींस चढ़ा ली वह चढ़ती भी नहीं है तो जमीन पर लेट जाते हैं 45 डिग्री पर पैर उठाकर फिर खींच खींच के चढ़ाते हैं और उतारते हैं तो फिर खींच खींच के ही उतार पड़ती है और अंदर का बहुत कुछ उतर जाता है उसके साथ में ये कहां आप फंस गए हैं इस चक्कर में हटाइए इसको अपने जीवन से यह अंग्रेजी भूषा का मोह छोड़िए टाई नीचे पैट फिर टाई और कोट भी तो पहनते गर्मी में और गर्मी में कोट 45 47 डिग्री तापमान और मुझे इतनी तकलीफ होती है यह देखकर कि दूल्हे राजा घोड़ी पर चढ़ के बैठे हैं थ्री पीस सूट चढ़ाए हुए गर्मी में 45 डिग्री 50 डिग्री कहां जा रहे जी शादी कराने जा रहे मूर्खा अधिपति दिखाई देता है मूर्खों का भी अधिपति थ्री पी सूट और टाई और घोड़े पर चढ़ के आपको मालूम है घोड़े पर चढ़कर बैठने की यह पोशाक नहीं है टाई सूट घोड़े पर चढ़कर बैठने की पोशाक तो धोती है जो पीछे लांग लगाकर बांधी जाती है ना उससे आप घोड़े पर चढ़कर बैठ सकते हैं क्योंकि दोनों पांव आपके स्वतंत्र रहते हैं आप मराठी स्टाइल की धोती पहनना जानते हैं ना वह घोड़े पर चढ़कर बैठने की पोशाक है यह थ्री पीस सूट और टाई नहीं है कई बार पेंट फट जाती है पीछे से क्योंकि टाइट होती है और घोड़े पर चढ़ने के लिए ज्यादा लंबी दूरी तक पांव को आगे लाक डालना पड़ता है तो आप ये सूट पेंट टाई कोट और यह गर्म कोट और काला कोट यह सब हटाइए टाई से आंखों की बीमारी भी होती है जो ग्लूकोमा की प्रॉब्लम बढ़ रही है इसमें बहुत बड़ा कारण जो है टाई है और टाइट जो कपड़े पहनते पेंट टाइट पेंट और यह सब इससे नपुंसकता इनफर्टिलिटी और सेक्सुअल डिसऑर्डर्स पैदा होते हैं यह तो साइंटिफिकली प्रूव हो चुका है अब आप टाई बांधते हैं ना तो यहां जो आपकी नस है जो खून का प्रवाह करने के लिए भगवान ने आपको दे रखी है वह भी बंद हो जाती है ना और बचपन से आपके बच्चों को टाई बांध बांध के स्कूलों में भेजते रहते क्या आप उनके ऊपर अत्याचार कर रहे हैं उनका गला खुला रहने दीजिए उनके पांव भी खुले रहने दीजिए तो बच्चों की पोशाक अपने घर में यह टाई थ्री पीस सूट और पेंट की हटाइए और अपने जीवन में भी कभी इस पोशाक का इस्तेमाल मत करिए और मैं तो अगर आपसे यह निवेदन करूंगा कि अगर आप वकालत के पेशे में है वकील हैं तो अपनी वकालत के काम कर करने वाले लोगों को प्रेरित करिए कि यह काला कोट जल्दी से जल्दी हटाए यह अंग्रेजों की परंपरा का है आपको मालूम है इंग्लैंड में काला कोट पहन के वो न्यायाधीश बैठा करते थे ऊपर से चोगा लगाते थे और चोगे के ऊपर वो टोपा लगाते थे हां देखा है ना वो वो सब नकली विग वाला वही हमारे हिंदुस्तान में आ गया अब अंग्रेज चले गए उनको गए हुए 62 साल हो गए हैं अब हम वो कालाकोट क्यों पहने और आपको एक जानकारी दूं बड़ी बड़ी रोचक जानकारी है कि वो जो चोगा पहनते थे ना लंबा-लंबा ढीला ढीला उसमें जेब पीछे रहती थी पीछे जेब पीठ की तरफ तो मैं ढूंढ रहा था तब पता चला कि वह पीछे जेब इसलिए है कि किसी मुवक्किल का उन्होंने मुकदमा लड़ा और मुवक्किल ने फीस वीस तो दे ही दी और ज्यादा खुश हुआ तो पीछे से डाल दे उनकी जेब में इसके लिए वह पीछे जेब लगाई जाती थी इंग्लैंड और हम भी वही नकल करके वह पीछे जेब और लंबा चोगा और सिर पर टोपा और वो काला काला अभी भी अभी भी य पीछे जेब लगती है हां जो जिनके गाउन होते हैं वो पीछे जेब के लंबे लंबे गाउन पहनते और हमारे यहां तो वैसे भी काला रंग तो गर्म देशों में बिल्कुल वर्जित होना चाहिए आपको मालूम है काला रंग ऊष्मा का शोषक है तो आप जितनी गर्मी में काला कोट पहनेंगे ऊष्मा अंदर ही अंदर गर्मी अंदर की निकल नहीं पाएगी अंदर की गर्मी अंदर ही रहेगी बाहर से गर्मी और अंदर आएगी पसीना पसीना हो जाएंगे और वहां बहस करेंगे कि पसीना पहुंचेंगे आपना और नीचे की अदालतों में तो बहस होती है तो पसी पसीना तर हो जाता है फिर कोर्ट पर वह पसीना गिरता है तो सफेद सफेद हो जाता है और महीनों महीनों आप उसको धो नहीं सकते हैं और उसमें इतनी बदबू आती है कि कोई पास खड़ा हो जाए तो वह परेशान हो जाए ऐसे क्या आप जो है इस गुलामी को ढो रहे हैं हटाइए तो यह कहां से हटेगा बार काउंसिल को आप निवेदन करिए आप जानते हैं इस देश में एक बार काउंसिल है उसको निवेदन करिए कि यह काले कोट को हटाने की बात बहुत पहले तय हो चुकी है एक बार नहीं दो बार नहीं तीन बार नहीं चार बार नहीं बार-बार तय हो चुकी है बार काउंसिल तय कर चुकी है बस अभी हटा रहे हैं अभी हटा रहे हैं अभी हटा रहे हैं अभी हटा रहे हैं और वो आती नहीं निर्णय में तो थोड़ा कोशिश करिए प्रयास करिए दबाव डालिए उनके बीच में चर्चाएं चलाइए और यह अपनी गुलामी तो कम से कम हम हटा दें ढो दें भूषा की गुलामी हटे भाषा की हटे फिर भोजन की गुलामी भी आप अपने जीवन से हटाइए हमारी जिंदगी में अंग्रेज वाला बहुत सारा भोजन हम जबरदस्ती खा रहे हैं जिसको बिना सोचे समझे अब हम डबल रोटी खाते हैं पांव रोटी खाते हैं इंग्लैंड यूरोप के लोग पांव रोटी खाते हैं डबल रोटी खाते हैं क्योंकि उनको रोटी बनाना नहीं आता आपको मालूम है डबल रोटी पाव रोटी उसी वस्तु से बनती है जिससे रोटी बनती है गेहूं होता है ना गेहूं का आटा निकालते हैं आटे को छानती हो तो मैदा बन जाती है उस मैदे में से पाव रोटी बनती है डबल रोटी बनती है बस अंतर इतना है कि मैदे को सड़ाया जाता है और सड़ने के बाद उसमें फर्मेंटेशन की स्थिति आने के बाद उससे बनाया जाता है हम हमारे यहां सड़ते नहीं है क् क्योंकि सड़ा हुआ भोजन करने की भारत में परंपरा नहीं है हम ताजा आटा गंते हैं और तुरंत रोटी बना के खाके खत्म कर लेते हैं उनके यहां आटा सड़ता रहता है सड़ता रहता है घंटों घंटों सड़ता है दिनों दिन सड़ता है सड़ने के बाद फिर उसको उसमें से खमीर जैसे निकलता है फर्मेंट हो जाता है तब जाकर उससे पाव रोटी डबल रोटी बनती है और वो पाव रोटी डबल रोटी तीन-तीन महीने पुरानी सब खाते मैंने अमेरिका का हिसाब निकाला और यूरोप का हिसाब निकाला गेहूं की फसल होकर और किसी फ्लोर मिल में आटा बनने से शुरू होकर आटा बनने से शुरू होकर और डबल रोटी पावर रोटी किसी ग्राहक तक पहुंचने में तीन महीना लग जाता है तो तीन-तीन महीने पुराना उनका वह माल है और उनकी मजबूरी है उनको वही खाना है हमारी कोई मजबूरी नहीं है तो घर में यह डबल रोटी पाव रोटी जैसी सड़े मैदे से बनने वाली चीजें जो अंग्रेज का प्रतीक है इनको हटाइए और अंग्रेज का प्रतीक क्या है सॉस टमाटर की की चटनी ताजा बना के खाइए ना सॉस खाने की क्या जरूरत है उनके यहां ताजा टमाटर मिलता नहीं तो टमाटर की चटनी नहीं बन सकती हमारे यहां तो ताजा टमाटर हर दिन मिलता है हर दिन में दो बार मिलता है सुबह ताजा ले लो शाम ताजा ले लो तो हम घर में ताजा टमाटर की चटनी बनाकर खाए यह सॉस वगैरा की स्थिति में आप अपने घर को ना ले जाएं तो डबल रोटी है पाव रोटी है सॉस है और बेकरी के आइटम है बेकरी के आइटम में एक बहुत बड़ी हमारे यहां बीमारी चल गई है केक हां मिठाई के रूप में हम केक को खाने लगे हैं अब इंग्लैंड और यूरोप में कोई मिठाई बनाने की परंपरा नहीं है इसलिए वह बेचारे केक खाते हैं और केक उनके पास एक और एक ही मिठाई है मजबूरी में खाते हैं हमारे यहां तो दूध की मिठाई है खोवे की मिठाई है और दूध की पयों किस्म की मिठाइयां खोवे की पचा सियों किस्म की बेसन की बचा सियों किस्म की यहां तो मिठाइयों की कोई कमी नहीं है तो ताजा मिठाई बनवा के लाइए केक वगैरह मत लाइए और बच्चों का जन्मदिन मनाते हैं तो अंग्रेजी परंपरा से मत मनाइए कहीं से केक ले आए फिर मोमबत्ती ले आए केक के चारों तरफ मोमबत्ती लगाई फिर उसको दिया सलाई से जलाया फिर फूंक मार के बुझाया अगर बुझाना ही था तो जलाया क्यों ना इसलिए जलाया नहीं कि जल्दी मर जाए हे भगवान हमारे बच्चे की जीवन ज्योत जल्दी बुझ जाए इसके जीवन में उजाला नहीं अंधेरा आए हम तो बोलते हैं ना असतो मा सद्गमय तमसो मा अंधकार से भग हमें भगवान हमको प्रकाश की ओर ले चलो और ये जन्मदिन मना के बोलते हैं कि हे भगवान हमें प्रकाश से अंधेरे में धकेल दो जीवन जोत जो जल रही है बुझाए उल्टे उल्टे काम करते हैं और वो 12 बजे मनाते हो 12 बजे वा 12 बजे का यह जो आप कर रहे हैं बच्चों का जन्मदिन मनाने के लिए केक लाना फिर मोमबत्ती आज से ही बंद कर दीजिए मन में संकल्प ले लीजिए कि हमारे घर के बच्चों के भाई बहनों के जन्मदिन तो हम नहीं मनाएंगे और ये 12 बजे वाले भी खतरनाक है यह 12 बजे पता है कैसे मनाते हैं जब हिंदुस्तान में जब हिंदुस्तान में सुबह के 530 बजे होते हैं तब यूरोप में इंग्लैंड में खास करके कितने बजे होते हैं 12 बजते 12 बजते हैं यह वहां का समय है तब हिंदुस्तान वालों ने जब कहा सुबह हो गई तो उन्होंने अंग्रेजों ने सब्जा सुबह हो गई क्योंकि वहा आठन महीने तो सूरज उगता ही नहीं तो वह हमसे एक चीज उनको पता लगी कि सुबह कब होती है तो उन्होंने सोचा कि जब भारत वाले बोले तभी सुबह होती है तो उन्हो ने हमारी सुबह रात को 12:00 बजे मान के 12:00 बजे काम करने शुरू कर दिए और हिंदुस्तान ने कहा वो 12:00 बजे मनाते अपने को भी 12:00 बजे ही मनाना है ये ये ये ये उल्टा काम शुरू हो चुका है जन्मदिन मनाए शादी के वर्ष घठ मनाए 12 बजे मैंने कहा क्यों बोले सुबह होती है मैंने कहा सुबह नहीं होती तो रात होती है तो मैंने ये ये बहुत उल्टा काम प्रचलन माने य हमारे यहां 5:30 बजे हम दिन का सुबह मनाए उस समय अपना जन्मदिन और हवन करके शुरू करें अपनी सारी चीजें वो तो बात समझ में आती है हमारे यहां बजे 5:30 वहां बजे 12 उन्होंने 12 बजे मनाना शुरू कर दिया हमने 12 बजे जन्मदिन बनाना शुरू कर दिया यह बड़े घरों में रोज हो रहा है य खाड़ा और एक बड़ी बीमारी आ गई है अपने समाज में रात को 12 बजे शादियां कर रहे हैं शादी जैसा पवित्र काम शादी जैसा उत्साह देने वाला काम शादी जैसा परिवार को बढ़ाने वाला काम समाज में आपकी स्थापना कराने वाला काम सब कुछ आप में ने की व्यवस्था करने वाला काम सबसे अच्छे समय पर होना चाहिए रात को 910 बजे बारात बैंड बाजे लेकर घोड़ घोड़ घोड़ घड़ वो चलते हैं और रात को 12 बजे उनकी शादियां होती है और ब कैसे कैसे मूर्ख लोग हैं ब्रास बैंड लेकर चलते हैं आप जानते हैं शादियों में आगे वो बैंड पार्टी चलती है ना क्या कहते हैं उसको ब्रास बैंड कहते हैं ना बी आर ए डल एस ब्रास और बी यह ब्रास बैंड पता है क्या होता है इंग्लैंड की फौज जब किसी पर हमला करने के लिए जाती थी तो उसके साथ आगे ब्रास बैंड चलता था अंग्रेजों की फौज जब किसी दुश्मन पर हमला करने जाएगी तो ब्रास बैंड आगे चलेगा पता क्यों चलेगा वह कहते हैं कि इससे सिपाही जागृत अवस्था में रहे इतना तेज पीटते रहो तो कानों में उनके शोर शोर शोर शोर वह सो ना जाए आलस्य में ना आ जाए तंद्रा में ना आ जाए कभी भी ढीले ना पड़ जाए कहीं पर खड़े ना रह जाए इसके लिए उनके पांव में कदम ताल के ब्रास बैंड चलाने की परंपरा है और हम मूर्खों के मूर्ख शादियां करने के लिए ब्रास बैंड को आगे लेकर ढम ढम ढम डम कान फोड़ फोड़ के अपना सत्यानाश पड़ोसियों का सत्यानाश नहीं लड़की वाले पर चढ़ाई कर रहे हैं ना उसका सब कुछ लूट के लाएंगे दहेज में बोरिए बिस्तर अच्छा इतने इतने ज्यादा हम लोग भिखारी है अपने घर में बिस्तर भी नहीं होते लड़की वाले के घर से बिस्तर लाएंगे लड़की वाले के घर से ही डबल बेड लेके आएंगे लड़की वाले के घर से ही कपड़े लेके आएंगे उसके घर से खाने पीने का बर्तन लेके आएंगे इतने भिख मंगे हैं हम लोग वो वो ठीक बजाते ब्रस में वो उसका घर लूट के लेके आते हैं मेरी मेरी आपको हाथ जोड़कर विनती है कि जो शादियां करने वाले यहां कार्यकर्ता बैठे हैं जिनको नहीं करनी है वो तो बहुत अच्छे हैं उनके लिए जिंदाबाद जिनको करनी है उनके बैंड नहीं बज तो आप बैंड मत बजवाना आपने शादी में और जिन्होंने कर लिया गलती हो गई वह प्रायश्चित कर लेना और प्रायश्चित का एक ही तरीका है कि जब किसी दूसरे की शादियों में आप जाएं बारात में शामिल हो तो कम से कम कहना भैया यह ब्रास बेंट नहीं बजाया जाता यह तो इंग्लैंड में हमला करने के लिए जब आर्मी चलती थी उसके आगे-आगे इसको चलाने की परंपरा है हम किसी पर हमला करने नहीं जा रहे हैं हम किसी को लूटने नहीं जा रहे दूसरे से रिश्ता जोड़ने जा रहे हैं अपना कान फोड़ो पड़ोसियों का कान फोड़ो सड़क पर खड़े हुए और इतना गंदा बचता है इतना बेस्वाद होता है इतना बेडौल होता है कि उसकी क्या बात करें इसलिए राजीव भाई ने बजवा नहीं ये जिसके बैड बजते हैं ना फिर जिंदगी भर बैडी बजते हैं तो अपने जीवन से थोड़ा भाषा की गुलामी निकालें भूषा की गुलामी निकालें व्यवहार की गुलामी निकालें भोजन की गुलामी निकालें और एक गुलामी और है अंग्रेज की भेषज की गुलामी औषधियों की गुलामी जरा जरा सी बात में हम भाग जाते हैं किसी डॉक्टर के पास जुकाम की दवा ले लो कोल्डरिन सर्दी की दवा ले लो एस्पिरिन सिर दर्द की दवा ले लो डिस्प्रिन तो नो वालजन तो स्टेप्टो माइसिन पैरा सिटामोल ये सब विदेशी दवाएं क्यों आप बार-बार खाते हैं आपको तो बंदी करना पड़ेगा आप तो भारत स्वाभिमान के साथ जुड़े हैं पतंजलि योग पीठ के साथ जुड़े हैं तो पहला तो आपको बीमार होना ही नहीं है किसी भी स्थिति में हमेशा स्वस्थ रहना है हर दिन आप योग करेंगे प्राणायाम करेंगे स्वस्थ तो रहेंगे ही दूसरों को भी स्वस्थ बनाना जो गलती से कभी हो जाए कोई थोड़ी बहुत बीमारी तो आयुर्वेदिक दवाओं का ही उपयोग करना है आपको अपने जीवन में और विशेष रूप से जो घरेलू दवाएं हैं जो रसोई घर में है उनका उपयोग करना आचार्य बालकृष्ण जी रोज बताते हैं टेलीविजन चैनल पर उन दवाओं की सूची बनाकर आप रखिए और यहां पर जड़ीबूटी रहस्य करके पुस्तक छप चुकी है उसमें सारी विस्तार से जानकारी है तो आपके जीवन में दवाओं की गुलामी खत्म होई जानी चाहिए भाषा की भूषा की भोजन की भेषज की दवाओं की यह सारी गुलामी खत्म हो और कुछ नियमों की गुलामी भी खत्म करिए जिनमें से एक नियम अभी थोड़ी देर पहले बताया कि रात के 12 बजे हर शुभ काम शुरू करने की हमने जो गलत परंपरा डाली है यह अंग्रेजी नियम है यह भारतीय नियम नहीं है हमारे यहां ब्रह्म मुहूर्त से दिन शुरू होता है और ब्रह्म मुहूर्त में सारे नए काम करने की परंपरा होती है सुबह या शाम संध्या गोधूली बेला होती है जिसमें शाम हो रही है और रात आ रही है दोनों के बीच का समय है सबसे उत्तम समय माना जाता है तो ऐसे समय पर अपने काम करने की परंपराएं डालिए है तो नियम भी उसमें बदलिए अब एक छोटी सी और बात आपसे कहना चाहता हूं कि हमारे यहां गुलामी और किसकिस की है बहुत दिल को चोट पहुंचती है कचोट लगती है जब यह बात मैं कहता हूं कि अंग्रेज आए थे लूट करने मारामारी करने बर्बादी करने हमको पूरी तरह से खत्म करने के लिए और जिन अंग्रेजों ने सबसे ज्यादा यह काम किए हैं उन अंग्रेजों को हम कभी भूलते नहीं मैं सबसे ताजा नाम लेकर कहता हूं एक अंग्रेज आया इस देश में उसका नाम था माउंट बेटन आपको मालूम है माउंट बेटन आया नहीं उसको ब्रिटेन की संसद से बाकायदा भेजा गया ब्रिटेन की संसद ने प्रस्ताव पारित करके माउंट बेटन को भारत का गवर्नर जनरल बनाए और प्रस्ताव पारित करते समय क्या बात लिखी गई उसमें कि भारत में सत्ता का हस्तांतरण जब होगा तो इससे ज्यादा उपयुक्त कोई व्यक्ति नहीं हो सकता माउंट न से ज्यादा उपयुक्त कोई व्यक्ति नहीं हो सकता इसलिए इसको भेजा जाए कारण क्या है कारण उसके बारे में ब्रिटेन की संसद में यह कहा गया बहुत संकेत में कह रहा हूं ज्यादा स्पष्ट नहीं कह सकता इस बात को कारण यह बताया गया ब्रिटेन की संसद में कि माउंट बेटन की जो पत्नी है एडविना वह भारत के कई नेताओं को संभाल सकती इस पर हसी है मत यह बहुत गंभीर बात शर्म की बात शर्म की बात माउंट बेटन की जो पत्नी है एडविना बटन व भारत के कई नेताओं को संभाल सकती है अब संभालने का अर्थ आप समझ लीजिए वह क्या-क्या कर सकती है तो भारत के कई नेताओं को संभाल सकती है और जिन नेताओं को यह संभाल सकती है वही सबसे ज्यादा टेढ़े हैं भारत में वही सबसे ज्यादा टेढ़े हैं उन्हीं को यह संभाल सकती है इसलिए माउंट बेटन को भारत भेजना बहुत जरूरी है तो ऐसी तय करके माउंट बेटन को भारत भेजा गया आते ही उस आदमी ने आग लगाई आग पता है क्या लगाई जिन्ना को एक तरफ खड़ा किया और जिन्ना को कहना शुरू किया तुम पाकिस्तान की मांग करो ना हम दिलवाए ना तुमको पाकिस्तान माउंट बेटन जिन्ना को बुलाता है और बार-बार कहता है तुम पाकिस्तान की मांग खड़ी करो ना हम दिलवाए तुम्हें पाकिस्तान आपको मालूम है जिन्ना पाकिस्तान नहीं मांग रहा था ना मुसलमान था वो जिन्ना पाकिस्तान नहीं मांग रहा था जिन्ना के नजदीकी मुसलमान पाकिस्तान नहीं मांग रहे थे एक जिन्ना का सहयोगी था एक ही सहयोगी उसका नाम था सोहरा वर्दी उसने कभी कहा था कि हमको पाकिस्तान चाहिए एक सहयोगी था जिन्ना का वो कभी-कभी कह देता था भूल चूक से कि हमको तो पाकिस्तान लेकर रहना है जिन्ना ने पाकिस्तान नहीं मांगा जिन्ना के नजदीकी लोगों ने पाकिस्तान नहीं मांगा और माउंट बेटन ने आकर जिन्ना को इतना इतना चढ़ाया इतना चढ़ाया पाकिस्तान मांगो पाकिस्तान मांगो पाकि घंटों घंटों जिन्ना की माउंट बेटन से मीटिंग होती है और उसमें उसको भड़काया जाता है उसमें वो भड़कता है उसमें जो भड़कता है उसमें और भारत के कांग्रेस के नेताओं को जब मिलता माउंट बेटन तो भारत के कांग्रेसी नेताओं को यह समझाता था कि तुम इन मुसलमानों को कहां सिर पर ढो ग यह तुम्हारे लिए खाट खड़ी कर देंगे ऐसा कर देंगे वैसा कर देंगे तुम्हारी परंपरा इनसे अलग है इनकी परंपरा तुमसे अलग है तो कांग्रेसी नेताओं को इस तरह से भड़काता था माउंट बेटन भड़काने वाला गवर्नर जनरल इस देश में आया और भड़का भड़का भड़का भड़का और उसकी पत्नी का भारत के नेताओं के लिए इस्तेमाल करते करते उसने इस देश के दो टुकड़े करा दिए अंतिम समय तक इस देश के दो टुकड़े होने की स्थिति नहीं थी अंतिम समय की बात कर रहा हूं मैं 1946 की बात कर रहा हूं 1946 तक यहां पर सहमति बन रही थी कि नेहरू जी प्राइम मिनिस्टर हो जाएंगे जिन्ना डिप्टी प्राइम मिनिस्टर हो जाएगा पाकिस्तान अलग नहीं करना पड़ेगा भारत में ही सब मिलकर रहेंगे भारत का बड़ा हिस्सा बन जाएगा और जरूरत पड़ी तो राज्यों में अधिराज्य बनाए जाएंगे छोटे राज्य बनाए जाएंगे और छोटे राज्यों को संघ बना के उनके ऊपर शासन अवस्था में अनुकूलता लाई जाएगी यहां तक सब तय हो गया जब तय हो गया कि एक प्राइम मिनिस्टर एक डिप्टी प्राइम मिनिस्टर फिर भड़का दिया इसने माउंट बिटेन और उसकी पत्नी ने भड़का दिया एडविना ने भड़का दिया और वह भड़क इतनी दूर तक गई कि एक इतना खराब स्टेटमेंट हमारे देश के पंडित नेहरू ने कर दिया जिसने देश के दो टुकड़े करा दिए स्टेटमेंट यह था कि मैं जिन्ना को मेरे मंत्रिमंडल में चपरासी भी नहीं बना सकता उप प्रधानमंत्री बनाना तो दूर की बात है अब उप प्रधानमंत्री बनाना दूर की बात है चपरासी नहीं बना सकता तो माउंट बेटन ने जिन्ना को व स्टेटमेंट पढ़ा के कहा देखो नेहरू तुम्हारी इतनी इज्जत करता है तुम्हें चपरासी नहीं बना सकता फिर जिन्ना को एकदम तमतमा हट आ गई गुस्सा आया और उसको लगा कि उसका अपमान हो रहा है तो उसने कहा अब तो मैं दूसरे देश का प्रधानमंत्री बनके ही दिखाऊंगा और उस जिद्द में अंग्रेजों का आग में घी डालना भारत के नेताओं को भड़काना और फिर इस तरह का स्टेटमेंट आ जाना उसने इस देश के दो टुकड़े करा दिए और दो टुकड़े होने के लिए कानून बनवा दिया और मुझे दुख है उस कानून का नाम रखा इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट कोई कानून नहीं है एक देश के दो टुकड़े करने वाला कानून है पाकिस्तान अलग बनेगा भारत अलग बनेगा दोनों मिलकर कॉमनवेल्थ में एक मेंबर कंट्री की तरह से एंट्री करेंगे यह इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट में तो जिस आदमी ने यह सारा खेल कराया माउंट बेटन ने उस माउंट बेटन के बारे में आजादी मिलने के बाद क्या होना चाहिए था पूरे देश के बंटवारे का जिम्मेदार एक अंग्रेज अधिकारी माउंट बेटन उसकी धर्मपत्नी और पूरी अंग्रेज व्यवस्था उनकी ब्रिटेन की संसद जिसने हमारे अखंड देश को खंड खंड तोड़ा बांट दिया उस माउंट बेटन के पत्र उसके फोटोग्राफ उसकी स्मरण की हुई चीजें अगर हिंदुस्तान में सजाकर रखी जाए तो आपका खून नहीं खोलेगा आपको गुस्सा नहीं आना चाहिए हमारे खंड अखंड देश को बांट दिया और बांटा ही नहीं कतले आम मचवा दिया इस देश में आपको मालूम है दुनिया के किसी भी देश में डेढ़ वर्षों में इतना बड़ा कत्लेआम नहीं हुआ जो भारत में हुआ 1946 अगस्त से शुरू होकर 1947 दिसंबर तक चला लाखों लाखों लोग कत्ल किए गए इस देश में यहां हिंदुस्तान में कत्ल किए गए उधर पाकिस्तान में कत्ल किए गए और कत्लेआम मचा वो एक तरफ है लाखों लोगों का लाखों लोग शरणार्थी हो गए जिंदगी भर के लिए लाखों लोगों को पाकिस्तान छोड़कर भारत में आना पड़ा और भारत के बहुत सारे लोगों को छोड़कर पाकिस्तान में जाना पड़ा आपको मालूम है व शरणार्थी आज तक इस देश में अलग-अलग शहरों में अलग-अलग कॉलोनियां बसाकर रह रहे हैं जिनका घर हमेशा के लिए छूट गया संपत्तियां हमेशा के लिए छूट गई रिश्ते हमेशा के लिए बट गए उनके परिवार हमेशा के लिए बट गए लाखों लोगों ने कत्लेआम सहा है मां बहन बेटियों के साथ जो बलात्कार हुए हैं वह पूरी दुनिया में किसी देश में उदाहरण नहीं मिलता जो उन दिनों में हुए एक दूसरे की गर्दन काटी हैं एक दूसरे के सिर काटे हैं इतनी हैवानियत भरी वह समय की तारीख है और जिस व्यक्ति के कारण यह सारा का सारा हुआ मुझे बहुत दुख है और अफसोस है कि वह माउंट बेटन के चित्र आज भी हिंदुस्तान में जगह-जगह लगे हुए हैं हमारे देश में इस पर ताली बजाने की बात नहीं उसके चित्र लगे हुए हमारे देश में जगह-जगह उसके चित्र लगे हुए हैं भारत देश की संवैधानिक शीर्ष संस्थाएं उनमें माउंट बेटन के चित्र लगे हुए हैं हमारे देश के आर्काइव्स में माउंट बेटन के चित्र लगे हुए हमारे देश के म्यूजियम्स में जगह-जगह वह चीजें रखी हुई हैं खून खोला हैं वह सब चीजें हटा देना चाहिए था उनको मिटा देना चाहिए था माउंट बेटन की सारी स्मृति को दिल दिमाग से और इस देश की तारीख में से मिट जाना चाहिए था 15 अगस्त 1947 के बाद हमने नहीं मिटाया वह आज तक जीवित है और हमारी छाती पर मूंग दलते जैसा हमें महसूस कराती है यह गुलामी की निशानी हमें बहुत जल्दी हटानी पड़ेगी एडविना की बहुत सारी निशानियां दिल्ली में है इन सारी निशानियां को हटा के हम बहुत विनम्रता पूर्वक अंग्रेजों को कहेंगे कि एडविना से संबंधित जो कुछ यहां पड़ा हुआ है माउंट बेटन से संबंधित जो कुछ पड़ा हुआ आप इसको या तो मंगा लीजिए हम उनको समय दे सकते हैं और नहीं तो जला के फेंक दीजिए वो याद करने लायक नहीं है वो स्मरण में रखने लायक नहीं है वो स्मृति में दर्ज करने लायक नहीं कोई ये कहे ना कि जिन्ना ने पाकिस्तान बनाया जिन्ना मुसलमान था ही नहीं तो आप कहेंगे क्या था शराब पीता था वो मांस खाता था मांस गाय और मास जो है सूअर का मांस खाता था और स्वामी जी सबसे खराब काम करता था ब्याज पर पैसे देने का जो हराम है इस्लाम में पूरा खानदान जिन्ना का ब्याज पर पैसे चलाकर अपनी जीवन चलाने वाला खानदान था ब्याज पर पैसे चलाना शराब पीना मांस खाना और वह मांस खाना जो इस्लाम में वर्जित है वह सब और नमाज पढ़ना नहीं कभी हम तो मानते हैं ना पक्का नमाजी है तभी तो मुसलमान होगा पांच वक्त की जो नमाज नहीं पढ़े वह मुसलमान कैसा व अपने अल्लाह को याद ना करे वह मुसलमान कैसा और आपको एक और बात बताता हूं हिंदुस्तान के मुसलमानों का नेता नहीं रहा कभी भी जिन्ना इस देश के मुसलमानों ने कभी भी अपना नेता नहीं माना जिन्ना को पाकिस्तानियों ने भी नहीं माना हां और कभी भी पाकिस्तान जिन्होंने नहीं मांगा उनको जबरदस्ती दे दिया यह जो सिंध का इलाका है ना यह जो पंजाब का इलाका है सिंध पंजाब पूरा प्रांत और यह बलूचिस्तान पूरा जिसको फ्रंटियर प्रोविंस कहते हैं इन्होंने कभी भी सपने में भी पाकिस्तान नहीं मांगा एक खतरनाक अंग्रेज ने जबरदस्ती उनको पाकिस्तान दे दिया उस अंग्रेज का नाम था रेड क्लिफ इसी का सहयोगी था माउंट बेटन का रेडक्लिफ को भेजा गया ब्रिटिश पार्लियामेंट से यह कह के आप जाओ और आपकी मर्जी से भारत और पाकिस्तान के बीच में सीमा रेखा खींच दो आपकी मर्जी से सुनिए शब्द को ध्यान से ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव हुआ रेडक्लिफ को कहा गया कि आप जाओ आपकी मर्जी से भारत पाकिस्तान की बीच में लाइन खींच दो आ गया और उसने भारत के नेताओं को दो चार पाच को संपर्क किया भाई मुझे यह काम मिला है मुझे रेखा खींचनी है बंटवारा करना है यह भारत की सीमा यह पाकिस्तान की सीमा तो लोगों ने विरोध किया कि भाई तुम ऐसे कैसे लाइन खींच सकते हो तुम होते कौन हो यह तय करने वाले कि यह भारत की सीमा यह पाकिस्तान की सीमा उसने कहा मेरे मेरी अथॉरिटी है ब्रिटिश पार्लियामेंट ने मुझे कहा है तो भारत के लोगों ने कहा कि ब्रिटिश पार्लियामेंट की हम नहीं मानते और हम तो अब आजाद हो रहे हैं आजाद होने के बाद हम तय कर लेंगे कि कौन सा इलाका भारत का कौन सा पाकिस्तान का तुम जाओ तुम्हारी हमें जरूरत नहीं है तो माउंट बेटन की शह पाकर उसकी मदद लेकर रेडक्लिफ ने अपनी मर्जी से मनमाने तरीके से एक लाइन खींच दी वही हमारे देश की सीमा रेखा हो गई और दुर्भाग्य से उसको रेड क्लिफ लाइन ही कहते नाम भी वही पड़ गया भारत और पाकिस्तान की जो सीमा रेखा है ना उसका नाम है रेड क्लिफ लाइन और दस्त दस्तावेजों में रेड क्लिफ लाइन ही दर्ज है भारत पाकिस्तान सीमा रेखा वह रेडक्लिफ से हमारा कोई संबंध नहीं हो सकता उससे हमारे कोई रिश्ते नहीं बन सकते वह तो हमारे लिए खतरनाक शैतान के जैसा आदमी था जिसने हमारे और पाकिस्तान के बीच में मनमानी से रेखा खींच दी उसका नाम हिंदुस्तान में जगह-जगह लिखा हुआ है स्मरण पत्रं पर पत्र के अलावा फोटो के रूप में बहुत सारी गैलरीज है इस देश में जहां-जहां मैं गया हूं म्यूजियम की गैलरीज है जहां रेडक्लिफ का फोटो है माउंट बटन का फोटो है एडविना का फोटो है यह सब आग लगाते हैं दिल में क्योंकि यही हमारे देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार हैं और यही हमारी सीमा रेखा तय और जगह-जगह ऐसी सीमा रेखा तय कर दी इस रेडक्लिफ ने कि झगड़े हमेशा होते ही रहे और झगड़े कभी खत्म ना हो ऐसे ही एक दो और बातें कहना चाहता हूं इस गुलामी की हमारे देश में बहुत बुरी हमारे हिंदुस्तान में 1492 में एक यूरोपियन व्यक्ति आया जिसका नाम था वास्को डिगामा और वास्को डिगामा ने आके भर पूर लूट की है इस देश में दस्तावेज इसके उपलब्ध हैं कि वास्को डिगामा आया पहली बार में 14 जहाज भर के सोने चांदी हीरे जवार मोती पन्ने माणिक सब भर के ले गया इस देश में से पहली बार आया केरल में आया कालीकट में 20 मई 1492 को तो वहां उतरा समुद्र तट पर तो समुद्र तट पर उतरा और वहां से उसने लूटपाट शुरू की वो लूटपाट बढ़ते बढ़ते 450 साल की गुलामी में बदल ग आपको मालूम है वास्को डिगा के पीछे पीछे बहुत सारे पुर्तगाली आए और 450 साल भारत को लूटते रहे पूरे केरल को लूटा पूरे गोवा को लूटा और गोवा को 450 साल गुलाम बनाकर रखा पुर्तगालियों ने यह आप सब जानते हैं और गोवा भारत की आजादी के बाद में आजाद हुआ भारत तो आजाद हो गया अंग्रेजों की गुलामी से 1947 में उसके भी दसियों साल बाद गोवा आजाद हुआ पुर्तगालियों की गुलामी से अब जिस डिगामा ने इस देश की लूट की और जिसने इस देश में पुर्तगालियों का साम्राज्य बनाया और इस देश के एक इलाके को 450 साल तक गुलाम बनवाया उसके नाम पर हमारे देश में एक पूरा शहर बसा हुआ है उसका नाम है वास्कोडिगामा यहां कोई गोवा से आए हैं गोवा आपको मालूम है वास्कोडिगामा आप गोवा की असेंबली में और गोवा की वास्कोडिगामा की म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में एक प्रस्ताव पारित कराइए कि इस गुलामी के नाम को हम कब तक ढो एंगे आजादी मिले हुए इतने साल हो गए अभी भी वास्कोडिगामा के नाम पर हमारा शहर क्यों होना चाहिए कौन सा ऐसा उसने पुण्य का काम किया या दया का या प्रेम का या करुणा का काम किया जिसके लिए हम वास्कोडिगामा को याद करें लुटेरा आदमी था मारा पीटा है जबरदस्ती लोगों को ईसाई बनाया है अगर वह कहानी मैं सुनाने लगूं कि वास्को डिगामा ने कैसे ईसाई बनाया गोवा के लोगों के ऊपर इतने अत्याचार हुए हैं यह गोवा वाले ढूंढे अपने इतिहास में नाखून खिंचवा लिए हैं उसने उन लोगों के जो ईसाई नहीं बने पैर के नाखून खिंचवा लिए हाथ के नाखून खिंचवा लिए उंगलियों को लोहे के चिमटे में दबा दबा के निचोड़ वा दिया है सारा खून अगर कोई ईसाई नहीं बना जिसने धर्म नहीं बदला इतने अत्याचार किए वास्को सिर गर्दन से कटवा दिए जिन्होंने धर्म बदलने से मना कर दिया अपना इतने बड़े पैमाने पर हैवानियत मचाई है वास्कोडिगामा और उसके सहयोगियों ने उस उसके नाम पर आज पूरा शहर बसा रहे और रोज हमें उसका नाम लेना पड़े और दिल्ली से तो ट्रेन चलती है उसका नाम ही वास्कोडिगामा एक्सप्रेस रख दिया है व ट्रेन का नाम भी उस गुलामी के नाम पर चल रहा है ऐसा ही एक अंग्रेज था हिंदुस्तान पर जिसने बहुत अत्याचार किए हैं जिसको कभी याद करना भी हम सपने में भी याद करना अच्छा नहीं मानेंगे उसका नाम था डलहौजी आपको मालूम है डलहौजी ने सबसे खराब काम इस देश में किया कि ू हिंदुस्तान के करोड़ों किसानों को भूमिहीन बना दिया डलहौजी के पहले इस देश में एक भी किसान भूमिहीन नहीं था यह अंग्रेजों के ही दस्तावेज बताते हैं अंग्रेजों के दस्तावेज कहते हैं कि डलहौजी के आने के पहले भारत के हर किसान के पास कम से कम 10 एकड़ जमीन थी कम से कम 10 एकड़ जमीन थी कम से कम 10 एकड़ जमीन इसको ध्यान से सुनिए एक भी किसान भूमिहीन नहीं था और बहुत सारे किसानों के पास 100 एकड़ थी 500 एकड़ थी 1000 एकड़ थी लेकिन कम से कम 10 एकड़ तो हर किसान के पास थी डलोजी ने क्या किया एक कानून लाया उसका नाम है लैंड एक्यूजेशन एक्ट जमीन को छीन लेने का कानून उस कानून को लागू कराया और उस कानून के लागू होते ही करोड़ों किसानों की जमीने छीनकर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की जमीन हो गई डलहौजी पता है क्या करता था अदालतें लगाता था एक शहर में चला गया या एक गांव में चला गया गांव के नागरिकों को बुलाता था इकट्ठा और उनसे कहता था कि यह जमीन तुम्हारी है इसको सिद्ध करो तो लोग कहते थे कि यह हमारे पिताजी ने दी है पिताजी के पिताजी ने दी है पिताजी के पिताजी ने दी है कहता था कागज दिखाओ इसका अब हिंदुस्तान में कागज पर कोई प्रमाण नहीं लिखने की परंपरा है हमारे यहां कोई भी कागज पर प्रमाण नहीं लिखा जाता हमारे यहां तो वचन का महत्व ही बहुत है तो वो कहते थे हमारे यहां तो परंपरा से तो वो कहता मैं परंपरा नहीं मानता तुम्हारी जमीन मेरी हो गई एक एक दिन में 2525 हजार किसानों से जमीने छीनी जिस डलहौजी ने करोड़ों किसानों को भूमिहीन बना दिया उस डलहौजी के नाम पर इस देश में एक शहर बसा हुआ है बहुत शर्म आती है बहुत अफसोस होता है और उस शहर में हमारे लोग मजा करने के लिए जाते हैं हनीमून मनाने के लिए जाते हैं मौज करने के लिए जाते हैं मालूम है डलहौजी नाम का शहर है इसी देश का अंग है हिमाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड या हमारा जो पंजाब है उसके बॉर्डर पर तो हिमाचल और पंजाब के बॉर्डर पर यह डलहौजी शहर खून खलाता है हमारा जिस डलहौजी ने हिंदुस्तान के करोड़ों किसानों को भूमन बनाया हो जिसने जमीनें छीनी हो किसानों पर अत्याचार किए हो एक-एक दिन में 2525 हजार किसान भूमिन किए हो उस आदमी के नाम पर शहर क्यों होना चाहिए इस देश में उस शहर का नाम क्यों नहीं बदल देना चाहिए हमारे पास कोई नामों की कमी है याज्ञवल्क्य हो सकता है विश्वामित्र शहर हो सकता है कोई नाम से शहर हो सकता है हिमाचल प्रदेश के किसी ऋषि मुनि के नाम से वोह शहर बसाया जा सकता है डलहौजी में ऐसे कौन से सदगुण है जो उसके नाम पर व श है इसी तरह से बहुत अफसोस है मुझे और दो तीन बातें आपसे कहना चाहता हूं हिंदुस्तान में दिल्ली है दिल्ली में आप वहां गए हैं इंडिया गेट इंडिया गेट दिल्ली वाले कार्यकर्ता यहां है वोह जानते हैं इंडिया गेट पर आपने एक स्थान देखा है जो खाली है प्लेटफॉर्म बना हुआ वहां पर 1947 में तय हुआ था कि महात्मा गांधी की मूर्ति लगेगी उसके बाद संसद में तीन बार प्रस्ताव हो गया और आजादी के 62 साल के बाद वहां गांधी जी की मूर्ति नहीं लग पाई और पता है वहां मूर्ति पहले लगी हुई थी जॉर्ज की अंग्रेजों के राजा की और फिर बात हुई कि यह तो अब हमें गुलामी की निशानी के रूप में हटा ही देना पड़ेगा तो वह हटाकर गांधी जी की मूर्ति लगानी तो गांधी जी की मूर्ति बनी हुई रखी हुई है उस स्थान पर लगाई नहीं जा सकी क्योंकि अंग्रेज सरकार को मंजूर नहीं है हमारी गुलामी हट जाए यह अभी भी अंग्रेज सरकार को मंजूर नहीं है और भारत सरकार अंग्रेज सरकार से रिश्ते खराब नहीं कर सकती है इसलिए महात्मा गांधी की मूर्ति नहीं लग सकती मैं यह कहता हूं महात्मा गांधी की मत लगाओ भगत सिंह की लगा दो उधम सिंह की लगा दो चंद्रशेखर आजाद की लगा दो भगत सिंह की मूर्ति लगाना वहां बहुत प्रासंगिक है क्योंकि उसी के बगल में संसद है जहां भगत सिंह ने बम फेंका था आपको मालूम है जिसकी सजा उन्होंने खाई थी और फांसी पाई थी तो भगत सिंह की मूर्ति लगा दो क्या तकलीफ है बहुत लोग कहते हैं गांधी जी की मूर्ति पर विवाद है भगत सिंह की मूर्ति पर विवाद क्या होगा कोई भगत सिंह को नहीं मानता हो ऐसा कौन है इस देश में जो उनकी शहादत को सलाम नहीं करता हो 23 साल की उम्र में जो लड़का फांसी के फंदे पर चढ़ गया आप में से कितने लोग हैं जिनकी उम्र 23 साल से अभी ज्यादा हो गई होगी और वह 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे पर चढ़ गया और एक ऐसा नौजवान फांसी के फंदे पर चढ़ गया जिसकी सगाई होनी शादी होनी सगाई छोड़ शादी छोड़ी और कहना शुरू कर दिया कि मेरी शादी तो हो गई आजादी के साथ मेरी सगाई तो हो गई आजादी के साथ एक ऐसा नौजवान जिसने जिंदगी में बचपन के दिन नहीं देखे कभी आपको मालूम है बचपन में सब हंसते हैं खेलते हैं मुस्कुराते हैं मजा करते हैं और समय पास करते हैं उस नौजवान ने सात आठ साल की उम्र में देश के बारे में सोचना शुरू कर दिया वह कहानी तो आप सब जानते हैं ना खेत में जाकर काम कर रहा है तो मैं बंदूक बो रहा हूं ताकि इसमें से पेड़ उगेगा और उस पेड़ पर सैकड़ों बंदूकें निकलेंगी और उनसे अंग्रेजों को मारूंगा तो ऐसे भगत सिंह की मूर्ति लगाने में क्या तकलीफ है लगा देना चाहिए था इंडिया गेट पर अब तक हो जाना चाहिए था नहीं हुआ उधम सिंह की मूर्ति नहीं लग सकती भगत सिंह की नहीं लग सकती चंद्रशेखर आजाद की नहीं जॉर्ज पंचम की लग सकती है अंग्रेजों की किसी अधिकारी की लग सकती है यह गुलामी की निशानियां हमको हटानी पड़ेगी आज नहीं तो कल हमें इंडिया गेट के बारे में फैसला करना ही पड़ेगा कि इस पर तो हिंदुस्तान के सर्वोच्च स्तर के शीर्ष स्तर के किसी शहीद की क्रांतिकारी की ही मूर्ति लगेगी और तभी यह वास्तव में इंडिया गेट कहलाएगा और इस इंडिया गेट का नाम भी बदलना भारत इंडिया तो हमारा नाम नहीं है हमारा नाम तो भारत है परंपरा से हमारा नाम भारत है इतिहास हमारा भारत के नाम से है परंपराएं हमारी भारत के नाम से हैं मान्य हमारी सारी भारत के नाम से हैं और हम भारत के बारे में अपने खून में अपनी रगों में महसूस करते हैं उसकी संवेदनशीलता को वह इंडिया कैसे हो सकता है संविधान में अंग्रेजों ने लिखवा दिया इंडिया दैट इज भारत यह तो सब मूर्खता की बात है भारत दैट इज इंडिया वो तो समझ में आता है अंग्रेजों के लिए क्योंकि उनको भारत समझ में नहीं आता उनको इंडस वैली सिविलाइजेशन समझ में आती है सिंधु घाटी सभ्यता समझ में नहीं आती तो सिंधु घाटी सभ्यता को इंडस वैली कर दिया उन्होंने अपनी सुविधा के लिए और उस इंडस में से इंडिया बना दिया अपनी सुविधा के लिए अब वह इंडिया को हम क्यों ढो एंगे अपने कंधे पर रखकर उसकी अर्थी को कहां लेकर जाएंगे आजादी के 62 साल में तो हमको यह तय करना ही पड़ेगा कि भारत दैट इज भारत भारत दैट वाज भारत पहले भारत था आज भी भारत है भविष्य में भी भारत रहेगा यह तो गलती से थोड़े दिनों के लिए इंडिया हो गया तो इंडिया भी हमको हटाना और हिंदुस्तान के हर कानून में से इंडिया हटाना की जय हमारे कानून की किताबों में जहां-जहां इंडिया है हर जगह से इंडिया हटाना आपको मालूम है इंडियन इनकम टैक्स एक्ट इंडियन एजुकेशन एक्ट इंडियन सिविल सर्विसेस एक्ट इंडियन फॉरेस्ट एक्ट यह क्या इंडियन इंडियन इंडियन इंडियन इंडिया सारे कानून की किताबों को एक तरफ से फिर से लिखना पड़ेगा जहां-जहां इंडिया है हर जगह भारत आएगा वरना आजादी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा व ना लाखों क्रांतिकारियों की शहादत का कोई मतलब नहीं रह जाता हमें एक दो चीजें और भी करनी पड़ेंगी इस देश में वह बहुत जरूरी है वह यह करनी पड़ेंगी कि भारत में बहुत सारे स्थान है आप में से महाराष्ट्र के कोई कार्यकर्ता आए हो जो मुंबई के रहने वाले हो उनके लिए मैं यह कहना चाहता हूं कि मुंबई सीएसटी रेलवे स्टेशन वह था पहले अंग्रेजों के नाम पर पूरा का पूरा अभी छत्रपति शिवाजी टिनस हुआ यह तो थोड़े दिन से हुआ और वह भी आजादी के 50 साल बाद हुआ पहले वह विक्टोरिया टर्मिनस हुआ करता था अब विक्टोरिया तो अंग्रेजों की रानी है अंग्रेजों की रानी के नाम पर उन्होंने स्टेशन बनाकर रख दिया और वह विक्टोरिया टर्मिनस आजादी के बाद 50 साल तक चलता रहा बहुत शर्म और बहुत अफसोस की बात है एक दिन झटके में आकर महाराष्ट्र विधानसभा ने तय किया कि अब यह विक्टोरिया टर्मिनस नहीं रहेगा यह छत्रपति शिवाजी टर्मिनस हो जाएगा तो मैं उन सब नेता ता का आभारी हूं महाराष्ट्र के उन सब नेताओं को धन्यवाद देता हूं उन सबके साहस की मैं प्रशंसा करता हूं जिन्होंने गुलामी के नाम को हटाया विक्टोरिया टर्मिनस और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस बना लेकिन उन्हीं नेताओं को एक निवेदन और करता हूं कि अभी गुलामी अधूरी है अभी पूरी निशानियां मिटी नहीं है आप जाइए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन पर कितने अंग्रेज अधिकारियों की मूर्तियां वहां लगी हुई है उनको भी हटाना है वैसे ही जैसे विक्टोरिया टर्मिनस हमने हटाया है वहां से अधूरा काम जिन अंग्रेज अधिकारियों ने अत्याचार किए हैं मुंबई पर उनकी मूर्तियां लगी हुई है मुंबई रेलवे स्टेशन पर एक बहुत खतरनाक और बहुत ही तकलीफ देने वाला अंग्रेज हुआ करता था एलफिंस्टन अंग्रेज गवर्नर बन गया मुंबई में आ गया और उसने जो अत्याचार मचाया है जैसे डलहौजी ने जमीन छीनने का काम इधर उत्तर भारत में कि किया वैसे एलफिंस्टन ने पूरे महाराष्ट्र के किसानों की जमीन छीनने का काम किया वो एलफिंस्टन इतना ही अत्याचारी था जितना डलज था उसमें कोई कमी नहीं थी उस एल्फिन स्न की मूर्तियां उस एल्फिन के फोटो अभी भी मुंबई में जगह-जगह पर हैं और उसके नाम पर एक स्टेशन भी है एल्फ इंस्टन रोड उसके नाम पर एक कॉलेज भी है एल्फ इंस्टन कॉलेज तो यह एल्फिन कॉलेज का नाम बदलना है एल्फिन रोड का नाम बदलना है और कम से कम अत्याचारी अंग्रेजों की मूर्तियां तो पूरी तरह से हटा ही देनी है और उन सब स्थानों पर हमें क्रांति वीरों की मूर्तियां लगानी है महाराष्ट्र में क्रांति वीरों की कोई कमी नहीं है जिनकी मूर्तियां वहां नहीं लग सकती हैं आपको मालूम है एक एक से क्रांतिकारी महाराष्ट्र में हुए एक ही एक परिवार के तीनों के तीनों भाई चाफक और बंधु एक साथ हिंदुस्तान की क्रांति के लिए निकल पड़े ऐसे ऐसे परिवार महाराष्ट्र में हुए हिंदुस्तान में किसी से यह पूछो कि एक ही परिवार के तीन प्रधानमंत्री फट से बता देगा और उसी को पूछ लो कि एक ही परिवार के तीन बेटे तीनों फांसी पर चढ़ गए हो ऐसा परिवार बता दो गिने चुने लोगों को मालूम है चाफेकर बंधु तो चाफेकर बंधुओं की मूर्तियां होनी चाहिए वहां पर जहां मुंबई सीएसटी पर अंग्रेज अधिकारियों की मूर्तियां लगी हुई हैं हमारे देश में महाराष्ट्र ने क्रांतिकारियों के लिए परंपरा पैदा की है इस देश की आजादी का इतिहास उन मराठी वीरों के लिए हमेशा कृतज्ञ रहेगा जिन्होंने 1857 की क्रांति की सूत्रपात की इस देश में नाना साहब पेशवा आप जानते हैं मूलत मराठी थे क्योंकि अंग्रेजों ने उनके परिवार को मार के भगा दिया था पुणे से तो वह आके रहने लगे थे कानपुर के पास बिठूर में वो नाना साहब पेशवा थे जिन्होंने क्रांति सूत्र इस देश में दिया जिन्होंने संगठन खड़ा किया जिन्होंने अंग्रेजों से आजादी छीन के लेनी है यह भारतवासियों को समझाया और उनके दाएं बाएं तात्या टोपे वो मराठी थे नाना साहब पेशवा मराठी थे चाफक और बंधु मराठी थे और हमारे देश में एक दो नहीं सैकड़ों सैकड़ों नाम है उन सब क्रांतिकारियों की मूर्तियां होनी चाहिए मुंबई सीएसटी स्टेशन पर यह अभियान हमें चलाना है भारत स्वाभिमान की तरफ से चलाना है और इस अभियान में सारी राजनीतिक पार्टियों को शामिल [प्रशंसा] कराना इसके साथ और एक काम करना है अपने महाराष्ट्र के कार्यकर्ताओं को चर्च गेट का नाम बदलना यह चर्च गेट का नाम हमारा नहीं है अंग्रेजों का दिया हुआ नाम है आजादी के 62 साल के बाद चर्च गेट का नाम हम हमारी छाती पर क्यों ढो एंगे चर्च गेट बदलना है वहां की मूर्तियां हटानी है और आप मुंबई महानगरपालिका की बिल्डिंग में कभी भी जाइए तो दरवाजे पर जो सबसे बड़ी मूर्ति है वह सबसे खतरनाक अंग्रेज अधिकारी की मूर्ति है जिसने सैकड़ों नहीं हजारों मां बहन बेटियों के साथ बलात्कार किए और करवाए उसकी मूर्ति वहां लगी हुई है और बड़े शान से वो खड़ा हुआ है वहां पर हमें किसी दिन उसको हटा देने की बात करनी पड़ेगी उसको समाप्त करने की बात करनी पड़ेगी वहां मूर्ति हो सकती है तो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की होनी चाहिए वहां मूर्ति हो सकती है तो चाफे और बंधुओं की होनी चाहिए वहां मूर्ति हो सकती है तो सावरकर जी की होनी चाहिए अंग्रेज अधिकारी की मूर्ति को आजादी के 62 साल में तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे क्यों करेंगे तो इस तरह से हमें हमारे सारे गुलामी के निशाने हटाने अगर यहां उत्तर प्रदेश कोई लोग आए हो इलाहाबाद में एक इलाका है जो गुलामी का सबसे खतरनाक प्रतीक है चैथम लाइंस है एक एक अंग्रेज अधिकारी हुआ करता था चैथम उसने वहां जाके एक अपनी कोठी बनाई थी और वहां पर कुछ सेना रखना शुरू किया था तब से वोह चैथम लाइंस पड़ गया आजादी के 62 साल के बाद वह चैथम लाइनस इलाहाबाद में चल ही रहा है और भी एक खराब जगह है इलाहाबाद में मोर रोड है वो एक अंग्रेज अधिकारी के नाम पर है सबसे खराब अंग्रेज अधिकारी था मयो जो इलाहाबाद में आया था जिसने हिंदू हिंदुस्तान में आजादी के इतिहास में कालिख पहुंची है वह यह कि इलाहाबाद के जो क्रांतिकारी होते थे ना उनको नीम के पेड़ पर फांसी लटकाकर गोली मारा करता था वोह मेयो अधिकारी था उसके नाम पर मोर रोड है उसके नाम पर मोर कॉलेज है उसके नाम पर मोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्शन बिल्डिंग है रिपन एक खतरनाक अंग्रेज अधिकारी था जिसने पूरे मद्रास की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया एक कानून बना के पूरे मद्रास की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया उस रिपन के नाम पर बिल्डिंग है उस बिल्डिंग में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का ऑफिस चलता है उससे भी ज्यादा खतरनाक एक अंग्रेज था कर्जन जिसने बटवारा किया था बंगाल का हिंदू और मुसलमानों के आधार पर पूर्वी बंगाल पश्चिमी बंगाल पूर्वी बंगाल मुसलमानों का पश्चिमी बंगाल हिंदुओं का हिंदू मुसलमान के आधार पर देश का पहला बंटवारा 1905 में हुआ था और वह नीव रखी थी कर्जन ने जिसका फलीभूत 1947 में हुआ था और वास्तव में बटवारा होगा जिस कर्जन ने हिंदुस्तान को सांप्रदायिक आधार पर बांटा हो हिंदू मुसलमान के संप्रदाय के आधार पर देश के दो टुकड़े किए हो उस कर्जन के नाम पर जगह-जगह बिल्डिंग खड़ी है जगह-जगह सड़क बनी हुई है कर्जन रोड कर्जन बिल्डिंग कर्जन चौराहा यह सब कर्जन के नाम पर कलकाता में बंगाल में और भारत के दूसरे इलाको में ऐसे बहुत स्थान है हमारे देश में और चलते चलते हां चलते चलते कुछ छोटी-छोटी बातें और एक बहुत खराब अंग्रेज अधिकारी था उसका नाम था नील और उसका एक सहयोगी था उसका नाम था व्हीलर दोनों खतरनाक अंग्रेज थे इन्होंने पता है क्या किया हिंदुस्तान में आजादी की लड़ाई शुरू हुई बिठूर नाम के एक गांव से यह कहानी आप सब जानते हैं 1857 का स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास आप पढ़े तो बिठूर नाम का एक छोटा सा गांव है कानपुर के पास है 242 किलोमीटर की दूरी है उस गांव में सबसे पहली बैठक हुई थी जिसमें यह तय हुआ था कि हमको आजादी हासिल करनी है अंग्रेज जाएंगे नहीं इनको भगाना पड़ेगा आजादी आएगी नहीं छीन के लाना पड़ेगा मांगने से कोई आजादी नहीं देगा हमें छीन पड़ेगी हमारी आजादी यह तय हुआ वो बैठक सबसे पहले तय हुई जिसकी अध्यक्षता की थी नाना साहब पेशवा तात्या टोपे उस बैठक में हाजिर थे और उनके कुछ सहयोगी हाजिर थे फिर वह बैठक धीरे-धीरे बढ़ती गई और एक दिन लाखों क्रांतिकारियों का संगठन बन गई और बिठूर ने हिंदुस्तान को रास्ता दिखाया बिठूर ने हिंदुस्तान को आजादी का इतिहास शुरू करवाया बिठूर से क्रांति की शुरुआत की नीव पड़ी और पूरे देश में वह फैली और वह फिर चिंगारी उठी तो बैरकपुर से नीव डाली गई वह बिठूर में बिठूर में नीव पड़ी चिंगारी बैरक में उठी मंगल पांडे ने एक अंग्रेज अधिकारी को गोली मारी उसका नाम था मेजर हूसन हूसन को अंग्रेज गोली क्यों मारी जब मंगल पांडे को यह पता चला कि कारतूस का इस्तेमाल करना पड़ता है मुंह से उसको खोलना पड़ता है उस परे गाय की चर्बी लगाई जाती है और गाय हमारे लिए मां जैसी है कोई हमारी मां की हत्या करे फिर उसकी चर्बी लगाया हुआ कारतूस मुंह से खोलना पड़े तो यह तो शर्म से डूब मरने की बात है इसलिए मंगल पांडे ने अपने अधिकारी को एक प्रश्न किया कि क्या कारतूस पर गाय की चर्बी लेपन किया जाती है वो हूसन ने ना हां कहा ना ना कहा और वह डिप्लोमेटिक आदमी था हां कहता तो फसता ना कहता तो फसता तो चुप रह गया फिर पूछा मंगल पांडे ने क्या ऐसा होता है फिर पूछा तीन बार में उसने जवाब नहीं दिया तो मंगल पांडे को गुस्सा आया उनके पास उनकी सर्विस राइफल थी गोली मार दी हूसन ढेर हो गया उसी समय मर गया हूसन मर गया तो दूसरे अधिकारी आए मंगल पांडे को को पकड़ने के लिए तो फिर मंगल पांडे ने गोली चलाई उसमें तीन घायल हो गए दो फिर मारे गए और बाद में मंगल पांडे पकड़ में आ गए फिर उनके ऊपर झूठ मूठ का मुकदमा चला और उनको फांसी हो गई 8 अप्रैल को तो यह चिनगारी उठी बैरकपुर से वहां से क्रांतिकारियों ने क्या किया जो उनके सहयोगी थे मंगल पांडे के जो फौज में काम करते थे ऐसे 1100 सैनिकों ने तुरंत इस्तीफा दे दिया और जंग अंजलि में गंगाजल भर के कसम खाई उन्होंने आप जानते हैं बिठूर के बहुत नजदीक में गंगा जी बहती है तो सारे सैनिक छावनी छोड़कर इस्तीफा देकर अंग्रेजी पोशाक को जलाकर गंगा जी के किनारे पहुंचे गंगा जी की गंगाजल हाथ में अंजलि लेकर कसम खाई कि अब इस देश में हम वही करेंगे जो मंगल पांडे ने किया है और हम गांव-गांव में यह चिंगारी जलाए पांच पांच के ग्रुप में फैल गए पूरे देश में और पूरे देश में क्रांति की मशाल उत्तर से दक्षिण पूरब से पश्चिम मेरठ दिल्ली सहारनपुर सजापुर हर जगह फैल गई साढ़े 300 स्थानों पर क्रांति हुई और अंग्रेजों को तीन महीने में सफाया कर दिया इस देश के क्रांतिकारियों ने भारत के इतिहास में यह दस्तावेजी घटना अभी दर्ज होना बाकी है व यह कि 1857 में जो क्रांति की शुरुआत हुई तीन महीने के अंदर एक-एक अंग्रेज मारा गया और भारत आजाद हो गया 1 सितंबर 1857 तक पूरा भारत आजाद हो गया 350 स्थानों पर भारत की विजय पथाराम में बिठूर की भूमिका बहुत महत्व की है अब हुआ क्या जब हमारी विजय हो गई हम जीत गए और हमारा शासन फिर से वापस आने लगा तो अंग्रेजों की संसद में फिर प्रस्ताव पारित हुआ वापस भारत में जाना है और फिर से भारत पर कब्जा करना है तो यहां के कुछ 20 गद्दार राजाओं ने अंग्रेजों की मदद की सेना मिली उनको अंग्रेजों को भारत के राजाओं की पैसा मिला उनको भारत के राजाओं से और फिर वोह चढ़ बैठे तो सबसे पहली चढ़ाई उन्होंने बिठूर पे की वापस अंग्रेजों ने और यह बात है नवंबर 1 1800 58 के आसपास की तो फिर चढ़ाई हुई बिठूर पर और बिठूर को जड़ मूल से खत्म कर देना है यह अंग्रेजों ने तय किया जिस अंग्रेज अधिकारी ने बिठूर को जड़ मूल से खत्म कर देने की बात तय की उनमें एक नील था एक व्हीलर था और उसके कुछ सहयोगी थे इन्होंने बिठूर पर हमला किया और ऐसा हमला किया कि 24000 लोग बिठूर में रहते थे उस समय बिठूर की आबादी कुल मिलाकर 24000 थी तीन महीने के छोटे बच्चे से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक 24000 लोग रहते थे अंग्रेजों ने सबको खत्म कर दिया तीन महीने के बच्चे को भी नहीं छोड़ा 90 साल के बुजुर्ग को भी नहीं छोड़ा और यह व्हीलर और नील जैसे बहुत दुष्ट किस्म के लोग जो अंग्रेजी फौज में उस समय अधिकारी थे इन्होंने कैसे-कैसे बच्चों को मारा है बच्चों को ऐसे उछाल थे और गोली मारते थे इस तरीके से कत्लेआम मचा बुजुर्गों को गर्दन में रस्सी का फंदा लटका के पेड़ पे लटका देते थे फिर उन को गोली मारते थे पूरे बिठूर का कत्लेआम कर दिया एक एक घर में से सबको निकाल के मार दिया स्त्रियों के साथ बलात्कार किए महिलाओं के साथ बलात्कार किए तो उसका वर्णन मिलता है दस्तावेजों में कि हमारी माताओं के बहनों के बेटियों के स्तन का जो अग्र भाग होता है उसको लोहे के चिमटे से दबाते थे और तब तक दबाते थे जब तक उसमें से खून ना निकल आए इतने हैवान थे ये अंग्रेज और उसके बाद जब वो चीखती थी तड़पती थी चिल्लाती थी फिर उसके कपड़े ते थे फिर सबके सामने बलात्कार होता था और फिर उन महिलाओं का गर्दन काटते थे पहले गर्दन नहीं काटते थे बलात्कार करने के बाद गर्दन काट पूरे बिठूर को शमशान बना दिया लाशों के ढेर से पाट दिया जिन अंग्रेजों ने यह सब किया है उनका नाम अभी तक हम याद रखते हैं मुझे बहुत अफसोस होता है दिल को चोट पहुंचती है जब मैं किसी रेलवे स्टेशन पर खड़ा होता हूं और व्हीलर का नाम पढ़ता हूं आपको मालूम है रेलवे स्टेशन पर एक बुक शॉप रहते हैं व्हीलर्स बुकशॉप यह वही खानदान है जिन्होंने बिठूर में कत्लेआम मचाया जिन्होंने हिंदुस्तान की मां बहन बेटियों को पूरी तरह से खत्म कर दिया व्हीलर्स बुक शॉप नहीं देखते आप रेलवे स्टेशन प यह वही व्हीलर परिवार है आजादी के 62 साल के बाद भी व्हीलर्स बुक शॉप का नाम नहीं बदल पाए हम और माफ करना आपको यह बताने के लिए कि इसकी रॉयल्टी हम देते रहे इंग्लैंड को इस नाम का इस्तेमाल करने की रॉयल्टी देते रहे इंग्लैंड को नील की जगह-जगह मूर्तियां लगी हुई है फोटो लगे हुए हैं नील चौराहे बने हुए हैं नील रोड बने हुए हैं इस देश में व्हीलर्स की बुकशॉप पूरे देश के रेलवे स्टेशन पर है यह गुलामी कब तक ढो एंगे हम किसी ना किसी दिन तो हमको इस गुलामी के फंदे से बाहर निकलना ही पड़ेगा हमारे मन से हमें गुलामी हटानी पड़ेगी सबसे पहले फिर हमारे तन से गुलामी हटानी पड़ेगी हमें सबसे पहले फिर वतन से गुलामी हटानी पड़ेगी हमें सबसे पहले यह जो गुलामी की निशानियां है यह हमारे वतन पर धब्बा है हमारे भारत के नाम पर धब्बा है एक कालिक है हमारे देश पर हमें कई बार ऐसा लगता है कि क्या हमारा शौर्य बिल्कुल खत्म हो गया आजादी के बाद हम उतने शूरवीर ही नहीं रहे जिन अंग्रेजों को हम मार के भगा सकते हैं उन अंग्रेजों के प्रतीकों को हमने इस देश में से क्यों नहीं हटा दिया आजादी के बाद क्या हो गया इस देश को क्यों सो गया यह देश ऐसी शांति की नींद में अभी यह प्रश्न हमें फिर से करने पड़ेंगे कि अंग्रेजों को अगर हम मार के भगा सकते हैं 250 साल की गुलामी को हटा सकते हैं तो यह अंग्रेजी प्रतीक चिन्हों को अभी तक हम क्यों ढो रहे हैं आजादी के 62 साल में इनको तो हटा देने की ही बात है हर जगह से हमको हमारे अंग्रेज को हटाना ही पड़ेगा अंग्रेज को विदा करना ही पड़ेगा मैं बार-बार यह बात कहता हूं जैसे अंग्रेजों को हमने विदा किया है वैसे ही अंग्रेज को इस देश में से हटाना और विदा करना पड़ेगा उसके लिए फिर से हमें तैयारी करनी है फौज बनानी है अपना संगठन खड़ा करना है और यह संगठन बड़ा होना चाहिए मैं तो बोलता हूं कि आजादी के लड़ाई के आंदोलन में जितना बड़ा संगठन खड़ा था उससे बड़ा संगठन हमें बनाना पड़ेगा जानते हैं क्यों बनाना पड़ेगा कि पहले तो अंग्रेज एक देश में से आए हुए लोग थे जो विदेशी थे जिनको हम पहचान सकते थे जिनका रंग हमसे अलग था जिनका चरित्र हमसे अलग था चाल अलग थी चेहरा अलग था देखने से पता चलता था कि यह अंग्रेज है ये दुश्मन है इसको मार सकते हैं इसको हटा सकते हैं खत्म कर सकते हैं लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेज का लबादा जिन्होंने ओढ लिया है वो तो चाल में भी हमारे जैसे चेहरे में भी हमारे जैसे और रंग में भी हमारे जैसे कद काठी में ही हमारे जैसे माने अपने बीच में ही दुश्मन है और अपने भाई ही दुश्मन की तरह से भूमिका में आ गए हैं अभी की लड़ाई थोड़ी मुश्किल है आजादी की लड़ाई थोड़ी आसान थी क्योंकि विदेशी साफ दिखाई देता था आजादी के बाद यह पूर्ण आजादी की लड़ाई पूर्ण स्वतंत्रता की लड़ाई थोड़ी मुश्किल है क्योंकि विदेशी हमारे बीच में बैठा है हमारे नजदीक में है पता नहीं हमारे परिवार में हो पता नहीं हमारे पड़ोस में हो पता नहीं हमारे बिल्कुल साथ में ही हो तो इसलिए लड़ाई थोड़ी मुश्किल है संगठन भी बड़ा करना पड़ेगा आजादी की लड़ाई में आपको मैं बताना चाहता हूं 4 करोड़ करीब 25 लाख और 12 1 हजार लोग शामिल थे 1857 की लड़ाई से शुरू करके 19 4 की लड़ाई तक माने सवा करोड़ हिंदुस्तानियों ने आजादी की लड़ाई लड़ी है और उस समय हमारी आबादी जीथ आबादी थी वह करीब 20 करोड़ की थी इनमें से 7 32000 लोग हमारे शहीद हो गए अंग्रेजों के दस्तावेजों के हिसाब से बात कर रहा हूं अगर हम दस्तावेजों को फिर से ढूंढेंगे और तलाशें तो हो सकता है यह 7 32000 का आंकड़ा और बड़ा हो जाए हो सकता है 10 लाख शहीद निकले हो सकता है 15 लाख शहीद निकले क्योंकि बिठूर की कहानी जब से मैंने पढ़ी दस्तावेजों में एक-एक शहर में 24000 लोगों का कत्लेआम हुआ है तो भारत में ऐसे 350 शहरों पर चढ़ाई की थी अंग्रेजों ने पता नहीं कितने लोग कत्लेआम हुए रिकॉर्ड में उन्होंने उतना ही दिया है 7 32000 हो सकता है इससे ज्यादा निकले तो सवा करोड़ हिंदुस्तानियों ने लड़ाई लड़ी 20 करोड़ की आबादी थी इसका मतलब क्या हुआ 25 प्र समाज 25 प्र देश आजादी के लिए लड़ा तो आज हम देखें 115 करोड़ की आबादी है तो 115 करोड़ की आबादी का 25 प्र निकाले तो लगभग 30 करोड़ के आसपास निकलता है तो संगठन अपने को बड़ा करना ही पड़ेगा और बड़ा संगठन करना पड़ेगा तो बड़ा संकल्प लेना पड़ेगा बड़ा संकल्प लेना पड़ेगा तो बड़े सपने देखने पड़ेंगे और हर बड़ा सपना बड़ी हकीकत बनता है अगर करने वालों का संकल्प बड़ा हो जाए तो आज हम सपना देखेंगे कल वो हकीकत में बदलेगा 1850 में नाना साहब पेशवा ने सपना देखा था कि भारत आजाद होगा और हमको आजादी लानी है 1850 में उन्होंने वह सपना देखा था 1947 में आजादी आई आज हमारे परम पूजनीय स्वामी रामदेव जी सपना देख रहे हैं कि आजादी अधूरी है इसको पूर्ण बनाना है स्वतंत्रता अधूरी है इसको पूरा बनाना है हो सकता है यह सपना फिर साकार हो और हमारे आपके सहयोग के साथ यह सपना आगे बढ़े तो आज हम सपना देखेंगे कल वह हकीकत में बदलेगा सपने को हकीकत में बदलने के लिए संकल्प की ताकत चाहिए और आदर्श हमारा स्थापित होना चाहिए समाज में तो हम एक आदर्श के रूप में समाज के सामने आए हमारे आदर्श क्या हो अंग्रेज की कोई गुलामी की निशानी हमारे तन और वतन पर ना हो हमारे मन पर ना हो और अगर वह गुलामी की निशानी हमने अपने जीवन से हटाई अपने मन से हटाई तो दूसरों के सामने हम आदर्श के रूप में प्रस्तुत हो जाएंगे फिर दूसरे हम जो कहेंगे उस रास्ते पर चलने को तैयार हो जाएंगे इस देश के लोगों की सबसे बड़ी विशेषता है वो यह है कि जब जब तक भारत के लोग सोते रहते हैं सोते रहते हैं सोते रहते हैं सोते रहते हैं लेकिन एक बार मदमस्त हाथी की तरह से खड़े हो गए तो सबको रौद हुए चले जाते हैं बड़े-बड़े साम्राज्य इस देश ने ढा दिए हैं सिकंदर के बारे में आप सब जानते हैं आधी से ज्यादा दुनिया को विजय कर लिया जिस सिकंदर ने और पूरी दुनिया पर विजय पाने के लिए जो सिकंदर निकला उस सिकंदर को दुनिया का कोई देश नहीं रोक पाया इसी भारत की माटी के एक लाल पोरस ने उसको रोका और धूल चटाई और सिकंदर को पराजित करके इस देश से वापस भेजा पृथ्वीराज चौहान इसी देश की माटी से निकले हैं पोरस जैसे राजा इसी देश की माटी से निकले हैं क्या महान और तेजस्वी तपस्वी लोग रहे होंगे पृथ्वीराज चौहान जैसे लोग जो एक बार दुश्मन को हराते हैं दो बार हराते हैं तीन बार हराते हैं चार बार हराते हैं पांच बार हराते हैं बार-बार हराते हैं पराक्रम में कितने मजबूत होंगे वरना दुश्मन को बार-बार हराने की ताकत तो नहीं होती कैसे वीर रहे होंगे महाराणा प्रताप जैसे लोग जो व्यक्तिगत जीवन में कठिन से कठिन कष्ट भुगतने को तैयार है लेकिन किसी की गुलामी स्वीकार करने को तैयार नहीं अकबर ने कितनी बार प्रस्ताव भेजा होगा महाराणा प्रताप को संधि कर लो दोस्ती कर लो मेरी छत्र छाया में आ जाओ मंजूर नहीं है घास की रोटी खा लेंगे लेकिन गुलामी के छत्र के नीचे जाकर नहीं रह सकते हमारी रगों में हमारी नसों में राणा प्रताप का खून है हमारी रगों में पृथ्वीराज चौहान का खून है हमारी रगों में पोरस का खून है हमारी रगों में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का खून है हम सब इन्हीं के वंशज हैं वोह सब हमारे पुरखे हैं तो उनकी शूर वरता और उनके पराक्रम और उनके साहस की कसम है हम सबको आने वाले समय में हम इस देश में वह सब कर डालेंगे जो आजादी के पिछले 62 साल में हो जाना चाहिए था और किसी कारण से नहीं हो पाया और इस देश को फिर से एक ऐसा देश बनाएंगे जिस पर हम गर्व करेंगे हमारे आस पड़ोसी गर्व करेंगे और सारी दुनिया गर्व करेगी कि भारत वाले हैं जो अपनी गुलामी की आखिरी निशानी को भी मिटा सकते हैं हम अहिंसा वाले जरूर हैं लेकिन गैर जरूरी हिंसा नहीं करना जरूरत पड़ने पर हिंसा भी करनी है अहिंसा हमारा जीवन का तत्व है हम अहिंसक हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर तलवार उठानी है अपनी रक्षा के लिए धर्म की रक्षा के लिए अपनी संस्कृति अपनी सभ्यता अपनी मान्यता अपनी परंपरा की रक्षा के लिए हमारे वेदों में उपनिषदों में अहिंसा जो समझाई गई है वह इसी के साथ है खाली ऐसी बात नहीं है कि हम कायर होकर बैठ जाए चुपचाप होकर बैठ जाएं और सब कुछ बर्दाश्त करते रहे वो अहिंसा नहीं है अहिंसा वीरों का भूषण है कमजोर का नहीं है कायर का नहीं है जरूरत पड़ने पर हम गैर जरूरी हिंसा नहीं करते मक्खी मच्छर को नहीं मारते चीटी चीटियों को नहीं मारते कुत्ते बिल्ले घोड़ों को नहीं मारते गधों को नहीं मारते क्योंकि यह हमारे ही सखा हैं हमारे सहयोगी हैं लेकिन दुश्मन की तो गर्दन काट देते हैं यह इतिहास हमारा गवाह है दुश्मन के तो पांव काट देते हैं हाथ काट देते हैं ये इतिहास गवाह तो फिर से हमें खड़ा होना है अपने इन्हीं पूर्वजों की कसम खाकर उनके संकल्प लेकर और बची हुई गुलामी की निशानियां को जड़म पूल से हटा देना है इस देश में से हमारे दिन हमारा समय हमें हमारी मान्यता के हिसाब से तय करना है हमारी भूषा हमारा भोजन हमारा भेषज अपनी मान्यता परंपरा से तय करना है हमारे नियम कायदे कानून अपनी मान्यता परंपरा से तय करने हैं सब कुछ अपना करना है तभी हमें शांति होगी तभी चयन होगा और तभी भारत स्वाभिमान का बनना और इसका किसी उम्मीद तक पहुंचना सार्थक होगा यह बोलकर आप सबका आभार करता हूं बहुत धन्यवाद तो हमें इस देश के लोगों को छोटी-छोटी बातें समनी है जो बहुत गहरा अर्थ अपने भीतर समेटे हुए हैं एक भाषा जिसने इस देश की शक्ति इस देश का समय इस देश की प्रतिभा इस देश का स्वाभिमान और इस देश की सामाजिक समरसता को पूरी तरह से ध्वस्त किया हुआ है 99 प्र लोगों को आज भी गुलामी में जीने के लिए विवश बनाया हुआ है और कुछ चंद सामंत लोग इस देश की संपूर्ण व्यवस्थाओं के ऊपर काबिज होकर के बैठे हैं एक छोटी सी बात समनी है लोगों को कि हमें अपनी भाषा अपनी भारतीय संस् अपनी गौरवशाली संस्कृति के ऊपर स्वाभिमान रखना है हमें अपनी स्वदेशी व्यवस्थाओं को चाहे वह स्वदेश की शिक्षा व्यवस्था स्वदेश की शासन व्यवस्था स्वास्थ्य व्यवस्था भेषज व्यवस्था भोजन की व्यवस्था भूषा की व्यवस्था हमारे ज वो संध्याकाल की पावन समय की व्यवस्था हमारे उत्सव हमारे वार हमारे त्यौहार हमारा समय आज इतना हो गया है आज हम संवत्सर भी मनाते हैं तो कौन सा मनाते हैं विदेशी बहुत लोगों को 99 प्रत लोगों को यह नहीं पता होता है कि आज कौन सा वार चल रहा है कौन सा संवत चल रहा है सारा अंग्रेजी मैं हो गया नया वर्ष हम एक हम अपना वर्ष और संवतसर हम अपना मना ही नहीं सकते हमें छोटी-छोटी बातों की समझ देनी है देश के लोगों को भाषा के बारे में भारतीयता के बारे में स्वदेशी के बारे में स्वदेशी अर्थव्यवस्था के बारे में भारत की मुद्रा के बारे में एक बात बता दे हम देश के लोगों को और समझा दे और देश देखो इस लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति होती है जनशक्ति हमने माना कि धन में बहुत बड़ी शक्ति है हनुम माना की राज्य में भी बहुत बड़ी शक्ति है राज्य शक्ति से धन शक्ति से भी और तमाम दुनिया की शक्तियों से ज्यादा शक्ति है जनशक्ति में देश के लोगों को जब हमय समझाएंगे अरे खाली एक बात के लिए सरकारों पर दबाव डालो बड़ा बड़ी मुद्रा छापना बंद कर दो 9999 नहीं 100% भ्रष्टाचार इस देश का एक दिन में खत्म हो सकता है एक छोटी सी बात लेकिन इस बात का बोध नहीं है तो हमें अपनी मुद्राओं के बारे में थोड़ा सा समझ होनी चाहिए भ्रष्टाचार क्या है एक मुद्रा के बारे में समझ ही नहीं है लोगों को भ्रष्टाचार से ही बेरोजगारी भय भूख अभाव समाज के अंदर सारी असमानता अपना परही है जल प्रबंधन के कारण्य से आज देश के करोड़ों किसान और उस कृषि पर आधारित मजदूर करीब 100 करोड़ लोगों की जिंदगी नर्क बनी हुई है क्योंकि हमने अपने देश की जो कृषि व्यवस्था ग्रामीण प्रबंधन है छोटे उद्योग है उनको पूरी तरह से नष्ट कर दिया है तो हमें पर्यावरण की रक्षा स्वच्छता से लेकर के संपूर्ण मुद्दे जो इस आधी अधूरी आजादी को हमें बदल कर के पूर्ण स्वतंत्रता और पूरी आजादी को और लेकर के जाते हैं इन मुद्दों के बारे में देश के लोगों को बताना अरे हमारे साथ में देखो क्या षड्यंत्र हो रहा है उठो जागो बस ये छोटी छोटी बातें समझाएंगे आपको आगे दो मुद्दों के बारे में और भी समझ देनी है और आपको देश को लोगों को समझाना है पहले देश का राजा कैसा होता था संयमी होता था सदाचारी होता था योगी होता था पहले देश का राजा निरभ्य मानी होता था स्वाभिमानी होता था पहले देश का राजा पराक्रमी होता था दूरदर्शी पारदर्शी होता था पहले देश का राजा जब युद्ध होता था तो स्वयं लड़ा करता था और आजकल वाले पड़ोसी हम पर हमला करें तो पेंट खराब भले ही हो जाए वापस हमला नहीं करते आज बताओ आज जितने देश के जिनको हमने नेतृत्व सौपा हुआ है देश का उनमें से एक आदमी को एक 47 चला सकता है एक भी सिंगल आदमी पहले राजा वो होता था तो युद्ध के मैदान पर स्वयं अपने जोहर दिखाता था शक्तिशाली होना स्वाभिमानी होना पराक्रमी होना बलवान होना सयम सदाचारी होना ये राजा की पहली शर्त होती थी शासक की पहली शर्त होती थी नेतृत्व से वो गायब हो गया पहले देशों के ऊपर जितने भी पूरी दुनिया में गुलामिया हुई पहले शासन के स्तर पर होती थी अब एक नई गुलामी चल रही है वो क्या अब बोले शासन करना संभव नहीं रहा तो व्यापार के नाम पर लूटो अच्छा शासन करके भी क्या करते थे शासन करके उस देश का शासन चलाना उनका मतलब नहीं था शासन करके लूटना मकसद था तो अब वो लूट यदि बिना शासन चलाए हो जाए तो फिर जो है शासन चलाने में तो खर्च भी होता है उसके ऊपर आरोप भी लगते हैं कि तुमने हमको गुलाम बना रखा है अब कहने को हम आजाद भारत पहले लूटते थी एक दो कंपनियां उसकी सहयोगी मुख्य एक कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी उसकी सहयोगी कंपनियां आज हमको यदि 5000 से ज्यादा कंपनिया लूट है तो आजादी कैसी तो कल का भाषण इसी पर होगा हमको आधी अधूरी नहीं पूरी आजादी चाहिए आर्थिक आजादी हमको चाहिए भाषा की आदी हमको आजादी चाहिए बड़ी और इस छोटे छोटे इन प्रश्नों में देश का बहुत कुछ लूटा है अब वो सब कुछ वापस लाना है हमको चलिए एक प्रार्थना के साथ आज यह संकल्प लेते हैं कि हम इस देश का वैभव इस देश की संस्कृति इस देश का स्वाभिमान अब मिटने नहीं देंग!
pallavi priya prakashan
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